क्या भाषा केवल शब्द है? जानिए क्यों यह हमारी संस्कृति की असली धड़कन है

संवाद 24 डेस्क। भाषा केवल शब्दों का संयोजन या विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं है; यह किसी समाज की सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक अनुभवों और सामूहिक स्मृतियों की जीवित अभिव्यक्ति है। जब हम कहते हैं कि “भाषा केवल संवाद नहीं, संस्कृति की धड़कन है”, तो हम उस गहरे संबंध को स्वीकार करते हैं जो भाषा और समाज के अस्तित्व के बीच स्थापित है। भाषा में केवल ध्वनियाँ और व्याकरण नहीं होते, बल्कि उसमें पीढ़ियों का अनुभव, परंपराओं की निरंतरता, जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति और सामाजिक संरचनाओं की झलक भी समाहित होती है। किसी भी राष्ट्र या समुदाय की पहचान उसके पहनावे, भोजन या भौगोलिक सीमाओं से उतनी स्पष्ट नहीं होती, जितनी उसकी भाषा से होती है।

भाषा संस्कृति का वाहक है। किसी समाज की लोककथाएँ, गीत, मुहावरे, कहावतें, साहित्य और धार्मिक ग्रंथ उसी भाषा में जीवंत रहते हैं जिसमें वह समाज सोचता और जीता है। यदि भाषा समाप्त हो जाती है तो उसके साथ एक संपूर्ण सांस्कृतिक संसार भी विलुप्त हो जाता है। यही कारण है कि दुनिया भर में भाषाई संरक्षण को सांस्कृतिक संरक्षण का अनिवार्य अंग माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने भी कई बार चेताया है कि विश्व की अनेक भाषाएँ विलुप्ति के कगार पर हैं, और उनके साथ अनेक समुदायों की पहचान भी संकट में है।

भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा का महत्व और भी व्यापक है। यहाँ सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना साहित्य, अपनी लोकपरंपरा और अपनी सांस्कृतिक धारा है। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है, लेकिन इसके अतिरिक्त भी अनेक क्षेत्रीय भाषाएँ और बोलियाँ देश की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बनाती हैं। हिंदी, तमिल, बंगाली, मराठी, पंजाबी, उर्दू, कन्नड़, असमिया जैसी भाषाएँ केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान हैं।

भाषा और संस्कृति का संबंध ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत गहरा है। प्राचीन सभ्यताओं के अध्ययन में भाषा प्रमुख स्रोत के रूप में सामने आती है। किसी भी सभ्यता के विकास, उसके विचार-तंत्र, सामाजिक ढाँचे और धार्मिक मान्यताओं को समझने के लिए उसकी भाषा का अध्ययन आवश्यक है। संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल और अन्य प्राचीन भारतीय भाषाएँ आज भी हमारे अतीत को समझने का माध्यम हैं। वे केवल ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक विरासत हैं।

आधुनिक युग में वैश्वीकरण और तकनीकी विकास ने भाषाओं के सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं। एक ओर इंटरनेट और सोशल मीडिया ने भाषाई अभिव्यक्ति को नया मंच दिया है, वहीं दूसरी ओर कुछ प्रमुख वैश्विक भाषाओं का वर्चस्व स्थानीय भाषाओं के अस्तित्व के लिए चुनौती बन गया है। अंग्रेजी का वैश्विक महत्व निर्विवाद है, परंतु यदि स्थानीय भाषाओं की उपेक्षा होती है तो सांस्कृतिक विविधता प्रभावित होती है। इसलिए संतुलन आवश्यक है—वैश्विक संपर्क के लिए एक साझा भाषा हो सकती है, लेकिन सांस्कृतिक जड़ों के लिए मातृभाषा का संरक्षण अनिवार्य है।

शिक्षा के क्षेत्र में भाषा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में अधिक प्रभावी ढंग से सीखते हैं। जब शिक्षा मातृभाषा में दी जाती है, तो ज्ञान की ग्रहणशीलता बढ़ती है और रचनात्मकता का विकास होता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा या स्थानीय भाषा में देने पर बल दिया है। यह कदम न केवल शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सांस्कृतिक सुदृढ़ीकरण की दिशा में भी सकारात्मक पहल है।

भाषा सामाजिक समरसता का आधार भी है। जब किसी समुदाय की भाषा को सम्मान मिलता है, तो उस समुदाय की आत्मगौरव की भावना सुदृढ़ होती है। इसके विपरीत, यदि किसी भाषा को हाशिए पर डाल दिया जाता है, तो उससे जुड़ा समाज भी उपेक्षित महसूस करता है। इसलिए भाषाई विविधता का सम्मान सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवश्यक है। भारत में समय-समय पर भाषाई आंदोलनों ने यह सिद्ध किया है कि भाषा केवल व्याकरण का विषय नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और अधिकार का प्रश्न भी है।

साहित्य भाषा की आत्मा है। किसी भी भाषा की समृद्धि उसके साहित्य से मापी जाती है। हिंदी साहित्य में कबीर, तुलसीदास, प्रेमचंद और महादेवी वर्मा जैसे रचनाकारों ने सामाजिक चेतना को दिशा दी। तमिल, बंगाली, मराठी और अन्य भाषाओं का साहित्य भी अपने-अपने समाज की संवेदनाओं को अभिव्यक्त करता है। साहित्य के माध्यम से भाषा केवल संवाद नहीं करती, बल्कि समाज को सोचने, प्रश्न करने और परिवर्तन की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देती है।

डिजिटल युग में भाषा की भूमिका और भी व्यापक हो गई है। आज क्षेत्रीय भाषाओं में समाचार पोर्टल, ब्लॉग, यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे भाषाई लोकतंत्रीकरण को बल मिला है। अब ज्ञान और सूचना केवल कुछ चुनिंदा भाषाओं तक सीमित नहीं रही। डिजिटल तकनीक ने स्थानीय भाषाओं को नया जीवन दिया है। हालांकि, तकनीकी संसाधनों का संतुलित विकास आवश्यक है ताकि सभी भाषाओं को समान अवसर मिल सके।

भाषा आर्थिक विकास से भी जुड़ी है। जब किसी क्षेत्र की भाषा में प्रशासनिक और व्यावसायिक गतिविधियाँ संचालित होती हैं, तो स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ती है। भाषा कौशल रोजगार के अवसरों को प्रभावित करता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी मातृभाषा के साथ-साथ अन्य भाषाओं में भी दक्ष हो, तो उसके लिए अवसरों का दायरा विस्तृत हो जाता है। इसलिए

बहुभाषिकता को प्रोत्साहित करना समय की आवश्यकता है।
संस्कृति और भाषा का संबंध केवल अतीत तक सीमित नहीं है; यह भविष्य की दिशा भी तय करता है। यदि हम अपनी भाषाओं को संरक्षित और समृद्ध करते हैं, तो हम आने वाली पीढ़ियों को एक सशक्त सांस्कृतिक आधार प्रदान करते हैं। भाषा के माध्यम से ही मूल्य, परंपराएँ और सामाजिक अनुभव पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते हैं। इस प्रक्रिया में परिवार, विद्यालय और समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भाषाई संरक्षण के लिए सरकारी नीतियों के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता भी आवश्यक है। केवल औपचारिक मान्यता पर्याप्त नहीं है; भाषा को दैनिक जीवन में प्रयोग और सम्मान मिलना चाहिए। मीडिया, साहित्य, शिक्षा और प्रशासन सभी क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं का सशक्त उपयोग सुनिश्चित करना होगा। तभी यह कहा जा सकेगा कि भाषा वास्तव में संस्कृति की धड़कन के रूप में जीवित है।

भाषा मानवता की साझा धरोहर है। प्रत्येक भाषा अपने भीतर एक विशिष्ट दृष्टिकोण, जीवन दर्शन और अभिव्यक्ति की शैली समेटे हुए है। जब हम किसी भाषा का सम्मान करते हैं, तो हम उस संस्कृति और उस समुदाय के अस्तित्व का सम्मान करते हैं। “भाषा केवल संवाद नहीं, संस्कृति की धड़कन है” यह कथन हमें स्मरण कराता है कि भाषाई विविधता की रक्षा केवल भावनात्मक दायित्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व भी है। एक सशक्त, समावेशी और बहुभाषी समाज ही वास्तविक अर्थों में समृद्ध और प्रगतिशील समाज कहलाता है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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