क्या सच में ठंडक देता है काजल? जानिए परंपरा और विज्ञान क्या कहते हैं
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संवाद 24 डेस्क। भारतीय संस्कृति में श्रृंगार का महत्व केवल बाहरी सौंदर्य तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आयामों से भी जुड़ा रहा है। इन्हीं श्रृंगार सामग्रियों में से एक है काजल (Kohl), जो प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक भारतीय जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है। आंखों की सुंदरता को निखारने के साथ-साथ इसे स्वास्थ्य, सुरक्षा और परंपरा का प्रतीक भी माना गया है। आज के समय में, जब सौंदर्य उद्योग तेजी से विकसित हो रहा है, तब भी काजल की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। बल्कि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक परीक्षणों के साथ यह और अधिक सुरक्षित तथा प्रभावी रूप में बाजार में उपलब्ध है।
भारतीय उपमहाद्वीप में काजल का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में “अंजन” का उल्लेख मिलता है, जो आंखों की सफाई और रोगों की रोकथाम के लिए उपयोग किया जाता था। प्राचीन समय में महिलाएं ही नहीं, बल्कि पुरुष और बच्चे भी काजल लगाते थे। इसे न केवल सौंदर्य के लिए बल्कि धूल, धूप और संक्रमण से आंखों की रक्षा के लिए भी उपयोग किया जाता था। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी घर पर पारंपरिक विधि से काजल तैयार किया जाता है, जिसमें दीपक की लौ से प्राप्त कालिख, घी या तेल का प्रयोग किया जाता है। यह विधि प्राकृतिक और रसायन-मुक्त मानी जाती है।
सांस्कृतिक दृष्टि से काजल को बुरी नज़र से बचाव का प्रतीक भी माना गया है। भारतीय समाज में नवजात शिशुओं की आंखों या माथे पर काजल का टीका लगाने की परंपरा आज भी प्रचलित है। यह विश्वास है कि इससे बच्चे को नकारात्मक ऊर्जा या ईर्ष्यालु दृष्टि से सुरक्षा मिलती है। भले ही वैज्ञानिक रूप से “बुरी नज़र” की अवधारणा को प्रमाणित न किया गया हो, लेकिन सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह परंपरा परिवारों में सुरक्षा और स्नेह की भावना को दर्शाती है।
काजल का एक प्रमुख गुण यह माना जाता है कि यह आंखों को ठंडक प्रदान करता है। विशेषकर गर्मियों के मौसम में, जब तेज धूप और गर्म हवाएं आंखों को प्रभावित करती हैं, तब पारंपरिक घी या कपूर मिश्रित काजल आंखों में शीतलता का अनुभव कराता है। आयुर्वेद में कुछ विशेष प्रकार के अंजन का उल्लेख है जो नेत्र रोगों में लाभकारी बताए गए हैं। हालांकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान यह सुझाव देता है कि किसी भी घरेलू उत्पाद को आंखों में लगाने से पहले उसकी शुद्धता और स्वच्छता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
सौंदर्य की दृष्टि से काजल आंखों को बड़ा, गहरा और आकर्षक दिखाने में सहायक होता है। भारतीय नृत्य शैलियों जैसे भरतनाट्यम, कथक और ओडिसी में आंखों के भाव अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इन शास्त्रीय नृत्यों में काजल का प्रयोग आंखों की अभिव्यक्ति को स्पष्ट और प्रभावशाली बनाने के लिए किया जाता है। फिल्म और फैशन उद्योग में भी काजल का व्यापक उपयोग होता है। विभिन्न रंगों और टेक्सचर में उपलब्ध आधुनिक काजल उत्पाद आज युवाओं के बीच विशेष लोकप्रिय हैं।
बाजार में उपलब्ध काजल के प्रकारों पर नजर डालें तो पारंपरिक हर्बल काजल से लेकर वॉटरप्रूफ, स्मज-प्रूफ और जेल आधारित काजल तक अनेक विकल्प मौजूद हैं। कॉस्मेटिक कंपनियां अब त्वचा विशेषज्ञों द्वारा परीक्षण किए गए, हाइपोएलर्जेनिक और कैमिकल-फ्री काजल का दावा करती हैं। हालांकि उपभोक्ताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे उत्पाद खरीदते समय उसकी सामग्री (Ingredients) और गुणवत्ता प्रमाणन को ध्यानपूर्वक जांचें।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि काजल में सीसा (Lead) या अन्य हानिकारक तत्व मौजूद हों, तो यह आंखों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। कुछ शोधों में पारंपरिक या असुरक्षित काजल में भारी धातुओं की मौजूदगी पाई गई है, जो बच्चों के लिए विशेष रूप से हानिकारक हो सकती है। इसलिए चिकित्सक सलाह देते हैं कि विश्वसनीय ब्रांड और प्रमाणित उत्पादों का ही उपयोग किया जाए। साथ ही, काजल को साझा करने से बचना चाहिए क्योंकि इससे संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
आधुनिक समय में काजल केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। फैशन के बदलते रुझानों के साथ पुरुषों में भी आई-मेकअप का चलन बढ़ा है। बॉलीवुड और फैशन जगत के कई कलाकार सार्वजनिक मंचों पर काजल लगाए दिखाई देते हैं, जिससे यह एक जेंडर-न्यूट्रल सौंदर्य उत्पाद के रूप में भी स्थापित हो रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मेकअप ट्यूटोरियल्स में काजल के नए-नए प्रयोग दिखाए जाते हैं, जैसे स्मोकी आई लुक, विंग्ड लाइनर या ग्राफिक आई डिजाइन।
आर्थिक दृष्टि से भी काजल उद्योग महत्वपूर्ण है। भारतीय कॉस्मेटिक बाजार में आई-मेकअप सेगमेंट तेजी से बढ़ रहा है, जिसमें काजल प्रमुख उत्पादों में शामिल है। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और ब्यूटी रिटेल स्टोर्स पर इसकी व्यापक उपलब्धता ने उपभोक्ताओं तक इसकी पहुंच को आसान बना दिया है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स के बीच प्रतिस्पर्धा ने गुणवत्ता और नवाचार को बढ़ावा दिया है।
पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी अब प्राकृतिक और ऑर्गेनिक काजल की मांग बढ़ रही है। उपभोक्ता ऐसे उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं जो पशु परीक्षण (Cruelty-Free) से मुक्त हों और पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग में उपलब्ध हों। इससे कॉस्मेटिक उद्योग में स्थिरता (Sustainability) की दिशा में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि काजल लगाते समय स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सोने से पहले काजल को पूरी तरह हटाना आवश्यक है, ताकि आंखों के रोमछिद्र बंद न हों और संक्रमण का खतरा कम हो। मेकअप रिमूवर या साफ नारियल तेल की सहायता से इसे हटाया जा सकता है। नियमित अंतराल पर काजल स्टिक या पेंसिल को बदलना भी उचित माना जाता है।
समग्र रूप से देखा जाए तो काजल भारतीय संस्कृति, सौंदर्य और स्वास्थ्य परंपराओं का संगम है। यह केवल एक कॉस्मेटिक उत्पाद नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक विरासत भी है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। हालांकि आधुनिक विज्ञान और चिकित्सा के आलोक में इसके उपयोग में सावधानी बरतना आवश्यक है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक और सामाजिक प्रासंगिकता आज भी उतनी ही मजबूत है जितनी सदियों पहले थी।
काजल भारतीय जीवनशैली में सौंदर्य, परंपरा और विश्वास का प्रतीक है। बदलते समय के साथ इसकी बनावट और प्रस्तुति में परिवर्तन आया है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य आंखों की सुंदरता को निखारना और उन्हें संरक्षित रखना आज भी कायम है। यदि सुरक्षित और प्रमाणित उत्पादों का चयन किया जाए, तो काजल न केवल सौंदर्य बढ़ाने का माध्यम है, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी अभिन्न अंग है। संवाद 24 के पाठकों के लिए यह आवश्यक है कि वे परंपरा और आधुनिकता के संतुलन के साथ इस उत्पाद का उपयोग करें, ताकि सौंदर्य के साथ-साथ स्वास्थ्य भी सुरक्षित रह सके।






