माँ : निःस्वार्थ प्रेम, त्याग और समर्पण की जीवंत मिसाल
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संवाद 24 डेस्क। माँ बच्चों की जान होती है—यह कथन केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक गहन सामाजिक सत्य है। भारतीय समाज ही नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता में माँ को जीवनदायिनी, पालनकर्ता और संस्कारों की प्रथम गुरु के रूप में स्वीकार किया गया है। माँ का प्रेम निस्वार्थ होता है, जो किसी शर्त, अपेक्षा या प्रतिफल से परे होता है। वह बच्चे के जन्म से पहले ही उसके भविष्य के लिए सपने देखने लगती है और जीवनभर अपने सुख-दुख से ऊपर बच्चे की भलाई को रखती है।
माँ का योगदान केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। आधुनिक समाज में माँ एक बहुआयामी भूमिका निभा रही है—वह गृहिणी है, कामकाजी महिला है, शिक्षिका है, मार्गदर्शक है और आवश्यकता पड़ने पर कठोर निर्णय लेने वाली संरक्षक भी है। बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में माँ की भूमिका इतनी गहरी होती है कि उसका प्रभाव जीवनभर बना रहता है।
जीवन की पहली पाठशाला होती है माँ
बच्चे की पहली पाठशाला माँ की गोद होती है। बोलना, चलना, व्यवहार करना, सही-गलत की पहचान—ये सभी मूलभूत शिक्षाएँ माँ के माध्यम से ही बच्चे तक पहुँचती हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, प्रारंभिक बाल्यावस्था में मिलने वाला मातृत्व स्नेह बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास की नींव रखता है। जिन बच्चों को सुरक्षित और प्रेमपूर्ण वातावरण मिलता है, वे आत्मविश्वासी और संतुलित व्यक्तित्व वाले बनते हैं।
माँ बच्चों को केवल शब्द नहीं सिखाती, बल्कि भावनाएँ समझना भी सिखाती है। वह बिना बोले बच्चे के मन की बात समझ लेती है। बच्चे के चेहरे की हल्की-सी उदासी भी माँ की नजरों से छिप नहीं पाती। यही संवेदनशीलता माँ को विशिष्ट बनाती है।
निस्वार्थ प्रेम की अद्वितीय मिसाल
माँ का प्रेम निःशर्त होता है। वह बच्चे की गलतियों को सुधारती है, लेकिन प्रेम कभी कम नहीं करती। जब पूरा संसार आलोचना करता है, तब भी माँ अपने बच्चे के साथ खड़ी रहती है। उसका प्रेम किसी उपलब्धि पर निर्भर नहीं करता। चाहे बच्चा सफल हो या संघर्षरत—माँ के लिए वह हमेशा समान रहता है।
कई बार माँ अपने सपनों, इच्छाओं और आकांक्षाओं को त्यागकर बच्चों के भविष्य को प्राथमिकता देती है। वह स्वयं कम खाकर बच्चों को भरपेट खिलाती है, अपने दर्द को छिपाकर बच्चों के चेहरे पर मुस्कान बनाए रखती है। यह त्याग किसी कानून या जिम्मेदारी से नहीं, बल्कि प्रेम की गहराई से जन्म लेता है।
माँ : रक्षक और ढाल
माँ केवल प्रेम की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि अपने बच्चों की सबसे बड़ी रक्षक भी होती है। संकट चाहे शारीरिक हो या मानसिक, माँ ढाल बनकर हर मुश्किल का सामना करती है। समाज में बढ़ती असुरक्षाओं के बीच माँ बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए हर संभव प्रयास करती है।
इतिहास और वर्तमान—दोनों में ऐसे असंख्य उदाहरण मिलते हैं जहाँ माँ ने अपने बच्चों की रक्षा के लिए असाधारण साहस दिखाया है। कभी सामाजिक रूढ़ियों से लड़कर, तो कभी आर्थिक तंगी का सामना करके, माँ बच्चों के भविष्य की रक्षा करती है।
बदलते दौर में माँ की भूमिका
समय के साथ माँ की भूमिका में व्यापक परिवर्तन आया है। आज की माँ केवल घर तक सीमित नहीं है। वह शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन, विज्ञान, खेल और राजनीति जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भागीदारी निभा रही है। इसके बावजूद, माँ की मूल भूमिका—पालन-पोषण और मार्गदर्शन—अपरिवर्तित बनी हुई है।
कामकाजी माँ के सामने दोहरी जिम्मेदारियाँ होती हैं। एक ओर पेशेवर दायित्व, दूसरी ओर पारिवारिक उत्तरदायित्व। बावजूद इसके, अधिकांश माँएँ दोनों भूमिकाओं को संतुलन के साथ निभाती हैं। यह संतुलन उनके आत्मबल और प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
माँ और बच्चों का भावनात्मक संबंध
माँ-बच्चे का रिश्ता केवल रक्त संबंध नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है। यह रिश्ता विश्वास, सुरक्षा और अपनत्व पर आधारित होता है। बच्चे जब डरते हैं, असफल होते हैं या भ्रमित होते हैं, तब माँ का आँचल उन्हें सबसे सुरक्षित लगता है।
अध्ययनों से पता चलता है कि जिन बच्चों को माँ से भावनात्मक समर्थन मिलता है, वे तनावपूर्ण परिस्थितियों में बेहतर निर्णय ले पाते हैं। माँ की बातों में छिपा अनुभव बच्चों के जीवन में मार्गदर्शन का कार्य करता है।
सामाजिक और नैतिक मूल्यों की संवाहक
माँ समाज के नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों की पहली संवाहक होती है। वह बच्चों को ईमानदारी, करुणा, सहनशीलता और जिम्मेदारी जैसे गुण सिखाती है। समाज की दिशा और दशा तय करने में माँ की भूमिका अप्रत्यक्ष लेकिन अत्यंत प्रभावशाली होती है।
यदि माँ शिक्षित और जागरूक है, तो उसका प्रभाव केवल परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज तक फैलता है। यही कारण है कि शिक्षा विशेषज्ञ महिलाओं और विशेष रूप से माताओं की शिक्षा को सामाजिक विकास की कुंजी मानते हैं।
माँ का संघर्ष और अनदेखा श्रम
अक्सर माँ के श्रम को स्वाभाविक मान लिया जाता है। घर के काम, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा—ये सभी कार्य बिना वेतन और बिना प्रशंसा के होते हैं। समाज में माँ के इस अदृश्य श्रम की आर्थिक और सामाजिक मान्यता आज भी एक चुनौती बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि घरेलू कार्यों का आर्थिक मूल्यांकन किया जाए, तो यह किसी भी पेशे से कम नहीं होगा। माँ का यह सतत श्रम परिवार की स्थिरता का आधार है।
माँ के स्वास्थ्य और सम्मान की आवश्यकता
माँ के योगदान की चर्चा के साथ-साथ उसके स्वास्थ्य और सम्मान की बात करना भी आवश्यक है। कई बार माँ अपनी जिम्मेदारियों के चलते अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा कर देती है। यह स्थिति दीर्घकाल में परिवार और समाज—दोनों के लिए नुकसानदायक होती है।
आवश्यक है कि समाज माँ को केवल त्याग की मूर्ति न माने, बल्कि उसके अधिकारों, स्वास्थ्य और आत्मसम्मान को भी प्राथमिकता दे। सरकारी और सामाजिक स्तर पर मातृत्व से जुड़ी नीतियाँ इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
माँ के बिना जीवन की कल्पना अधूरी
माँ के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है। वह केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन गढ़ने वाली शक्ति है। उसका प्रेम बच्चों के लिए संबल है, मार्गदर्शन है और सुरक्षा कवच है। माँ का योगदान किसी एक दिन या अवसर तक सीमित नहीं किया जा सकता।
समाज का दायित्व है कि वह माँ के त्याग, संघर्ष और प्रेम को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि व्यवहार में सम्मान दे। जब माँ सशक्त होगी, स्वस्थ होगी और सम्मानित होगी—तभी आने वाली पीढ़ियाँ सशक्त और संवेदनशील बन सकेंगी।






