राष्ट्रपति भवन में इतिहास का नया अध्याय, लुटियंस की जगह राजाजी की प्रतिमा स्थापित
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संवाद 24 नई दिल्ली। राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में आज एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला, जिसने देश की ऐतिहासिक स्मृतियों और प्रतीकों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। यहां स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय गवर्नर-जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) की प्रतिमा स्थापित की गई। इससे पहले इसी स्थान पर ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा लगी हुई थी।
राष्ट्रपति ने किया अनावरण
इस प्रतिमा का अनावरण राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने एक विशेष कार्यक्रम के दौरान किया। समारोह में कई गणमान्य अतिथि, सांस्कृतिक प्रतिनिधि और विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुख लोग उपस्थित रहे। राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि यह कदम भारत की आत्मगौरव और स्वतंत्र पहचान को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
औपनिवेशिक प्रतीकों से आगे बढ़ने का संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस बदलाव को देश की मानसिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता से जोड़ा। उन्होंने कहा कि भारत अब उन प्रतीकों को प्राथमिकता दे रहा है जो स्वतंत्रता, स्वाभिमान और भारतीय मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह परिवर्तन केवल प्रतिमा बदलने तक सीमित नहीं, बल्कि सोच में बदलाव का संकेत है।
कौन थे राजाजी?
राजाजी स्वतंत्र भारत के पहले और एकमात्र भारतीय गवर्नर-जनरल थे। वे स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय नेता, लेखक और विचारक भी रहे। उन्होंने प्रशासन में सादगी, नैतिकता और पारदर्शिता पर जोर दिया। उनके योगदान को लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाता रहा है।
लुटियंस की विरासत पर बहस
ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस ने नई दिल्ली के कई प्रमुख भवनों की डिजाइन तैयार की थी, जिनमें राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट जैसे स्मारक शामिल हैं। हालांकि उनका वास्तुशिल्प योगदान ऐतिहासिक महत्व रखता है, लेकिन अब भारत अपने स्वतंत्रता सेनानियों और भारतीय नेतृत्व को प्रमुख स्थान देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
प्रदर्शनी और सांस्कृतिक कार्यक्रम
प्रतिमा स्थापना के साथ ही राजाजी के जीवन और विचारों पर आधारित एक विशेष प्रदर्शनी भी आयोजित की जा रही है। इसमें उनके राजनीतिक जीवन, साहित्यिक योगदान और प्रशासनिक दृष्टिकोण को दर्शाया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी उनके विचारों से प्रेरणा ले सके।
बदलाव का व्यापक अर्थ
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों के पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया का हिस्सा है। इससे यह संदेश जाता है कि भारत अपने अतीत को स्वीकार करते हुए भी अपनी स्वतंत्र पहचान को प्राथमिकता दे रहा है।
नई सोच की ओर संकेत
राष्ट्रपति भवन जैसे प्रतिष्ठित स्थल पर यह बदलाव आने वाले समय में अन्य ऐतिहासिक स्थलों पर भी प्रभाव डाल सकता है। यह कदम दर्शाता है कि भारत अब अपने नायकों को उसी सम्मान के साथ प्रस्तुत करना चाहता है, जो उसकी स्वतंत्रता और संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण रहे हैं।






