जगन्नाथ मंदिर से विश्व मंच तक ओडिसी नृत्य परंपरा की प्रेरक यात्रा
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संवाद 24 डेस्क। भारत की सांस्कृतिक विरासत में शास्त्रीय नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे इतिहास, अध्यात्म, संगीत और भावनाओं का जीवंत रूप भी हैं। इन्हीं में से एक है ओडिसी, जिसे भारत की सबसे प्राचीन और सौंदर्यपूर्ण नृत्य शैलियों में गिना जाता है। इसकी हर मुद्रा, हर भाव और हर लय भारतीय संस्कृति की गहराई को दर्शाती है।
ओडिसी केवल नृत्य नहीं, बल्कि वह परंपरा है जिसने सदियों तक मंदिरों की दीवारों, मूर्तियों और धार्मिक अनुष्ठानों में अपनी पहचान बनाई। आज यह विश्व मंच पर भारतीय शास्त्रीय नृत्य की एक मजबूत पहचान बन चुकी है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें नृत्य के साथ भाव, भक्ति और अभिनय का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
ओडिशा की धरती से निकली सांस्कृतिक धरोहर
ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान के रूप में ओडिसी का जन्म हुआ। माना जाता है कि इसका विकास मंदिरों में देवताओं की आराधना के लिए हुआ था। विशेष रूप से जगन्नाथ मंदिर और कोणार्क सूर्य मंदिर की मूर्तियों में जो नृत्य मुद्राएं दिखाई देती हैं, वही बाद में ओडिसी की प्रमुख शैली बनीं।
ओडिसी का संबंध प्राचीन संस्कृत ग्रंथ नाट्यशास्त्र से भी माना जाता है। नाट्यशास्त्र में वर्णित अभिनय, भाव, ताल और मुद्राओं का प्रभाव ओडिसी में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इतिहासकारों के अनुसार, यह नृत्य शैली पहले मंदिरों में महिलाओं द्वारा प्रस्तुत की जाती थी, जिन्हें महारी कहा जाता था। बाद में गोटीपुआ परंपरा ने इसे आगे बढ़ाया।
महारी परंपरा ने दी ओडिसी को पहली पहचान
ओडिसी की शुरुआत मंदिरों में सेवा देने वाली महिलाओं से जुड़ी रही है। इन्हें महारी कहा जाता था। महारी शब्द का अर्थ है – भगवान की सेविका। ये महिलाएं मंदिरों में भगवान जगन्नाथ की आराधना के दौरान नृत्य और संगीत प्रस्तुत करती थीं।
महारी नृत्य केवल कला नहीं था, बल्कि वह पूजा और समर्पण का माध्यम था। इन प्रस्तुतियों में धार्मिक कथाओं, विशेष रूप से कृष्ण और राधा की लीलाओं को दर्शाया जाता था। समय के साथ जब महारी परंपरा कमजोर होने लगी, तब गोटीपुआ परंपरा ने ओडिसी को जीवित रखा।
गोटीपुआ परंपरा ने बचाई ओडिसी की विरासत
महारी परंपरा के बाद ओडिसी को जीवित रखने में गोटीपुआ कलाकारों की अहम भूमिका रही। गोटीपुआ में छोटे लड़के स्त्री वेश धारण कर नृत्य प्रस्तुत करते थे। ये कलाकार धार्मिक मेलों, मंदिरों और उत्सवों में प्रदर्शन करते थे।
गोटीपुआ शैली में नृत्य के साथ कलाबाजी, लचक और शारीरिक संतुलन पर विशेष जोर दिया जाता था। इसी परंपरा से आगे चलकर आधुनिक ओडिसी के कई प्रमुख गुरु निकले। प्रसिद्ध गुरु केलुचरण महापात्र भी बचपन में गोटीपुआ कलाकार रह चुके थे। आज ओडिसी की कई प्रसिद्ध मुद्राएं और तकनीकें गोटीपुआ परंपरा से ही प्रेरित मानी जाती हैं।
त्रिभंगी और चौक हैं ओडिसी की आत्मा
ओडिसी को अन्य शास्त्रीय नृत्य शैलियों से अलग बनाती हैं इसकी विशेष मुद्राएं। इनमें सबसे प्रमुख हैं त्रिभंगी और चौक।
त्रिभंगी में शरीर को तीन हिस्सों – सिर, कमर और घुटनों – पर मोड़ा जाता है। यह मुद्रा देखने में बेहद आकर्षक लगती है और ओडिसी की पहचान मानी जाती है। वहीं चौक मुद्रा एक चौकोर संतुलित स्थिति होती है, जिसे भगवान जगन्नाथ का प्रतीक माना जाता है।
इन मुद्राओं के साथ शरीर के ऊपरी हिस्से की लहराती हुई चाल, आंखों का अभिनय और हाथों की मुद्राएं ओडिसी को बेहद सौम्य और प्रभावशाली बनाती हैं। कई विशेषज्ञ इसकी तुलना समुद्र की लहरों से करते हैं, क्योंकि इसकी गतियां बहुत कोमल और प्रवाहपूर्ण होती हैं।
भक्ति, प्रेम और अध्यात्म का सुंदर संगम
ओडिसी की प्रस्तुतियों में केवल नृत्य नहीं होता, बल्कि एक कहानी भी छिपी होती है। इसमें प्रेम, भक्ति, विरह, करुणा और आनंद जैसे भावों को नृत्य के माध्यम से व्यक्त किया जाता है।
ओडिसी की कई रचनाएं गीत गोविंद पर आधारित होती हैं। गीत गोविंद में राधा और कृष्ण के प्रेम को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यही कारण है कि ओडिसी में भक्ति और श्रृंगार रस का प्रभाव अधिक दिखाई देता है।
इस नृत्य में आंखों, चेहरे और हाथों के माध्यम से भाव व्यक्त करने की कला को विशेष महत्व दिया जाता है। एक कलाकार बिना बोले ही पूरी कथा दर्शकों तक पहुंचा देता है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।
अंग्रेजी शासन में आई गिरावट
भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान कई पारंपरिक कलाओं की तरह ओडिसी भी कठिन दौर से गुजरी। मंदिरों की परंपराएं कमजोर हुईं और महारी नृत्य परंपरा लगभग समाप्त हो गई। अंग्रेज अधिकारियों और मिशनरियों ने कई बार मंदिर नृत्यों को गलत नजरिए से देखा और उन पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की।
इसका परिणाम यह हुआ कि ओडिसी धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से गायब होने लगी। लेकिन इसके बावजूद कुछ कलाकारों और गुरुओं ने इसे बचाए रखा। मंदिरों की मूर्तियों, पुराने ग्रंथों और लोक परंपराओं के आधार पर बाद में इस नृत्य शैली का पुनर्निर्माण किया गया।
20वीं सदी में हुआ ओडिसी का पुनर्जागरण
स्वतंत्रता के बाद ओडिसी को दोबारा पहचान दिलाने के लिए कई गुरुओं और कलाकारों ने काम किया। इनमें सबसे प्रमुख नाम केलुचरण महापात्र, पंकज चरण दास, मायाधर राउत और देव प्रसाद दास के हैं।
इन कलाकारों ने मंदिरों की मूर्तियों, प्राचीन साहित्य और लोक परंपराओं को आधार बनाकर ओडिसी की आधुनिक संरचना तैयार की। इसके बाद ओडिसी को देश-विदेश के मंचों पर प्रस्तुत किया जाने लगा और यह भारतीय शास्त्रीय नृत्य की मुख्य धारा में शामिल हो गई।
विश्व मंच पर बढ़ रही है ओडिसी की लोकप्रियता
आज ओडिसी केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देशों में इसके विद्यालय चल रहे हैं और विदेशी कलाकार भी इसे सीख रहे हैं। भारत की सांस्कृतिक पहचान के रूप में ओडिसी को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विशेष स्थान मिला है।
सोनल मानसिंह, संयुक्ता पाणिग्रही, माधवी मुद्गल और कुमकुम मोहंती जैसे कलाकारों ने इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इनके प्रदर्शन ने यह साबित किया कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवित और विकसित होती कला है।
नई पीढ़ी के लिए क्यों जरूरी है ओडिसी को जानना
आज के समय में जब युवा पीढ़ी तेजी से आधुनिक संस्कृति की ओर बढ़ रही है, तब ओडिसी जैसे शास्त्रीय नृत्य उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करते हैं। यह केवल कला नहीं सिखाता, बल्कि अनुशासन, समर्पण, धैर्य और भारतीय परंपराओं के प्रति सम्मान भी सिखाता है।
ओडिसी को सीखना आसान नहीं है। इसमें वर्षों का अभ्यास, शरीर का संतुलन, भावों की समझ और संगीत का ज्ञान जरूरी होता है। लेकिन जो कलाकार इसे सीख लेते हैं, वे केवल नृत्य नहीं सीखते, बल्कि भारतीय संस्कृति के एक गहरे अध्याय को अपने भीतर उतार लेते हैं।
ओडिसी भारत की उस सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है, जो समय के साथ बदलते हुए भी अपनी आत्मा को जीवित रखे हुए है। यही कारण है कि यह नृत्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना सदियों पहले था।






