आस्था, आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान — सिंदूर पर उठते सवालों का विश्लेषण

संवाद 24 डेस्क। भारतीय संस्कृति में सिंदूर का स्थान केवल एक सौंदर्य प्रसाधन या वैवाहिक चिह्न के रूप में सीमित नहीं है, बल्कि यह परंपरा, आस्था, सामाजिक पहचान और आध्यात्मिक मान्यताओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। विवाह के बाद महिलाओं द्वारा मांग में सिंदूर धारण करना हिंदू समाज में सौभाग्य और दांपत्य सुख का प्रतीक माना जाता है। किंतु हाल के वर्षों में आयुर्वेद, मनोविज्ञान और वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के संदर्भ में यह दावा भी सामने आया है कि सिंदूर लगाने से मानसिक शांति, हार्मोनल संतुलन, एकाग्रता में वृद्धि और तनाव में कमी जैसे लाभ हो सकते हैं। इन दावों की तथ्यात्मक समीक्षा करना आवश्यक है ताकि परंपरा और विज्ञान के बीच संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जा सके।

भारतीय धर्मग्रंथों और लोकपरंपराओं में सिंदूर को स्त्री के सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। विवाह संस्कार के दौरान वर द्वारा वधू की मांग में सिंदूर भरने की परंपरा ‘सिंदूरदान’ कहलाती है, जो दांपत्य जीवन की औपचारिक शुरुआत का संकेत है। पौराणिक कथाओं में देवी पार्वती और माता सीता के संदर्भ में सिंदूर का उल्लेख मिलता है, जिससे इसकी सांस्कृतिक और धार्मिक महत्ता स्पष्ट होती है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो सिंदूर एक सामाजिक पहचान भी है, जो विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच भेद को दर्शाता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से माथे के मध्य भाग, विशेषकर दोनों भौहों के बीच स्थित स्थान को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। योग और तंत्र परंपरा में इसे ‘आज्ञा चक्र’ कहा जाता है, जो सात प्रमुख चक्रों में से एक है। आज्ञा चक्र को ज्ञान, अंतर्ज्ञान और मानसिक संतुलन का केंद्र माना जाता है। यह स्थान पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) और पिट्यूटरी ग्रंथि (Pituitary Gland) के समीप होता है, जो हार्मोनल संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कुछ आयुर्वेदाचार्यों का मानना है कि इस स्थान पर हल्का दबाव या स्पर्श तंत्रिका तंत्र को सक्रिय कर सकता है, जिससे मानसिक शांति और एकाग्रता में सहायता मिलती है।

हालांकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में सीधे तौर पर सिंदूर लगाने से हार्मोनल संतुलन स्थापित होने का ठोस वैज्ञानिक प्रमाण सीमित है, किंतु यह स्वीकार किया जाता है कि माथे के मध्य भाग पर हल्का दबाव या मालिश करने से तनाव में कमी आ सकती है। एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर जैसी पद्धतियों में भी इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दृष्टि से यदि सिंदूर लगाने की प्रक्रिया के दौरान हल्का स्पर्श या दबाव पड़ता है, तो उससे मानसिक शांति का अनुभव होना संभव है। यह प्रभाव प्रत्यक्ष रासायनिक क्रिया से अधिक मनोदैहिक (psychosomatic) हो सकता है।

तनाव (Stress) आधुनिक जीवनशैली की एक प्रमुख समस्या है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब व्यक्ति किसी धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है, तो उस परंपरा का पालन करने से उसे मानसिक संतोष और आत्मविश्वास मिलता है। सिंदूर धारण करना कई महिलाओं के लिए आत्म-परिचय, सामाजिक स्वीकार्यता और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक है। इससे उत्पन्न सकारात्मक भावनाएं तनाव को कम करने में सहायक हो सकती हैं। मनोविज्ञान में इसे ‘प्लेसिबो प्रभाव’ (Placebo Effect) के रूप में भी समझा जाता है, जहां व्यक्ति का विश्वास ही उसे सकारात्मक अनुभव प्रदान करता है।

सिंदूर की संरचना पर यदि ध्यान दें तो पारंपरिक रूप से इसे हल्दी और चूने के मिश्रण से तैयार किया जाता था, जिससे लाल रंग उत्पन्न होता था। हल्दी में करक्यूमिन (Curcumin) नामक तत्व पाया जाता है, जो सूजनरोधी (anti-inflammatory) और जीवाणुरोधी (antibacterial) गुणों के लिए जाना जाता है। आयुर्वेद में हल्दी को त्वचा और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना गया है। किंतु आधुनिक समय में बाजार में उपलब्ध कई सिंदूर उत्पादों में कृत्रिम रंग और रासायनिक तत्व भी मिलाए जाते हैं, जिनमें कभी-कभी सीसा (Lead) जैसी हानिकारक धातुएं भी पाई गई हैं। यह स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने समय-समय पर चेतावनी दी है कि सीसा युक्त सिंदूर लंबे समय तक उपयोग करने पर त्वचा, तंत्रिका तंत्र और यहां तक कि प्रजनन स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि सिंदूर का चयन करते समय उसकी गुणवत्ता और संरचना पर विशेष ध्यान दिया जाए। आयुर्वेदिक या हर्बल उत्पादों को प्राथमिकता देना अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, बशर्ते वे प्रमाणित और विश्वसनीय स्रोत से प्राप्त हों।

हार्मोनल संतुलन के संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि मानव शरीर में हार्मोन का स्राव मुख्य रूप से अंतःस्रावी ग्रंथियों (Endocrine Glands) द्वारा नियंत्रित होता है। पिट्यूटरी ग्रंथि को ‘मास्टर ग्लैंड’ कहा जाता है क्योंकि यह अन्य ग्रंथियों को नियंत्रित करती है। यद्यपि माथे के मध्य भाग पर स्पर्श या दबाव से तात्कालिक शांति का अनुभव हो सकता है, किंतु यह दावा कि केवल सिंदूर लगाने से हार्मोनल असंतुलन दूर हो जाएगा, वैज्ञानिक रूप से पुष्ट नहीं है। ऐसे दावों को संतुलित दृष्टिकोण से देखना चाहिए।

एकाग्रता में वृद्धि का दावा भी मुख्यतः आध्यात्मिक और योगिक परंपराओं पर आधारित है। ध्यान (Meditation) के दौरान साधक अक्सर ध्यान को भौहों के मध्य केंद्रित करते हैं। इस प्रक्रिया से मन को एक बिंदु पर स्थिर करने में सहायता मिलती है। यदि सिंदूर लगाने से व्यक्ति का ध्यान प्रतिदिन कुछ क्षणों के लिए इसी स्थान पर केंद्रित होता है, तो यह एक प्रकार की सूक्ष्म मानसिक तैयारी का कार्य कर सकता है। हालांकि यह प्रभाव व्यक्तिगत अनुभव पर निर्भर करता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो सिंदूर धारण करना महिलाओं के लिए केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान भी है। भारत के विभिन्न राज्यों में इसकी परंपरा और शैली अलग-अलग है। उत्तर भारत में मांग में सिंदूर भरने की परंपरा प्रचलित है, जबकि बंगाल में दुर्गा पूजा के अवसर पर ‘सिंदूर खेला’ विशेष महत्व रखता है। इन विविध परंपराओं से स्पष्ट है कि सिंदूर भारतीय सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग है।

आधुनिक समय में महिलाओं की भूमिका और पहचान में व्यापक परिवर्तन आया है। कई महिलाएं पारंपरिक प्रतीकों को अपनाने या न अपनाने का निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आधार पर करती हैं। इस संदर्भ में सिंदूर को केवल धार्मिक बंधन के रूप में देखना उचित नहीं होगा, बल्कि इसे व्यक्तिगत आस्था और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में समझना अधिक संतुलित दृष्टिकोण होगा।

चिकित्सकीय दृष्टि से यदि सिंदूर के संभावित लाभों की चर्चा की जाए तो यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अभी तक ऐसे व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं जो यह सिद्ध करें कि सिंदूर लगाने से सीधे तौर पर तनाव, हार्मोनल असंतुलन या मानसिक रोगों का उपचार संभव है। हालांकि, यदि यह किसी व्यक्ति को आत्मिक संतोष, सकारात्मक सोच और सामाजिक जुड़ाव का अनुभव कराता है, तो अप्रत्यक्ष रूप से मानसिक स्वास्थ्य पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

इसके अतिरिक्त, त्वचा विशेषज्ञ यह सलाह देते हैं कि माथे की त्वचा संवेदनशील होती है। इसलिए सिंदूर या किसी भी प्रसाधन का उपयोग करते समय एलर्जी परीक्षण (Patch Test) करना चाहिए। यदि खुजली, जलन या चकत्ते जैसी समस्या हो तो तुरंत उपयोग बंद कर चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।
समग्र रूप से देखा जाए तो सिंदूर भारतीय परंपरा, आध्यात्मिक मान्यता और सामाजिक संरचना का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। आयुर्वेद और योग की दृष्टि से इसके संभावित लाभों का उल्लेख मिलता है, किंतु आधुनिक विज्ञान इन दावों की पुष्टि के लिए अभी और अनुसंधान की आवश्यकता बताता है। इसलिए इस विषय पर संतुलित और तथ्याधारित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

सिंदूर लगाना न केवल वैवाहिक सुख का प्रतीक है, बल्कि यह सांस्कृतिक पहचान, आत्मिक संतुलन और मानसिक संतोष से भी जुड़ा हुआ है। यदि इसे शुद्ध और सुरक्षित रूप में उपयोग किया जाए, तो यह किसी हानि का कारण नहीं बनता। किंतु स्वास्थ्य संबंधी दावों को वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ परखना भी उतना ही आवश्यक है। परंपरा और विज्ञान के बीच संवाद स्थापित कर ही हम ऐसे विषयों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। संवाद 24 के पाठकों के लिए यह आवश्यक है कि वे आस्था और तर्क दोनों को साथ लेकर चलें, ताकि समाज में जागरूकता और संतुलन बना रहे।

Geeta Singh
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