भंडारण का डर, गिरते दाम… बागों में ढेर कर आलू बचाने की जुगत में किसान

आलू के गिरते बाजार भाव और भंडारण के बढ़ते खर्च के बीच जिले के किसान नई मुसीबत से जूझ रहे हैं। पिछले साल की मंदी से हुए नुकसान के बाद इस बार किसान शीतगृहों में आलू रखने से बच रहे हैं। कई गांवों में किसान खेतों और बागों में ही आलू के ढेर लगाकर बेहतर कीमत मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

43 हजार हेक्टेयर में खेती, 10 लाख टन से अधिक भंडारण क्षमता

फर्रुखाबाद जनपद आलू उत्पादन के लिए प्रदेश के प्रमुख क्षेत्रों में गिना जाता है। जिले में लगभग 43 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में आलू की खेती होती है। यहां 111 शीतगृह संचालित हैं, जिनमें करीब 10.30 लाख मीट्रिक टन आलू भंडारण की क्षमता है। हालांकि पिछले वर्ष भंडारित आलू को कम दाम मिलने से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस बार नई फसल आने के साथ ही बाजार में कीमतों की मंदी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश की कई मंडियों में आलू का औसत भाव करीब ₹400 से ₹800 प्रति क्विंटल तक दर्ज किया गया है, जो कई किसानों के लिए लागत से भी कम है।

मंडी में दाम कम, इसलिए खेत-बाग में जमा हो रहा आलू

मंडी में कम भाव मिलने के कारण किसान तुरंत बिक्री से बच रहे हैं। कई किसान खेत से आलू खोदने के बाद उसे सीधे बागों और खाली स्थानों पर ढेर लगाकर रख रहे हैं। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में दाम बढ़ेंगे तो वही आलू मंडी में बेचकर घाटे से बच सकेंगे। शमसाबाद क्षेत्र के गांव प्रहलादपुर, संतोषपुर और आसपास के गांवों में इन दिनों खेतों और बागों में आलू के बड़े-बड़े ढेर देखे जा सकते हैं।

एक ही बाग में 50 से अधिक किसानों का आलू

प्रहलादपुर गांव के पास लगभग 15 बीघा के एक बाग में 50 से अधिक किसानों ने अलग-अलग स्थानों पर आलू के ढेर लगा दिए हैं। किसान रामनिवास ने करीब आठ बीघा खेत का आलू बाग में रख दिया है। इसके अलावा रामभजन, ऋषिपाल, रामप्रकाश, हरवेंद्र सिंह, पप्पू, सियाराम और पंकज राजपूत सहित कई किसान अपने आलू को यहीं जमा किए हुए हैं। किसानों का कहना है कि यदि दाम नहीं बढ़े तो उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए फिलहाल वे मंडी ले जाने के बजाय कीमत बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं।

भंडारण और बारदाना का खर्च बढ़ा रहा डर

प्रहलादपुर निवासी किसान नरेंद्र राजपूत बताते हैं कि अभी आलू बेचने पर लागत भी नहीं निकल पा रही है। यदि शीतगृह में भंडारण कराया जाए तो पैकेट और अन्य खर्च मिलाकर करीब 200 रुपये प्रति पैकेट अतिरिक्त लागत बढ़ जाती है। ऐसे में किसान जोखिम उठाने के बजाय खुले में ढेर लगाकर इंतजार करना बेहतर समझ रहे हैं। इसी गांव के किसान विकास राजपूत के अनुसार एक बीघा आलू की फसल तैयार करने में करीब 10 हजार रुपये तक खर्च आता है, जबकि वर्तमान कीमतों पर बेचने पर लगभग 8 हजार रुपये प्रति बीघा ही मिल रहे हैं। इससे सीधा घाटा हो रहा है।

कृषि वैज्ञानिक की सलाह: छाया में रखें, ढेर ऊंचा न लगाएं

फसल सुरक्षा के कृषि वैज्ञानिक अभिमन्यु यादव का कहना है कि खेत या बाग में आलू रखते समय सावधानी जरूरी है। किसानों को आलू का ढेर बहुत ऊंचा नहीं लगाना चाहिए और उसे छाया में रखकर पुआल से ढक देना चाहिए। तापमान बढ़ने पर ढेर में रखे आलू जल्दी खराब हो सकते हैं, इसलिए अधिक समय तक रोकने के बजाय उचित अवसर मिलते ही बिक्री करने का प्रयास करना चाहिए।

Anuj Singh
Anuj Singh

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Get regular updates on your mail from Samvad 24 News