देवर-भाभी का रिश्ता: परंपरा, मर्यादा और दोस्ती का अनोखा संगम!
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संवाद 24 डेस्क। भारतीय समाज में पारिवारिक रिश्तों की संरचना केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह भावनात्मक, सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों से भी गहराई से जुड़ी होती है। इन्हीं रिश्तों में एक विशेष स्थान देवर और भाभी के संबंध का है। परंपरागत रूप से यह रिश्ता स्नेह, सम्मान, मर्यादा और सहज मित्रता का प्रतीक माना जाता रहा है। परिवार की संयुक्त संरचना में यह संबंध घर के वातावरण को जीवंत, संतुलित और सौहार्दपूर्ण बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देवर को छोटे भाई के रूप में और भाभी को मां के समान आदर देने की परंपरा भारतीय समाज की विशिष्ट पहचान रही है।
भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन माना जाता है। जब किसी घर में बहू का आगमन होता है, तो वह केवल पत्नी की भूमिका नहीं निभाती, बल्कि पूरे परिवार के साथ संबंध स्थापित करती है। ऐसे में पति के छोटे भाई के साथ उसका रिश्ता ‘देवर-भाभी’ के रूप में विकसित होता है। यह संबंध न तो औपचारिक होता है और न ही पूर्णतः अनौपचारिक, बल्कि इसमें सम्मान और आत्मीयता का संतुलन दिखाई देता है। परंपरा के अनुसार, भाभी को घर की बड़ी बहू और मार्गदर्शक के रूप में देखा जाता है, जबकि देवर को परिवार के छोटे सदस्य के रूप में स्नेह और संरक्षण मिलता है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो भारतीय लोककथाओं, कहावतों और साहित्य में देवर-भाभी के रिश्ते का उल्लेख बार-बार मिलता है। लोकगीतों में जहां इस रिश्ते की नोक-झोंक और हास्य का चित्रण होता है, वहीं साहित्य में इसे मर्यादा और स्नेह के दायरे में दिखाया गया है। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में विवाह के अवसर पर देवर-भाभी के बीच होने वाली रस्में इस रिश्ते की सहजता और अपनत्व को दर्शाती हैं। इन रस्मों का उद्देश्य परिवार में घुलने-मिलने और नए रिश्तों को सहज बनाने का होता है।
सामाजिक संरचना में यह रिश्ता एक प्रकार से ‘सपोर्ट सिस्टम’ की तरह कार्य करता है। संयुक्त परिवारों में अक्सर देवर और भाभी के बीच संवाद और सहयोग का रिश्ता विकसित होता है। घर की जिम्मेदारियों में सहयोग, बच्चों की देखभाल में सहभागिता, और पारिवारिक निर्णयों में परामर्श—ये सभी पहलू इस रिश्ते को मजबूत बनाते हैं। कई बार भाभी परिवार में नई होती है और देवर उसके लिए घर के तौर-तरीकों को समझने में मददगार बनता है। वहीं दूसरी ओर, भाभी भी देवर के जीवन में मार्गदर्शक और शुभचिंतक की भूमिका निभाती है।
यह रिश्ता नोक-झोंक और हंसी-मजाक से भी जुड़ा होता है, जो परिवार के वातावरण को हल्का और सकारात्मक बनाए रखता है। हालांकि यह हास्य मर्यादा की सीमाओं में रहता है और इसका उद्देश्य संबंधों में सहजता लाना होता है। भारतीय संस्कृति में मर्यादा को सर्वोपरि माना गया है, इसलिए देवर-भाभी के संबंध में भी व्यवहार की सीमाएं स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं। यही सीमाएं इस रिश्ते को पवित्र और सम्मानजनक बनाए रखती हैं।
वर्तमान समय में जब संयुक्त परिवारों की संख्या घट रही है और एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ रहा है, तब भी देवर-भाभी के रिश्ते की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है। आधुनिक परिवेश में यह संबंध पारंपरिक रूप से अलग रूप ले सकता है, लेकिन उसका मूल भाव—सम्मान और स्नेह—अब भी कायम है। सोशल मीडिया और डिजिटल संवाद के दौर में भी पारिवारिक समारोहों और त्योहारों पर यह रिश्ता उतनी ही आत्मीयता से निभाया जाता है। बदलते सामाजिक ढांचे के बावजूद, पारिवारिक मूल्यों का यह आधार स्तंभ अपनी पहचान बनाए हुए है।
समाजशास्त्रियों के अनुसार, परिवार के भीतर ऐसे रिश्ते सामाजिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं। ये रिश्ते व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा, भावनात्मक सहयोग और पहचान प्रदान करते हैं। देवर-भाभी का संबंध भी इसी सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा है। यह रिश्तों की जटिल संरचना में सामंजस्य का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहां उम्र, जिम्मेदारी और मर्यादा के आधार पर भूमिकाएं तय होती हैं।
हालांकि, यह भी आवश्यक है कि किसी भी रिश्ते की गरिमा और सीमाओं का सम्मान किया जाए। आधुनिक समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारदर्शिता को महत्व दिया जा रहा है। ऐसे में परिवार के भीतर पारस्परिक सम्मान, संवाद और स्पष्टता का होना अत्यंत आवश्यक है। देवर-भाभी का रिश्ता भी तभी सुदृढ़ रह सकता है जब उसमें आपसी विश्वास, मर्यादा और स्पष्ट व्यवहारिक सीमाएं बनी रहें।
कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोण से भी परिवार के भीतर सभी रिश्तों में सम्मानजनक आचरण अपेक्षित है। किसी भी प्रकार की अनुचित टिप्पणी, व्यवहार या गलतफहमी रिश्तों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए परिवारों में संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देना आवश्यक है। पारिवारिक शिक्षा और संस्कार इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ग्रामीण और शहरी परिवेश में इस रिश्ते की अभिव्यक्ति में कुछ अंतर दिखाई दे सकता है। ग्रामीण समाज में जहां संयुक्त परिवारों की परंपरा अधिक प्रचलित रही है, वहां देवर-भाभी का संबंध दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा होता है। वहीं शहरी जीवन में, जहां परिवार छोटे होते जा रहे हैं, वहां यह रिश्ता अधिक औपचारिक और सीमित संपर्क तक सिमट सकता है। फिर भी त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों और सामाजिक कार्यक्रमों में इस रिश्ते की गर्मजोशी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
मीडिया और मनोरंजन उद्योग ने भी इस रिश्ते को विभिन्न रूपों में प्रस्तुत किया है। कई फिल्मों और धारावाहिकों में इसे हास्य, संवेदना और पारिवारिक मूल्यों के साथ चित्रित किया गया है। हालांकि कुछ मामलों में अतिरंजना भी देखने को मिलती है, लेकिन मूल रूप से यह रिश्ता सकारात्मकता और स्नेह का प्रतीक ही माना जाता है।
महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता के संदर्भ में भी इस रिश्ते को नए दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। अब भाभी केवल घर की जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह शिक्षित, आत्मनिर्भर और निर्णयों में सहभागी है। ऐसे में देवर-भाभी का संबंध भी अधिक परिपक्व और समानता पर आधारित बन रहा है। यह परिवर्तन समाज में व्यापक बदलावों का संकेत है।
आखिरकार, देवर और भाभी का रिश्ता भारतीय पारिवारिक संस्कृति की उस गहराई को दर्शाता है, जहां संबंध केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि भावनात्मक साझेदारी होते हैं। यह रिश्ता भाई-बहन के समान स्नेह, दोस्ती की सहजता और मां के समान सम्मान का संतुलित मिश्रण है। बदलते समय में भी यदि परिवार संवाद, मर्यादा और पारस्परिक सम्मान को प्राथमिकता दें, तो यह संबंध आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
भारतीय समाज की ताकत उसके पारिवारिक मूल्यों में निहित है। देवर-भाभी का रिश्ता इसी ताकत का एक जीवंत उदाहरण है, जो स्नेह, सहयोग और सामंजस्य के माध्यम से परिवार को एकजुट रखता है। परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाते हुए, यह संबंध आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पहले था।






