16 चोटें कैसे आईं जवाब नहीं दे सके अधिकारी, कोर्ट ने चरस तस्करी के आरोपी को दी क्लीन चिट विवेचक के खिलाफ जांच के आदेश
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संवाद 24 संवाददाता। कानपुर के कल्याणपुर थाना क्षेत्र में नौ साल पुराने चरस तस्करी के मामले में बड़ा न्यायिक फैसला सामने आया है। अपर सत्र न्यायालय ने बुधवार को मामले में गंभीर खामियां पाए जाने पर आरोपी युवक को दोषमुक्त करार देते हुए विवेचक के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि आरोपी के शरीर पर मौजूद 16 चोटों के बारे में पुलिस कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी।
अपर सत्र न्यायाधीश शेष बहादुर निषाद की अदालत ने कहा कि विवेचना में न केवल गंभीर लापरवाही बरती गई, बल्कि अभियोजन की कहानी भी संदेह के घेरे में है।
नौ साल पुराना मामला
प्रकरण के अनुसार, 20 अक्टूबर 2016 को कल्याणपुर थाने में तैनात तत्कालीन दारोगा अब्दुल कलाम ने गूबा गार्डन, राधापुरम निवासी शिवम उर्फ लकी को महाराणा प्रताप स्कूल के पश्चिमी गेट के पास से गिरफ्तार किया था। पुलिस का दावा था कि उसके पास से 240 ग्राम चरस बरामद हुई है। इसके आधार पर एनडीपीएस एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया और बाद में चार्जशीट भी दाखिल कर दी गई।
कोर्ट में आरोपी ने किया खुलासा
कोर्ट में बयान देते हुए शिवम ने आरोपों से पूरी तरह इनकार किया। उसने बताया कि 19 अक्टूबर 2016 को वह दवा लेकर लौट रहा था, तभी पुराने शिवली मोड़ के पास बंटी तिवारी और जमुना चंदेल अपने साथियों के साथ मिले। तलाशी का विरोध करने पर उसके साथ मारपीट की गई और रुपये व मोबाइल छीन लिए गए। बाद में उसी सूचना पर पुलिस और उसके पिता को बुलाया गया।
शिवम ने आरोप लगाया कि उसे झूठे मुकदमे में फंसाया गया, उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया और विवेचना के कागजात भी काल्पनिक घटनाओं पर आधारित हैं।
16 चोटें, लेकिन मेडिकल नहीं
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी के शरीर पर सिर, हाथ, पैर और सीने पर कुल 16 चोटों के निशान पाए गए, लेकिन इसके बावजूद उसका मेडिकल परीक्षण नहीं कराया गया। यह गंभीर लापरवाही है। कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी के पास से बरामद दिखाया गया मादक पदार्थ भी संदिग्ध प्रतीत होता है।
विवेचक पर उठे सवाल
अदालत ने माना कि मामले की विवेचना में गंभीर खामियां हैं। इस आधार पर कोर्ट ने आरोपी को दोषमुक्त करते हुए उसके बंधपत्र और जमानतनामे निरस्त कर दिए। साथ ही, विवेचक अब्दुल कलाम, जो वर्तमान में कानपुर देहात के साइबर क्राइम थाने में तैनात हैं, उनके खिलाफ जांच कराने के लिए पुलिस आयुक्त को आदेश दिए हैं।
यह फैसला न केवल गलत विवेचना पर कड़ा सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी रेखांकित करता है कि कानूनी प्रक्रिया में लापरवाही किसी व्यक्ति की जिंदगी के कई साल बर्बाद कर सकती है। कोर्ट के आदेश के बाद अब पूरे मामले पर विभागीय जांच की तलवार लटक गई है।






