
संवाद 24 डेस्क। हठयोग में शरीर, प्राण और मन के संतुलन के लिए अनेक साधन बताए गए हैं। इनमें आसन, प्राणायाम, मुद्रा और बंधों का विशेष महत्व माना जाता है। हठयोग के मुख्यतः तीन प्रमुख बंधों—मूलबंध, उड्डीयान बंध और जालंधर बंध—का उल्लेख प्राचीन योगग्रंथों में मिलता है। इन तीनों में उड्डीयान बंध को अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली माना गया है। योगाचार्यों ने इसे ऐसा बंध कहा है जो साधक की प्राणशक्ति को ऊपर की ओर उठाकर आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
‘उड्डीयान’ शब्द संस्कृत धातु ‘उड्डी’ से बना है, जिसका अर्थ है—ऊपर उड़ना या ऊपर उठना। इस प्रकार उड्डीयान बंध वह योगिक क्रिया है, जिसके माध्यम से प्राणशक्ति को ऊपर की ओर प्रवाहित करने का प्रयास किया जाता है। यह न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य, पाचन-तंत्र, श्वसन-प्रणाली तथा मानसिक संतुलन के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना गया है।
उड्डीयान बंध का स्वरूप एवं योगशास्त्र में उसका महत्व
हठयोग प्रदीपिका, घेरंड संहिता तथा शिव संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में उड्डीयान बंध का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है कि जिस प्रकार कोई महान पक्षी बिना किसी प्रयास के आकाश में ऊँचा उड़ता है, उसी प्रकार उड्डीयान बंध के अभ्यास से प्राणवायु ऊपर की ओर गतिमान होती है।
योगशास्त्र के अनुसार मानव शरीर में विभिन्न प्रकार की प्राणशक्तियाँ कार्य करती हैं। सामान्यतः अपान वायु नीचे की ओर और प्राण वायु ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। उड्डीयान बंध इन दोनों के समन्वय का कार्य करता है। इससे शरीर की सूक्ष्म ऊर्जा नाड़ियों में संतुलन उत्पन्न होता है और साधक की चेतना उच्च स्तर की ओर अग्रसर होती है।
इसी कारण इसे योगाभ्यास की उन्नत क्रियाओं तथा प्राणायाम के साथ विशेष रूप से जोड़ा जाता है। अनेक योगाचार्य इसे बुढ़ापे को दूर रखने वाला और शरीर में नवीन ऊर्जा का संचार करने वाला बंध मानते हैं।
उड्डीयान बंध करने की विधि
उड्डीयान बंध का अभ्यास प्रातःकाल खाली पेट अथवा भोजन के कम से कम चार से पाँच घंटे बाद करना चाहिए। प्रारम्भ में इसका अभ्यास किसी योग्य योग प्रशिक्षक के निर्देशन में करना अधिक उपयुक्त माना जाता है।
इसकी सामान्य विधि निम्न प्रकार है—
सबसे पहले सीधे खड़े होकर दोनों पैरों के बीच लगभग एक फुट की दूरी रखें। अब धीरे-धीरे गहरी श्वास लें और फिर पूरी श्वास बाहर निकाल दें। जब फेफड़े पूर्णतः रिक्त हो जाएँ, तब श्वास को बाहर ही रोककर पेट की मांसपेशियों को भीतर की ओर खींचते हुए ऊपर उठाने का प्रयास करें। इस स्थिति में ऐसा प्रतीत होता है मानो उदर भाग रीढ़ की ओर सिमट गया हो।
कुछ क्षण इस अवस्था में रहने के बाद पेट को सामान्य स्थिति में लाते हुए धीरे-धीरे श्वास लें और शरीर को शिथिल कर दें। प्रारम्भ में इस क्रिया को तीन से पाँच बार किया जा सकता है तथा अभ्यास बढ़ने पर इसकी अवधि और संख्या धीरे-धीरे बढ़ाई जा सकती है।
उड्डीयान बंध का अभ्यास करते समय किसी प्रकार का अत्यधिक दबाव या बल प्रयोग नहीं करना चाहिए। सहजता और क्रमिक अभ्यास ही इसकी सफलता का मूल आधार है।
शारीरिक स्वास्थ्य पर उड्डीयान बंध का प्रभाव
उड्डीयान बंध का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव उदर क्षेत्र और पाचन तंत्र पर दिखाई देता है। इस अभ्यास के दौरान पेट की मांसपेशियाँ सक्रिय होती हैं, जिससे यकृत, अग्न्याशय, आँतों तथा अन्य आंतरिक अंगों की प्राकृतिक मालिश होती है। इससे इन अंगों की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है और पाचन क्रिया अधिक सुदृढ़ बनती है।
यह क्रिया कब्ज, गैस, अपच और पेट फूलने जैसी समस्याओं में सहायक मानी जाती है। नियमित अभ्यास से शरीर में चयापचय क्रिया संतुलित होती है, जिसके कारण भोजन का पाचन और पोषक तत्वों का अवशोषण बेहतर ढंग से होता है।
उड्डीयान बंध श्वसन तंत्र के लिए भी लाभकारी माना जाता है। श्वास को बाहर रोककर किए जाने वाले इस अभ्यास से फेफड़ों की क्षमता में वृद्धि होती है तथा श्वसन मांसपेशियाँ मजबूत बनती हैं। इससे शरीर को अधिक मात्रा में ऑक्सीजन प्राप्त होती है और व्यक्ति स्वयं को अधिक ऊर्जावान अनुभव करता है।
इसके अतिरिक्त यह उदर क्षेत्र में रक्तसंचार को बढ़ाता है, जिससे शरीर के विभिन्न अंगों को पर्याप्त पोषण और ऊर्जा प्राप्त होती है। परिणामस्वरूप शरीर में स्फूर्ति, लचीलापन और कार्यक्षमता बढ़ती है।
उड्डीयान बंध के प्रमुख लाभ
उड्डीयान बंध के नियमित अभ्यास से अनेक प्रकार के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।
सबसे पहले यह पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाकर कब्ज, गैस और अपच जैसी समस्याओं को कम करने में सहायता करता है। पेट की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं और उदर क्षेत्र में अतिरिक्त वसा को नियंत्रित करने में भी यह उपयोगी सिद्ध होता है।
यह शरीर में रक्तसंचार को बेहतर बनाकर हृदय और श्वसन प्रणाली के कार्य को संतुलित करता है। फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ने से शरीर में ऊर्जा का स्तर ऊँचा बना रहता है और थकान में कमी आती है।
मानसिक दृष्टि से यह तनाव, चिंता और मानसिक अशांति को कम करने में सहायक माना जाता है। इसके अभ्यास से मन में स्थिरता और एकाग्रता का विकास होता है। प्राणायाम के साथ संयुक्त रूप से किया जाने पर यह ध्यान की अवस्था को अधिक गहरा बनाने में सहायक होता है।
योगिक दृष्टि से उड्डीयान बंध प्राणशक्ति को ऊपर की ओर प्रवाहित करने का कार्य करता है। इससे नाड़ियों का शुद्धिकरण होता है और साधक की चेतना अधिक विकसित होती है। इसी कारण इसे कुंडलिनी जागरण की तैयारी के लिए भी महत्वपूर्ण माना गया है।
इसके अतिरिक्त यह शरीर में नवीन ऊर्जा का संचार करता है तथा बढ़ती आयु के प्रभावों को धीमा करने में भी सहायक माना जाता है। नियमित अभ्यास करने वाले व्यक्ति स्वयं को अधिक सक्रिय, उत्साही और स्वस्थ अनुभव करते हैं।
अभ्यास के समय आवश्यक सावधानियाँ
यद्यपि उड्डीयान बंध अत्यंत लाभकारी है, फिर भी इसके अभ्यास में कुछ सावधानियों का पालन आवश्यक है। यह क्रिया सदैव खाली पेट करनी चाहिए। भोजन के तुरंत बाद इसका अभ्यास करने से असुविधा उत्पन्न हो सकती है।
उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, पेट के अल्सर, हर्निया या गंभीर श्वसन रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को इसका अभ्यास चिकित्सकीय सलाह और विशेषज्ञ योग प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। गर्भवती महिलाओं के लिए इसका अभ्यास निषिद्ध माना गया है।
प्रारम्भिक अवस्था में अधिक समय तक श्वास रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए। धीरे-धीरे और क्रमबद्ध अभ्यास से ही इसके लाभ सुरक्षित रूप से प्राप्त किए जा सकते हैं। यदि अभ्यास के दौरान चक्कर, बेचैनी अथवा असामान्य थकान महसूस हो तो तुरंत अभ्यास रोक देना चाहिए।
उड्डीयान बंध हठयोग की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली क्रिया है, जो शरीर, मन और प्राण तीनों स्तरों पर सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है। यह न केवल पाचन और श्वसन तंत्र को सुदृढ़ बनाती है, बल्कि मानसिक शांति, एकाग्रता तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी सहायक सिद्ध होती है।
प्राचीन योगग्रंथों में वर्णित यह बंध आज के वैज्ञानिक युग में भी अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता बनाए हुए है। नियमित एवं सही विधि से किया गया उड्डीयान बंध व्यक्ति को स्वास्थ्य, स्फूर्ति और आंतरिक संतुलन प्रदान करता है। यही कारण है कि हठयोग की परंपरा में इसे अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और इसे प्राणशक्ति के उत्थान का एक प्रभावी साधन माना गया है।






