महिलाएं पायल और बिछुए क्यों पहनती हैं? जानिए परंपरा के पीछे छिपा वैज्ञानिक रहस्य!

संवाद 24 डेस्क। भारतीय संस्कृति में आभूषण केवल सौंदर्य-वर्धक वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक परंपराओं का प्रतीक भी हैं। महिलाओं के पैरों में पहनी जाने वाली पायल (नूपुर) और बिछुए (टो-रिंग) इसी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सदियों से भारतीय समाज में विवाहित और अविवाहित महिलाओं के पैरों में इन आभूषणों को देखा जाता रहा है। हालांकि आधुनिक समय में फैशन और व्यक्तिगत पसंद ने इनके स्वरूप और उपयोग को प्रभावित किया है, फिर भी इनके पीछे छिपे भावनात्मक, सामाजिक और वैज्ञानिक कारण आज भी प्रासंगिक हैं। यह लेख इन्हीं पहलुओं का तथ्यात्मक और संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सांस्कृतिक परंपरा
पायल और बिछुए का उल्लेख प्राचीन भारतीय ग्रंथों, पुराणों और काव्य साहित्य में मिलता है। संस्कृत साहित्य में पायल को ‘नूपुर’ कहा गया है, जिसका अर्थ है — ऐसा आभूषण जो मधुर ध्वनि उत्पन्न करे। रामायण और महाभारत में भी महिलाओं द्वारा पायल पहनने का उल्लेख मिलता है। दक्षिण भारत में शास्त्रीय नृत्य परंपराओं में नूपुर की ध्वनि को लय और ताल से जोड़ा गया है।
बिछुए विशेष रूप से विवाह के प्रतीक के रूप में जाने जाते हैं। उत्तर भारत में विवाहित महिलाओं के लिए बिछुए पहनना एक अनिवार्य परंपरा माना जाता रहा है। यह प्रथा इतनी गहराई से जुड़ी है कि विवाह के दौरान वर पक्ष द्वारा वधू को बिछुए पहनाने की रस्म आज भी कई क्षेत्रों में निभाई जाती है।

भावनात्मक और सामाजिक महत्व
भारतीय समाज में आभूषणों का गहरा भावनात्मक संबंध होता है। पायल और बिछुए केवल धातु के टुकड़े नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान और वैवाहिक स्थिति के प्रतीक होते हैं। विवाहित महिला के पैरों में बिछुए उसकी वैवाहिक स्थिति का संकेत देते हैं। यह एक सामाजिक संदेश भी होता है कि वह महिला विवाहित है।
पायल की मधुर ध्वनि को घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। पारंपरिक सोच के अनुसार, जब महिला घर में चलती है और पायल की आवाज़ आती है, तो वह घर के वातावरण में सौम्यता और उल्लास का संचार करती है। कई परिवारों में यह माना जाता है कि पायल की ध्वनि से घर के सदस्य सतर्क रहते हैं और परिवार में मर्यादा बनी रहती है।
भावनात्मक स्तर पर भी यह आभूषण स्त्री को अपनी परंपराओं और जड़ों से जोड़ते हैं। कई महिलाओं के लिए पायल और बिछुए उनके विवाह की याद, ससुराल में पहला कदम और जीवन के नए अध्याय का प्रतीक होते हैं।

धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण
हिंदू धर्म में पैरों को शरीर का आधार माना गया है, लेकिन मंदिरों में सोने के आभूषण पैरों में पहनना वर्जित माना जाता है। यही कारण है कि पायल और बिछुए अधिकतर चांदी के बनाए जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सोना देवी-देवताओं को समर्पित धातु है और इसे पैरों में पहनना उचित नहीं समझा जाता।
कुछ मान्यताओं के अनुसार पायल की ध्वनि नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है। यह विचार आध्यात्मिक है, जिसका सीधा वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, लेकिन लोकविश्वास में इसका महत्व है। भारतीय परंपरा में ध्वनि को ऊर्जा का रूप माना गया है — जैसे शंखनाद, घंटियों की ध्वनि, मंत्रोच्चार आदि। इसी संदर्भ में पायल की मधुर ध्वनि को भी सकारात्मक माना गया।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण: धातु और स्वास्थ्य
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो पायल और बिछुए का संबंध शरीर के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं से जुड़ा है। बिछुए आमतौर पर पैरों की दूसरी उंगली में पहने जाते हैं। आयुर्वेद और एक्यूप्रेशर सिद्धांत के अनुसार, पैरों की उंगलियों में ऐसे नस-बिंदु होते हैं जो गर्भाशय और प्रजनन तंत्र से जुड़े होते हैं।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बिछुए पहनने से इन बिंदुओं पर हल्का दबाव पड़ता है, जिससे रक्त संचार बेहतर होता है और मासिक धर्म चक्र संतुलित रहने में सहायता मिल सकती है। हालांकि इस विषय पर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में व्यापक शोध सीमित है, फिर भी एक्यूप्रेशर और रिफ्लेक्सोलॉजी के सिद्धांत इसे आंशिक समर्थन देते हैं।
पायल प्रायः चांदी की होती है। चांदी एक उत्कृष्ट विद्युत चालक धातु है और इसमें जीवाणुरोधी गुण भी पाए जाते हैं। कुछ अध्ययनों में चांदी के आयनों को बैक्टीरिया के विकास को रोकने में सक्षम पाया गया है। परंपरागत मान्यता है कि चांदी शरीर की अतिरिक्त गर्मी को संतुलित करती है। हालांकि यह दावा पूर्ण वैज्ञानिक प्रमाणों से पुष्ट नहीं है, लेकिन धातुओं के शरीर पर प्रभाव को लेकर अनुसंधान जारी हैं।

ध्वनि और मनोवैज्ञानिक प्रभाव
पायल की मधुर ध्वनि केवल सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी उत्पन्न कर सकती है। ध्वनि चिकित्सा (साउंड थेरेपी) के सिद्धांतों के अनुसार मधुर और लयबद्ध ध्वनियां मानसिक शांति और सकारात्मक भावनाओं को बढ़ावा दे सकती हैं। जब महिला चलती है और पायल की हल्की आवाज सुनाई देती है, तो यह उसके लिए आत्म-उपस्थिति का एहसास कराती है।
ग्रामीण समाज में पायल की ध्वनि का एक व्यावहारिक पक्ष भी था। पुराने समय में संयुक्त परिवारों में घर बड़े होते थे और महिलाओं की उपस्थिति की सूचना ध्वनि से मिल जाती थी। इसे शालीनता और सामाजिक मर्यादा से भी जोड़ा गया।

वैवाहिक प्रतीक के रूप में बिछुए
बिछुए विशेष रूप से विवाहित महिलाओं से जुड़े होते हैं। यह मंगलसूत्र और सिंदूर की तरह विवाह का प्रतीक माने जाते हैं। उत्तर भारत में अविवाहित लड़कियां सामान्यतः बिछुए नहीं पहनतीं। यह परंपरा सामाजिक संरचना से जुड़ी है, जहां विवाह के बाद महिला की सामाजिक भूमिका में परिवर्तन को चिह्नित किया जाता है।
हालांकि शहरी क्षेत्रों में यह भेद अब कम होता जा रहा है और फैशन के रूप में अविवाहित युवतियां भी टो-रिंग पहनती हैं, लेकिन पारंपरिक परिवारों में इसका सांस्कृतिक महत्व आज भी बना हुआ है।

आयुर्वेदिक और पारंपरिक चिकित्सा दृष्टिकोण
आयुर्वेद में शरीर को ऊर्जा बिंदुओं का समुच्चय माना गया है। पैरों को शरीर का महत्वपूर्ण केंद्र बताया गया है क्योंकि वहां अनेक नाड़ियां मिलती हैं। बिछुए पहनने से दूसरे पैर की उंगली पर जो दबाव पड़ता है, उसे गर्भाशय से जुड़ी नसों को सक्रिय करने वाला माना जाता है। कुछ पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार यह प्रजनन क्षमता और हार्मोन संतुलन में सहायक हो सकता है।
हालांकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इन दावों की सार्वभौमिक पुष्टि नहीं करता, लेकिन रिफ्लेक्सोलॉजी में पैरों के बिंदुओं को विभिन्न अंगों से जोड़ा जाता है। यह क्षेत्र अभी भी शोध का विषय है।

सामाजिक अनुशासन और पारिवारिक संरचना
प्राचीन भारतीय समाज में आभूषणों का एक उद्देश्य सामाजिक अनुशासन बनाए रखना भी था। पायल की ध्वनि से घर के बड़े-बुजुर्गों को महिला की उपस्थिति का आभास हो जाता था। इसे पारदर्शिता और पारिवारिक सम्मान से जोड़ा गया।
हालांकि आधुनिक दृष्टिकोण से यह विचार कुछ हद तक पितृसत्तात्मक संरचना को दर्शाता है, लेकिन ऐतिहासिक संदर्भ में यह सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा था। आज के समय में महिलाएं पायल और बिछुए को अपनी पसंद और फैशन के आधार पर पहनती हैं, न कि सामाजिक नियंत्रण के प्रतीक के रूप में।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य: परंपरा और फैशन का संगम
आज के दौर में पायल और बिछुए केवल परंपरा तक सीमित नहीं हैं। डिजाइनर ज्वेलरी में इनका नया रूप देखने को मिलता है। युवतियां इन्हें जींस, स्कर्ट और वेस्टर्न आउटफिट्स के साथ भी पहनती हैं। सिल्वर, ऑक्सीडाइज्ड और यहां तक कि आर्टिफिशियल मेटल में भी ये उपलब्ध हैं।
फैशन इंडस्ट्री ने इन पारंपरिक आभूषणों को वैश्विक पहचान दी है। कई अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स ने भारतीय नूपुर और टो-रिंग से प्रेरित डिजाइन प्रस्तुत किए हैं।

वैज्ञानिक दावों पर संतुलित दृष्टिकोण
यह आवश्यक है कि पायल और बिछुए से जुड़े वैज्ञानिक दावों को संतुलित दृष्टिकोण से देखा जाए। कुछ पारंपरिक मान्यताएं अनुभव और लोकज्ञान पर आधारित हैं, जिनका आधुनिक विज्ञान में पूर्ण परीक्षण नहीं हुआ है। इसलिए यह कहना उचित होगा कि इन आभूषणों के स्वास्थ्य लाभ संभावित हो सकते हैं, लेकिन इन्हें चिकित्सीय उपचार का विकल्प नहीं माना जा सकता।
चांदी के जीवाणुरोधी गुणों और एक्यूप्रेशर के सिद्धांतों के आधार पर कुछ लाभ संभव हैं, लेकिन इस विषय पर और शोध की आवश्यकता है।

पायल और बिछुए भारतीय संस्कृति की गहराई और विविधता का प्रतीक हैं। ये आभूषण केवल सजावट का साधन नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव, सामाजिक पहचान, धार्मिक विश्वास और संभावित वैज्ञानिक आधार का संगम हैं। जहां एक ओर ये विवाहित महिला की पहचान का प्रतीक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आधुनिक समय में ये व्यक्तिगत अभिव्यक्ति और फैशन का हिस्सा बन चुके हैं।
भावनात्मक रूप से ये परंपराओं से जुड़ाव का माध्यम हैं। धार्मिक दृष्टि से ये शुभता और सकारात्मक ऊर्जा के प्रतीक माने जाते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इनमें कुछ संभावित स्वास्थ्य लाभों की चर्चा की जाती है, हालांकि इस पर और शोध अपेक्षित है।

यह कहा जा सकता है कि पायल और बिछुए भारतीय जीवन शैली का अभिन्न अंग हैं, जो समय के साथ बदलते हुए भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े हुए हैं। परंपरा और आधुनिकता के इस संगम में ये आभूषण आज भी भारतीय नारी की पहचान और सौंदर्य का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं।

Geeta Singh
Geeta Singh

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