हिंदू आध्यात्मिक सेवा संस्थान के शिविर में बही भक्ति की रसधारा, भजन-कीर्तन और वैचारिक संवाद से हुआ चरित्र निर्माण पर चिंतन
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संवाद 24 प्रयागराज। भारतीय संस्कृति, सनातन जीवन मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से हिंदू आध्यात्मिक सेवा संस्थान द्वारा माघ मेला क्षेत्र के परेड मैदान स्थित शिविर में आयोजित आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम में विचार, भक्ति और संस्कार का अनुपम संगम देखने को मिला।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं प्रख्यात विद्वान प्रो. जीसी त्रिपाठी ने कहा कि “श्रीरामचरितमानस प्रत्येक व्यक्ति को नित्य पढ़ना चाहिए, क्योंकि यह केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन के हर पक्ष का मार्गदर्शन करने वाला महाग्रंथ है।”
प्रो. त्रिपाठी ने अपने संबोधन में कहा कि श्रीरामचरितमानस भारतीय समाज की आत्मा है। इसमें व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र चारों स्तरों पर आदर्श जीवन की स्पष्ट रूपरेखा मिलती है। उन्होंने कहा “भाई से भाई का संबंध कैसा हो, पिता और पुत्र का व्यवहार कैसा हो, मित्रता में मर्यादा क्या हो और शासक का चरित्र कैसा होना चाहिए—इन सभी प्रश्नों का उत्तर रामचरितमानस में सहज रूप से मिलता है।” उन्होंने वर्तमान समय की सामाजिक चुनौतियों की ओर संकेत करते हुए कहा कि नैतिक पतन, पारिवारिक विघटन और वैचारिक भ्रम के इस दौर में रामचरितमानस का नियमित अध्ययन व्यक्ति को संतुलन, संयम और करुणा प्रदान करता है।
प्रो. त्रिपाठी ने विशेष रूप से युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने दैनिक जीवन में रामचरितमानस, सुंदरकांड और हनुमान चालीसा को स्थान दें। उन्होंने कहा कि “हनुमान जी का चरित्र हमें सिखाता है कि बल, बुद्धि और विद्या का प्रयोग सदैव धर्म और सेवा के लिए होना चाहिए। यही जीवन का वास्तविक पुरुषार्थ है।”
कार्यक्रम के दौरान भक्ति संगीत की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने वातावरण को पूर्णतः आध्यात्मिक बना दिया। प्रसिद्ध भजन गायक गणेश श्रीवास्तव ने गंगा मैया की स्तुति करते हुए जब राम नाम की महिमा का गान किया, तो पूरा पंडाल भक्ति भाव से सराबोर हो गया। उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया और अनेक श्रद्धालु ध्यानमग्न अवस्था में प्रभु श्रीराम का स्मरण करते दिखाई दिए। वरिष्ठ कलाकार हरिओम द्विवेदी की भजन प्रस्तुति ने भी शिविर को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनके भजनों में जीवन के गूढ़ संदेश और भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिला।
कार्यक्रम में भजन प्रस्तुत करने वाले कलाकारों और सहभागियों को धार्मिक साहित्य भेंट कर सम्मानित किया गया। उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता एवं सुंदरकांड की प्रतियां प्रदान की गईं तथा पारंपरिक पटका पहनाकर सम्मान किया गया। कार्यक्रम को हिंदू आध्यात्मिक सेवा संस्थान, पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र संयोजक वरिष्ठ प्रचारक अमरनाथ जी की उपस्थिति ने और गरिमापूर्ण बना दिया। उनके सान्निध्य में संपूर्ण शिविर अनुशासन, वैचारिक गंभीरता और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत दिखाई दिया।
आदरणीय अमरनाथ जी संगठन के उपाध्यक्ष नागेंद्र जी, सहसचिव वंदना तिवारी, कोषाध्यक्ष भोला तिवारी, शिविर के सह प्रभारी यश विक्रम त्रिपाठी के द्वारा कलाकारों एवं सहभागियों को श्रीमद्भगवद्गीता आदि धार्मिक ग्रंथों की प्रतियां भेंट की गईं। अमरनाथ जी के व्यक्तित्व में निहित सादगी, सेवा भाव और संगठनात्मक दृष्टि ने उपस्थित जनसमूह को गहरे रूप से प्रेरित किया। उन्होंने सनातन संस्कृति के संरक्षण और संस्कारों के विस्तार पर बल दिया।
कार्यक्रम में डॉ. प्रमोद शुक्ला, करुणा शंकर वर्मा, सुरेश यादव, आकाश पांडेय, ज्योति पांडेय, रविंद्र मिश्रा, रत्नेश राय, अनिरुद्ध पाठक, कैलाश राठौर, शिव कुमार प्रजापति, राजकुमार रावत, मंजरी सिंह, उर्मिला त्रिपाठी, सुहासिनी त्रिपाठी, राकेश शुक्ला, रोहित कुमार, सुनैना त्रिपाठी, अरुण दुबे सहित अनेक शिक्षाविद्, समाजसेवी, कार्यकर्ता और श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में ऐसे आयोजनों को समाज के नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए आवश्यक बताया।
हिंदू आध्यात्मिक सेवा संस्थान के पदाधिकारियों ने बताया कि शिविर का उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन करना नहीं है, बल्कि समाज में संस्कार निर्माण, सेवा भावना और सांस्कृतिक चेतना का विस्तार करना है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपने मूल संस्कारों से जुड़ता है, तभी परिवार सुदृढ़ होता है और परिवार के सुदृढ़ होने से ही राष्ट्र सशक्त बनता है।
वक्ताओं ने इस बात पर विशेष बल दिया कि भारत की आत्मा उसकी संस्कृति में निहित है और रामकथा उस संस्कृति की प्राणधारा है। आधुनिकता के साथ यदि सांस्कृतिक चेतना बनी रहे, तो समाज संतुलित और राष्ट्र आत्मनिर्भर बन सकता है।
माघ मेला क्षेत्र में आयोजित यह शिविर केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि विचार, भक्ति और राष्ट्रबोध का सशक्त मंच बनकर उभरा। प्रो. जीसी त्रिपाठी के वैचारिक उद्बोधन, आदरणीय अमरनाथ जी के प्रेरक सान्निध्य और भजन कलाकारों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने इसे एक स्मरणीय आध्यात्मिक आयोजन बना दिया। यह शिविर इस बात का प्रमाण है कि सनातन संस्कृति आज भी समाज को दिशा देने की पूर्ण क्षमता रखती है।






