7 साल बाद बड़ा यू-टर्न: मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत ने फिर खरीदा ईरानी तेल
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संवाद 24 नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी युद्ध और ऊर्जा संकट के बीच भारत ने एक बड़ा और रणनीतिक कदम उठाते हुए सात साल बाद फिर से ईरान से कच्चे तेल की खरीद शुरू कर दी है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब वैश्विक स्तर पर तेल आपूर्ति बाधित हो रही है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर तनाव लगातार बढ़ रहा है। भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि देश की तेल आपूर्ति पूरी तरह सुरक्षित है और ईरान से तेल आयात में किसी प्रकार की भुगतान संबंधी समस्या नहीं है। इस कदम को भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया एक अहम निर्णय माना जा रहा है।
क्यों लिया गया यह बड़ा फैसला?
दरअसल, मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण तेल आपूर्ति श्रृंखला पर गहरा असर पड़ा है। विशेष रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल गुजरता है, वहां तनाव के कारण आपूर्ति प्रभावित हुई है। ऐसे हालात में भारत ने अपनी रणनीति बदलते हुए फिर से ईरान की ओर रुख किया है। भारत पहले 2019 तक ईरान से तेल आयात करता था, लेकिन अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण इसे रोकना पड़ा था। अब हालात बदलने के साथ भारत ने एक बार फिर इस विकल्प को अपनाया है।
पहली खेप और बढ़ती गतिविधियां
रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत को ईरान से कच्चे तेल की पहली खेप मिल चुकी है या रास्ते में है। इसके अलावा, एलपीजी (LPG) की सप्लाई भी ईरान से शुरू हो गई है, जिससे घरेलू जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। सरकार ने यह भी साफ किया है कि ईरानी तेल के भुगतान में कोई दिक्कत नहीं है और जो खबरें भुगतान बाधा को लेकर फैलाई जा रही थीं, वे पूरी तरह गलत हैं।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर असर
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में वैश्विक संकट का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। सरकार का कहना है कि देश ने पहले से ही कई देशों से तेल आयात के विकल्प बनाए हुए हैं और मौजूदा स्थिति में भी आपूर्ति पूरी तरह सुरक्षित है। इसके अलावा, भारत ने अपने आयात स्रोतों को विविध बनाने की रणनीति अपनाई है, जिससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो सके।
वैश्विक संकट और भारत की रणनीति
2026 में चल रहे ईरान युद्ध और उससे पैदा हुए ऊर्जा संकट ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। तेल की कीमतों में उछाल, आपूर्ति में बाधा और आर्थिक अनिश्चितता जैसे हालात पैदा हो गए हैं। ऐसे में भारत का यह कदम न सिर्फ तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए है, बल्कि यह भविष्य की ऊर्जा रणनीति का संकेत भी देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में भारत अपने तेल आयात के स्रोतों को और अधिक लचीला बनाएगा।
आगे क्या?
भारत और ईरान के बीच फिर से शुरू हुआ यह ऊर्जा व्यापार आने वाले समय में और मजबूत हो सकता है। हालांकि, यह पूरी तरह वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों और प्रतिबंधों पर निर्भर करेगा। फिलहाल, सरकार का फोकस साफ है – देश में पेट्रोल, डीजल और गैस की आपूर्ति में किसी भी तरह की कमी न हो और आम जनता पर इसका असर कम से कम पड़े।
निष्कर्ष
मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत का ईरानी तेल की ओर लौटना एक मजबूरी भी है और एक रणनीतिक चाल भी। यह कदम बताता है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को लेकर कितना सजग और लचीला है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह अस्थायी कदम है या भारत-ईरान ऊर्जा संबंधों की एक नई शुरुआत।






