सुदूर अंडमान से अरुणाचल तक संघ की शाखाओं ने ढका पूरा भारत: समालखा में विस्तार, समरसता और राष्ट्र-निर्माण का हुआ महामंथन

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संवाद 24  |  विशेष रिपोर्ट 

हरियाणा के पानीपत जिले में स्थित समालखा के पट्टीकल्याणा गांव का माधव सृष्टि परिसर इन दिनों देश के सबसे चर्चित स्थानों में से एक बन गया। कारण था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सर्वोच्च निर्णायक इकाई ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ (ABPS) की तीन दिवसीय वार्षिक बैठक, जो 13 से 15 मार्च 2026 तक यहाँ संपन्न हुई। बैठक का शुभारंभ 13 मार्च की प्रातः 9 बजे संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने भारत माता के चित्र पर पुष्पार्चन कर किया। इस तीन दिवसीय महामंथन में देशभर से संघ एवं संघ-प्रेरित 32 संगठनों के 1,487 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक में संघ के अखिल भारतीय पदाधिकारी, क्षेत्र-प्रांत संघचालक, कार्यवाह, प्रचारक तथा विभिन्न अनुषांगिक संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष और महामंत्री भी सम्मिलित हुए। बैठक के अंतिम दिन 15 मार्च को सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने पत्रकारों से विस्तृत संवाद किया और बैठक में लिए गए निर्णयों तथा प्रस्तावों की जानकारी सार्वजनिक की।

शाखाओं की रिकॉर्ड वृद्धि : 88 हजार का आँकड़ा पार

बैठक में जो सबसे महत्त्वपूर्ण और उत्साहवर्धक जानकारी सामने आई, वह थी संगठनात्मक विस्तार के आँकड़े। सरकार्यवाह होसबाले ने बताया कि पिछले एक वर्ष में संघ की शाखाओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। मार्च 2025 में जहाँ शाखाओं की संख्या 83,129 थी, वह अब बढ़कर 88,949 हो गई है अर्थात् एक वर्ष में लगभग 6,000 नई शाखाओं की वृद्धि। इसी अवधि में शाखाओं के स्थानों की संख्या भी 51,740 से बढ़कर 55,683 हो गई है। साप्ताहिक मिलन और मंडली की संख्या में भी उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। इस विस्तार को केवल संख्याओं के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि भौगोलिक व्यापकता के नजरिए से भी देखना आवश्यक है। संघ की शाखाएं अब केवल महानगरों और कस्बों तक सीमित नहीं हैं अंडमान के सुदूर द्वीपों, अरुणाचल प्रदेश के दुर्गम वनांचलों, लेह के ऊँचाई वाले क्षेत्रों और देश के जनजातीय इलाकों में भी संघ की दैनिक शाखाएं चल रही हैं। यह तथ्य बताता है कि संघ की पहुँच अब देश के हर कोने तक है। अंडमान के प्रमुख 9 द्वीपों से 13,000 से अधिक लोगों ने सरसंघचालक जी की उपस्थिति में आयोजित हिन्दू सम्मेलन में सहभागिता की, तो वहीं अरुणाचल प्रदेश जैसे कम जनसंख्या घनत्व वाले राज्य में आयोजित 21 स्वधर्म सम्मेलनों में 37,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया। ये आँकड़े यह प्रमाणित करते हैं कि संघ का विस्तार केवल कागजी नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस और जीवंत है।

शताब्दी वर्ष का गृह संपर्क अभियान : 10 करोड़ घरों तक पहुँचा संघ

शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संघ ने जो सबसे महत्त्वाकांक्षी और व्यापक अभियान चलाया, वह था ‘गृह संपर्क अभियान’। सह सरकार्यवाह सी. आर. मुकुंद ने बताया कि विजया दशमी से शुरू हुए इस अभियान के केवल छह महीनों में ही देश के 10.40 करोड़ से अधिक घरों और 3.90 लाख गांवों तक संघ के कार्यकर्ताओं ने व्यक्तिगत संपर्क स्थापित किया। यह अभियान अभी भी जारी है और शेष प्रांतों में इसका विस्तार होना है। इस अभियान की एक विशेष बात यह रही कि केरल में संघ के कार्यकर्ताओं को कम्युनिस्ट, मुस्लिम और ईसाई परिवारों में भी सम्मान के साथ स्वागत मिला, जो संगठन की समावेशी छवि को दर्शाता है। इसी अवधि में देशभर में 37,048 हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन किया गया, जिनमें 3.5 करोड़ से अधिक लोगों ने सहभागिता की। इन सम्मेलनों में संघ के ‘पंच परिवर्तन’ के संदेश सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्व और स्वदेशी के प्रति गर्व, परिवार व्यवस्था का संरक्षण तथा नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता को समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचाया गया। प्रतिनिधि सभा में देशभर से आए प्रतिनिधियों ने इन कार्यक्रमों के सकारात्मक परिणामों पर विस्तृत चर्चा की।

पंच परिवर्तन : गुणवत्तापूर्ण समाज निर्माण की दिशा

सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने स्पष्ट किया कि संघ का लक्ष्य केवल शाखाओं का संख्यात्मक विस्तार नहीं, बल्कि समाज में गुणात्मक परिवर्तन लाना है। उन्होंने कहा कि भारतीयता अथवा हिन्दुत्व केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक जीवन शैली है। इस जीवन शैली को समाज के प्रत्येक व्यक्ति के आचरण में उतारना ही संघ का प्रमुख उद्देश्य है। पंच परिवर्तन के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने के लिए देशभर में जन गोष्ठियाँ और सामाजिक सद्भाव बैठकें आयोजित की गईं, जिनमें विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं के साथ मिलकर काम किया गया। होसबाले ने ‘Power of Good’ की अवधारणा पर जोर देते हुए कहा कि समाज की सज्जन शक्ति को एकत्र करना और उसे राष्ट्रहित में सक्रिय करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति समाज के लिए अच्छा कार्य कर रहा है, वह संघ की दृष्टि में स्वयंसेवक ही है। इसी सोच के साथ संघ अपने कार्यकर्ताओं को न केवल शाखाओं में बल्कि समाज के हर क्षेत्र में सकारात्मक योगदान के लिए प्रेरित करता है।

जाति-पंथ से ऊपर उठकर महापुरुषों का सम्मान

बैठक में सामाजिक समरसता पर विशेष बल दिया गया। सरकार्यवाह ने कहा कि समाज में महापुरुषों के कार्यों को जाति और पंथ के भेद से ऊपर उठकर स्वीकार करना चाहिए और उनके आदर्शों से समाज को सकारात्मक दिशा में आगे ले जाना चाहिए। इसी भावना के साथ संघ के स्वयंसेवकों ने नवम गुरु श्री तेगबहादुर जी के बलिदान के 350वें वर्ष पर देशभर में 2,000 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए, जिनमें 7 लाख से अधिक लोग सम्मिलित हुए। ये कार्यक्रम सिख परंपरा और हिन्दू समाज के बीच सेतु का काम करते हैं और यह संदेश देते हैं कि राष्ट्ररक्षा के लिए बलिदान करने वाले महापुरुष किसी एक समुदाय की धरोहर नहीं, बल्कि समूचे भारत के गौरव हैं। इसी कड़ी में राष्ट्रगीत ‘वंदेमातरम’ की 150वीं वर्षगांठ उत्साह के साथ मनाई गई। आगामी वर्ष 2027 में संत शिरोमणि रविदास जी महाराज के 650वें प्राकट्य वर्ष पर देशव्यापी कार्यक्रमों की विस्तृत योजना इस प्रतिनिधि सभा में तैयार की गई। यह कार्यक्रम 1 फरवरी 2027 से 20 फरवरी 2028 तक चलेगा और इसका उद्देश्य समाज में समरसता का संदेश देना होगा। होसबाले ने कहा कि संत रविदास जी ने जिस समतामूलक समाज का स्वप्न देखा था, उसे साकार करना संघ का भी ध्येय है।

संगठन का पुनर्गठन : 46 प्रांत से 80 से अधिक संभाग

प्रतिनिधि सभा में संगठन की संरचनात्मक पुनर्व्यवस्था पर भी महत्त्वपूर्ण विमर्श हुआ। सरकार्यवाह ने बताया कि संगठन में विकेन्द्रीकरण की दिशा में विचार हुआ है, जिसके अंतर्गत वर्तमान 46 प्रांतों के स्थान पर ‘संभाग’ आधारित नई व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव है। नई प्रणाली में 80 से अधिक संभाग होंगे, जिससे संगठन की जमीनी इकाइयाँ और अधिक सक्षम तथा स्वायत्त हो सकेंगी। इस पुनर्गठन का मूल उद्देश्य प्रत्येक संभाग को अधिक जवाबदेह बनाना और स्थानीय जरूरतों के अनुसार कार्य की योजना बनाने की स्वतंत्रता देना है। उदाहरण के रूप में महाराष्ट्र को लिया जाए तो वर्तमान में यहाँ विदर्भ, कोंकण, देवगिरी और पश्चिम महाराष्ट्र चार प्रांत हैं। विदर्भ प्रांत में ही नागपुर और अमरावती जैसे दो संभाग बनाए जा सकते हैं। इस प्रकार पूरे देश में संभागों की संख्या 80 को पार कर जाएगी। यह बदलाव 2027 में नागपुर में होने वाली अगली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में औपचारिक रूप से लागू किया जा सकता है। यह संरचनात्मक बदलाव संघ के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव साबित होगा।

गौसेवा, ग्राम विकास और हरित घर : पर्यावरण की ओर संघ की दृष्टि

प्रतिनिधि सभा में गौसेवा और ग्राम विकास की योजनाओं पर भी सार्थक विचार-विमर्श हुआ। सरकार्यवाह ने बताया कि नागरिकों को प्रेरित किया जाएगा कि वे अपने घर की छत पर सब्जियाँ उगाएं और इसमें देशी गोबर व गौमूत्र की खाद का उपयोग करें। इस प्रकार प्रत्येक नागरिक अपने स्तर पर गौसंवर्धन में सहयोग दे सकता है। यह प्रयास जहाँ एक ओर पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाएगा, वहीं दूसरी ओर देशी गाय के संरक्षण में भी सहायक होगा। इसी के साथ ‘हरित घर’ की संकल्पना को भी बैठक में रेखांकित किया गया। हरित घर का अर्थ है घर में पॉलीथीन का न्यूनतम उपयोग, जल संरक्षण के प्रयास और पर्यावरण के प्रति सजग जीवनशैली अपनाना। संघ का मानना है कि भारत के पर्यावरण संकट का समाधान बड़े-बड़े नीतिगत हस्तक्षेपों के साथ-साथ व्यक्तिगत स्तर पर जागरूकता और कार्यशीलता से भी संभव है। आगामी 96 प्रशिक्षण वर्गों में जिनमें 11 क्षेत्रीय वर्ग और एक नागपुर का वर्ग शामिल है स्वयंसेवकों को इन विषयों पर विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा।

जातिवाद पर कड़ा संदेश : मीडिया भी करे आत्मनिरीक्षण

प्रेस वार्ता में जातिगत भेदभाव के प्रश्न पर सरकार्यवाह होसबाले ने न केवल राजनीतिक दलों, बल्कि मीडिया को भी आईना दिखाया। उन्होंने कहा कि समाज से जाति-आधारित विभेद समाप्त करने में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और इस दिशा में मीडिया को भी आगे आना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से यह माँग रखी कि किसी भी चुनाव में मतदाताओं की संख्या का जाति-आधारित आकलन करना बंद होना चाहिए। यह जाति-गणना की मानसिकता जातिवाद को और गहरा करती है, जबकि समाज को इससे मुक्ति की आवश्यकता है। होसबाले ने संघ की स्थापना के मूल उद्देश्य को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना किसी समुदाय या पंथ-पूजा पद्धति के विरोध के लिए नहीं की। संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर ने भी कहा था कि हम सबके पूर्वज एक हैं और पूजा-पाठ की पद्धति की भिन्नता से हमारी एकता में कोई अंतर नहीं आता। तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के अनुसार जो भी भारत को अपनी मातृभूमि और राष्ट्र मानता है और भारतीयता को जीता है, वह हिन्दू है। इसी सर्वसमावेशी दृष्टि के साथ संघ सबका स्वागत करता है।

वैश्विक परिदृश्य पर संघ का दृष्टिकोण : शांति और विकास के पक्षधर

वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के संदर्भ में सरकार्यवाह ने देश की सरकार द्वारा राष्ट्रहित में किए जा रहे कूटनीतिक प्रयासों की सराहना की। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ विश्व में शांति और विकास का पक्षधर है। भारतीय विमर्श केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि समस्त विश्व के कल्याण का विचार प्रस्तुत करता है। इसी संदर्भ में संघ का मानना है कि देश के नागरिकों को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होना आवश्यक है। भारत की अपनी सभ्यतागत विरासत और ज्ञान-परंपरा में वे सभी तत्त्व मौजूद हैं, जो आज के वैश्विक संकटों का समाधान कर सकते हैं।

इसी प्रसंग में बैठक में UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) से संबंधित हालिया विवाद पर भी विचार हुआ। शिक्षा क्षेत्र में भारतीय मूल्यों और दृष्टिकोण को समाहित करने के प्रयासों को संघ का समर्थन प्राप्त है। बैठक में 2026 और 2027 में होने वाले विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर सामाजिक जागरूकता की रणनीति पर भी विमर्श हुआ। इसके अतिरिक्त धर्मांतरण, जनसंख्या असंतुलन और महिला सुरक्षा जैसे ज्वलंत मुद्दों पर सामाजिक स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की योजना भी प्रतिनिधि सभा में रखी गई।

पानीपत की पवित्र भूमि पर संघ का नया संकल्प

यह भी उल्लेखनीय है कि इस वर्ष की प्रतिनिधि सभा हरियाणा की उस ऐतिहासिक भूमि पर आयोजित हुई, जहाँ पानीपत के तीन महाग्रंथ युद्धों ने भारत के इतिहास की दिशा निर्धारित की थी। समालखा क्षेत्र के माधव सृष्टि परिसर को एक ग्रामीण विकास और सेवा साधना केंद्र के रूप में भी जाना जाता है। बैठक स्थल पर गुरु तेगबहादुर और हरियाणा की सांस्कृतिक विरासत पर आधारित एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई, जो आगंतुकों में इतिहास-बोध और गौरव-भाव जागृत करती रही। बैठक से पहले आयोजित प्रेस वार्ता में संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने जानकारी दी कि शताब्दी वर्ष के दौरान संघ के कार्यकर्ताओं ने जिस समर्पण और उत्साह के साथ कार्य किया, वह आगामी पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्पद है। उत्तर क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल ने बताया कि हरियाणा प्रांत ने इस आयोजन के लिए महीनों से तैयारी की और संघ के स्वयंसेवकों ने पूरी निष्ठा से व्यवस्था संभाली।

अगले सौ वर्षों की नींव : संघ की दूरदर्शी रणनीति

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की यह बैठक केवल एक वार्षिक समीक्षा तक सीमित नहीं थी यह संघ की आगामी शताब्दी के लिए एक सुदृढ़ नींव रखने का प्रयास थी। पिछले 100 वर्षों में संघ ने जो संगठन खड़ा किया है, उसमें शाखाओं का विस्तार, प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की फौज और समाज के हर तबके में पहुँच ये तीन स्तंभ सबसे महत्त्वपूर्ण रहे हैं। अब जब संघ अपनी दूसरी शताब्दी में प्रवेश कर चुका है, प्रतिनिधि सभा में यह सुनिश्चित करने का प्रयास हुआ कि इन स्तंभों को और सुदृढ़ किया जाए और नई चुनौतियों डिजिटल युग, वैश्वीकरण, सामाजिक विखंडन का सामना करने के लिए संगठन को तैयार किया जाए। आगामी वर्ष में नागपुर में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में संगठन के पुनर्गठन को औपचारिक रूप दिया जाएगा। तब तक देशभर में 96 प्रशिक्षण वर्गों के माध्यम से हजारों नए प्रशिक्षित कार्यकर्ता तैयार होंगे। गृह संपर्क अभियान का दूसरा चरण शेष प्रांतों में पूरा होगा और संत रविदास जी के 650वें प्राकट्य वर्ष के कार्यक्रम समाज में समरसता का नया वातावरण बनाएंगे।

समालखा की इस तीन दिवसीय बैठक से निकला संदेश स्पष्ट है संघ न केवल संगठनात्मक रूप से विस्तार कर रहा है, बल्कि वैचारिक रूप से भी अधिक परिपक्व और समावेशी होता जा रहा है। जातिवाद को नकारना, सर्व-समावेशी हिन्दुत्व की व्याख्या, पर्यावरण के प्रति जागरूकता, गौसेवा और ग्राम विकास ये सब मिलकर संघ की उस बहुआयामी दृष्टि को प्रतिबिंबित करते हैं, जो केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की व्यापक संकल्पना को समाहित करती है। 1925 से आरंभ हुई यात्रा एक नई उड़ान की ओर अग्रसर है और समालखा का यह महामंथन उसी उड़ान की तैयारी का प्रतीक है।

संवाद 24 विशेष संवाददाता 

Samvad 24 Office
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