कहानियों से संस्कार तक: बच्चों के जीवन में दादी-बाबा की अहम भूमिका

संवाद 24 डेस्क। भारतीय समाज में दादी और बाबा का स्थान केवल परिवार के वरिष्ठ सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि संस्कारों, परंपराओं और भावनात्मक सुरक्षा के स्तंभ के रूप में माना जाता है। बदलते समय, तेज़ जीवनशैली और एकल परिवारों के बढ़ते चलन के बावजूद दादी-बाबा और पोते-पोतियों का रिश्ता आज भी उतना ही गहरा, संवेदनशील और मूल्यवान बना हुआ है। यह रिश्ता निस्वार्थ प्रेम, त्याग और आशीर्वाद से भरा होता है, जो बच्चों के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास में अहम भूमिका निभाता है।
दादी-बाबा का प्रेम किसी शर्त, अपेक्षा या स्वार्थ से बंधा नहीं होता। वे बच्चों को उसी रूप में स्वीकार करते हैं जैसे वे हैं। यही कारण है कि बच्चे उनके साथ स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित और सहज महसूस करते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बच्चों के भावनात्मक विकास के लिए ऐसा सुरक्षित रिश्ता बेहद ज़रूरी होता है, जहाँ उन्हें बिना डर के अपनी भावनाएँ व्यक्त करने का अवसर मिले।

पारिवारिक ढांचे में दादी-बाबा की भूमिका
संयुक्त परिवार प्रणाली में दादी-बाबा बच्चों के दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा होते थे। वे न केवल बच्चों की देखभाल करते थे, बल्कि उन्हें जीवन के मूल मूल्य, सामाजिक व्यवहार और नैतिकता भी सिखाते थे। आज भले ही परिवार छोटे हो गए हों, लेकिन दादी-बाबा की भूमिका की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है।
आधुनिक परिवारों में, जहाँ माता-पिता दोनों कामकाजी होते हैं, वहाँ दादी-बाबा बच्चों के लिए भरोसेमंद और नि:शुल्क देखभालकर्ता की भूमिका निभाते हैं। वे बच्चों को समय देते हैं, उनके साथ खेलते हैं, पढ़ाते हैं और उनकी दिनचर्या को संतुलित बनाए रखते हैं। यह सहयोग न केवल माता-पिता के लिए राहत भरा होता है, बल्कि बच्चों के लिए भी भावनात्मक रूप से लाभकारी सिद्ध होता है।

नि:शुल्क देखभालकर्ता से कहीं अधिक
दादी-बाबा को केवल बच्चों के “केयरटेकर” के रूप में देखना उनके योगदान को सीमित करना होगा। वे अनुभवों का भंडार होते हैं, जिनके पास जीवन के हर मोड़ से गुजरने की समझ होती है। बच्चों को उनके साथ समय बिताने से धैर्य, सहानुभूति और संवेदनशीलता जैसे गुण स्वतः विकसित होते हैं।
शोध बताते हैं कि जिन बच्चों का अपने दादा-दादी से मजबूत रिश्ता होता है, उनमें तनाव से निपटने की क्षमता अधिक होती है। वे कठिन परिस्थितियों में अधिक संतुलित व्यवहार करते हैं और आत्मविश्वास के साथ निर्णय लेना सीखते हैं।

कहानियों और लोकज्ञान का खजाना
दादी-बाबा द्वारा सुनाई जाने वाली कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं होतीं, बल्कि उनमें जीवन के गहरे संदेश छिपे होते हैं। पंचतंत्र, जातक कथाएँ, रामायण-महाभारत के प्रसंग या उनके स्वयं के जीवन अनुभव—ये सभी बच्चों के सोचने-समझने की क्षमता को विकसित करते हैं।
आज के डिजिटल युग में, जहाँ बच्चे स्क्रीन के माध्यम से कहानियाँ देखते-सुनते हैं, दादी-बाबा की मुख से कही गई कहानियाँ मानवीय स्पर्श और भावनात्मक जुड़ाव प्रदान करती हैं। यह जुड़ाव बच्चों में कल्पनाशीलता, भाषा कौशल और नैतिक समझ को बढ़ाता है।

संस्कारों की पहली पाठशाला
बच्चों को संस्कार देने की प्रक्रिया घर से ही शुरू होती है, और इस प्रक्रिया में दादी-बाबा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे बच्चों को बड़ों का सम्मान करना, छोटों से प्रेम करना, धैर्य रखना और कठिन परिस्थितियों में संयम बनाए रखना सिखाते हैं।
भारतीय संस्कृति में त्योहारों, रीति-रिवाजों और पारिवारिक परंपराओं की जानकारी अक्सर दादी-बाबा के माध्यम से ही अगली पीढ़ी तक पहुँचती है। इससे बच्चों में अपनी जड़ों के प्रति जुड़ाव और सांस्कृतिक पहचान मजबूत होती है।

भावनात्मक मजबूती का आधार
दादी-बाबा का स्नेह बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है। जब बच्चे किसी डर, असफलता या भ्रम से गुजरते हैं, तो दादी-बाबा उन्हें शांतिपूर्वक समझाते हैं। उनका अनुभव और धैर्य बच्चों को यह विश्वास दिलाता है कि हर समस्या का समाधान संभव है।
मनोविज्ञान के विशेषज्ञ मानते हैं कि दादा-दादी के साथ समय बिताने वाले बच्चों में अवसाद और चिंता जैसी समस्याओं की संभावना कम होती है। उन्हें एक अतिरिक्त भावनात्मक सहारा मिलता है, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य को संतुलित बनाए रखता है।

आधुनिक चुनौतियाँ और बदलता रिश्ता
हालाँकि दादी-बाबा और बच्चों का रिश्ता मजबूत है, लेकिन आधुनिक जीवनशैली ने इसमें कुछ चुनौतियाँ भी पैदा की हैं। शहरों में नौकरी के कारण परिवारों का अलग-अलग स्थानों पर रहना, समय की कमी और तकनीक पर बढ़ती निर्भरता—ये सभी कारक इस रिश्ते को प्रभावित करते हैं।
इसके बावजूद, तकनीक ने एक सकारात्मक भूमिका भी निभाई है। वीडियो कॉल, ऑनलाइन चैट और सोशल मीडिया के माध्यम से दादी-बाबा अपने पोते-पोतियों से जुड़े रहते हैं। भले ही यह संपर्क प्रत्यक्ष मुलाकात का विकल्प नहीं हो सकता, लेकिन भावनात्मक दूरी को कम करने में यह सहायक है।

पीढ़ियों के बीच सेतु
दादी-बाबा बच्चों और माता-पिता के बीच एक सेतु की तरह काम करते हैं। वे न केवल पारिवारिक संतुलन बनाए रखते हैं, बल्कि पीढ़ियों के बीच संवाद को भी सहज बनाते हैं। जब माता-पिता व्यस्त होते हैं या बच्चों की भावनाओं को पूरी तरह समझ नहीं पाते, तब दादी-बाबा मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं।
यह पीढ़ीगत संवाद बच्चों को यह सिखाता है कि अलग-अलग उम्र और अनुभव वाले लोगों की सोच को कैसे समझा जाए। इससे उनमें सहिष्णुता और सामाजिक समझ विकसित होती है।

समाज के लिए दीर्घकालिक लाभ
दादी-बाबा और बच्चों के मजबूत रिश्ते का प्रभाव केवल परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज पर भी पड़ता है। ऐसे बच्चे, जो स्नेह, संस्कार और भावनात्मक सुरक्षा के वातावरण में पलते हैं, आगे चलकर अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनते हैं।
समाजशास्त्रियों के अनुसार, बुज़ुर्गों और बच्चों के बीच संवाद सामाजिक मूल्यों को जीवित रखने में सहायक होता है। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी सामाजिक संतुलन और सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखती है।

बुज़ुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव
यह रिश्ता केवल बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि दादी-बाबा के लिए भी लाभकारी होता है। बच्चों के साथ समय बिताने से बुज़ुर्गों में अकेलेपन की भावना कम होती है और वे स्वयं को अधिक सक्रिय और उपयोगी महसूस करते हैं।
अध्ययनों से पता चलता है कि पोते-पोतियों के साथ जुड़ाव रखने वाले बुज़ुर्गों में स्मरण शक्ति बेहतर रहती है और उनमें अवसाद की संभावना कम होती है। इस प्रकार यह रिश्ता दोनों पीढ़ियों के लिए मानसिक और भावनात्मक रूप से लाभदायक सिद्ध होता है।

दादी और बाबा का प्यार सचमुच निस्वार्थ, गहरा और आशीर्वाद की तरह होता है। वे बच्चों को केवल सुरक्षा ही नहीं देते, बल्कि उन्हें संस्कार, ज्ञान और जीवन के अनमोल अनुभव भी प्रदान करते हैं। बदलते समय और चुनौतियों के बावजूद यह रिश्ता आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
न्यूक्लियर परिवारों और डिजिटल युग के बीच, दादी-बाबा और बच्चों के रिश्ते को सहेजना और मजबूत बनाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। यह रिश्ता न केवल बच्चों को भावनात्मक मजबूती देता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक संवेदनशील, संतुलित और संस्कारित समाज की नींव भी रखता है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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