सम्भावित टेक्नोलॉजी फ़ेल या फ़र्ज़ी माप? यू.पी. में स्मार्ट प्रीपेड मीटर की गुणवत्ता पर उठे थर्ड पार्टी ऑडिट के सवाल
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संवाद 24 डेस्क। उत्तर प्रदेश में राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने प्रदेश भर में लगे स्मार्ट प्रीपेड मीटरों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठाए हैं और इन मीटरों की विश्वसनीयता और तकनीकी मानकों की पुष्टि के लिए थर्ड पार्टी जांच (Third Party Audit) की मांग की है, जिससे उपभोक्ताओं की चिंता और भी तेज़ हो गई है।
राज्य में लगभग 56 लाख से अधिक स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए जा चुके हैं, लेकिन परिषद का दावा है कि इन मीटरों में से केवल लगभग 34.32 लाख का ही साइट स्वीकृति परीक्षण (Site Acceptance Test) किया गया है। लगभग 21.68 लाख मीटर बिना परीक्षण के ही उपभोक्ताओं की परिसरों में लगाए गए हैं, जिससे उनकी कार्यक्षमता और सटीकता को लेकर बड़े स्तर पर आशंका बनी हुई है।
गुणवत्ता पर सवाल, क्यों?
⛔ परीक्षण की कमी
परिषद का कहना है कि बिना टेस्ट के मीटरों को उपयोग में लाना देश के मानदंडों के खिलाफ है और इससे यह दावा करना कि सभी मीटर सही तरीके से काम कर रहे हैं, “गलत” और “बिना आधार” है।
⚙️ थर्ड पार्टी जांच की मांग
इसके निराकरण के लिए परिषद ने स्वतंत्र और मान्यता प्राप्त थर्ड पार्टी एजेंसी से इन मीटरों की गुणवत्ता और तकनीकी परीक्षण कराने की मांग की है ताकि पता चले कि वे सभी लागू मानकों पर खरा उतरते हैं या नहीं।
उपभोक्ता असंतोष
यह पहली बार नहीं है कि स्मार्ट मीटरों को लेकर विवाद सामने आया है। पिछले कुछ महीनों में भी ऐसे कई मुद्दे उठे हैं, जिनमें शामिल हैं:
✔ मिली रिपोर्ट की सार्वजनिकता नहीं: अब तक लगाए गए स्मार्ट मीटरों के चेक मीटर मिलान रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिससे उपभोक्ताओं में विश्वास की कमी बनी है।
✔ मीटर मिलान रिपोर्ट केंद्र को नहीं भेजी: केंद्र सरकार के निर्देशों के बावजूद चेक मीटर मिलान की रिपोर्ट भारत सरकार को नहीं भेजी गई है, जिससे इस योजना की पारदर्शिता पर प्रश्न चिह्न लगते रहे हैं।
✔ अनियमितताओं के आरोप: कुछ रिपोर्टों में मीटर खरीद प्रक्रिया और मूल्य निर्धारण को लेकर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप भी लगाए गए हैं, जिसमें परिषद ने उच्च नियामक आयोग में याचिका भी दायर की थी।
✔ उपभोक्ता विकल्प की मांग: ऊर्जा परिषद ने आगे यह भी कहा है कि उपभोक्ताओं को पोस्टपेड या प्रीपेड मीटर चुनने का अधिकार दिया जाना चाहिए, न कि बिना विकल्प के स्मार्ट मीटर को अनिवार्य रूप से लगवाया जाए।
उपभोक्ताओं की चिंता, रीडिंग और विश्वसनीयता
स्मार्ट मीटरों के तेज चलने, असामान्य रीडिंग और अचानक लोड जंप जैसी शिकायतें लगातार सुनी जा रही हैं। ये समस्याएँ न केवल बिलिंग में भ्रम पैदा कर रही हैं बल्कि उपभोक्ताओं के विश्वास को भी प्रभावित कर रही हैं।
तकनीकी ऑडिट क्यों ज़रूरी?
✔ पारदर्शिता: थर्ड पार्टी ऑडिट से पता चलेगा कि मीटरों को मानकीकृत परीक्षण मिले हैं या नहीं, जैसे साइट स्वीकृति परीक्षण और रीडिंग के मिलान।
✔ विश्वसनीय डेटा: स्मार्ट मीटरों का भरोसेमंद संचालन तभी संभव है जब वे तकनीकी मानकों पर काम करें — इससे बिजली बिल, डेटा रिपोर्टिंग और सिस्टम की सटीकता सुनिश्चित होगी।
✔ उपभोक्ता संरक्षण: अगर कोई मीटर मानकों से बाहर हैं, तो उपभोक्ताओं को उनकी असली खपत के अनुसार बिल मिलता रहेगा और गलत रीडिंग से बचा जा सकता है।
✔ नियामक जवाबदेही: थर्ड पार्टी टेस्टिंग से नियामक आयोग को भी यह आंकलन मिलेगा कि क्या मीटर निर्माता कंपनियों तथा वितरण एजेंसियों ने सही प्रोटोकॉल फ़ॉलो किया है या नहीं।
क्या सरकार ने प्रतिक्रिया दी?
फिलहाल विद्युत विभाग या नियामक आयोग की ओर से इस फ़िलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है कि थर्ड पार्टी ऑडिट की मांग को स्वीकार किया गया है या नहीं। इस मुद्दे पर औपचारिक बयान या जांच के आदेश की प्रतीक्षा है।
अंततः हम कह सकते हैं कि उत्तर प्रदेश में स्मार्ट मीटरों को लेकर उपभोक्ता परिषद द्वारा उठाए गए सवाल सिर्फ तकनीकी जांच का आग्रह नहीं हैं, बल्कि यह उपभोक्ता अधिकार, बिलिंग पारदर्शिता और तकनीकी विश्वसनीयता के मूल मुद्दे से जुड़े हुए हैं। अगर इन मीटरों की तीव्र गति, गुणवत्ता और परीक्षण के बारे में पारदर्शिता नहीं लाई जाती है, तो उपभोक्ताओं के लिए यह योजना भरोसेमंद और लाभकारी तकनीक के रूप में स्वीकार करना कठिन होगा।






