
संवाद 24 नई दिल्ली। देश की राजधानी में शनिवार की सुबह एक अप्रत्याशित और असाधारण सन्नाटे के साथ शुरू हुई। दिल्ली के इतिहास में शायद ही कभी ऐसा मंजर देखा गया हो, जब किसी एक राजनीतिक आंदोलन की घोषणा मात्र से राजधानी की जीवनरेखा माने जाने वाले दर्जनों मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए जाएं, सैकड़ों ट्रेनों के पहिए रोक दिए जाएं और समूचे लुटियंस जोन को लोहे की बैरिकेड्स व कंटीले तारों से छावनी में तब्दील कर दिया जाए। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और हालिया चुनावी कार्यप्रणालियों के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और विभिन्न छात्र संगठनों द्वारा जंतर-मंतर पर बुलाए गए विशाल महाधरने ने दिल्ली प्रशासन में भारी खलबली मचा दी है। प्रशासन द्वारा इस विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं दिए जाने के बावजूद शुक्रवार देर रात से ही देश के अलग-अलग हिस्सों से हजारों की तादाद में लोग जंतर-मंतर और दिल्ली के प्रमुख चौराहों पर जुटना शुरू हो गए। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNS) की धारा 163 लागू कर दी है। नई दिल्ली इलाके की तमाम सीमाओं को सील कर दिया गया है और राजधानी में प्रवेश के हर रास्ते पर सख्त तलाशी अभियान शुरू कर दिया गया है।
किन मांगों को लेकर सुलग रहा है आंदोलन?
इस व्यापक जनांदोलन का केंद्र चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उठ रहे सवाल हैं। प्रदर्शनकारियों और आंदोलनकारी संगठनों का आरोप है कि निर्वाचन प्रणाली की पारदर्शिता पर गंभीर आंच आई है। आंदोलनकारियों ने मुख्य रूप से पांच बड़ी मांगें सरकार और तंत्र के समक्ष रखी हैं:
मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा: ज्ञानेश कुमार तत्काल पद छोड़ें और उनके खिलाफ निष्पक्ष आपराधिक जांच शुरू की जाए।
एसआईआर (Special Intensive Revision) पर रोक: हाल ही में शुरू किए गए विशेष गहन संशोधन को फौरन रोका जाए।
पुरानी मतदाता सूची की बहाली: जनवरी 2025 की अंतिम मतदाता सूची को दोबारा लागू किया जाए, ताकि किसी भी पात्र नागरिक का मताधिकार न छीना जा सके।
2023 का चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून रद्द हो: चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए 2023 में बनाए गए विवादित कानून को निरस्त कर सीजेआई (CJI) की भागीदारी वाली पारदर्शी चयन प्रक्रिया बहाल की जाए।
स्वतंत्र न्यायिक जांच: समूचे मामले और गड़बड़ियों के आरोपों की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष आयोग से जांच कराई जाए।
राजधानी की रफ्तार पर लगा ब्रेक: 57 मेट्रो स्टेशन और 224 से अधिक ट्रेनें रद्द
इस प्रदर्शन के ऐलान का सबसे बड़ा असर दिल्ली और आसपास के आम जनजीवन पर पड़ा है। दिल्ली मेट्रो रेल निगम (DMRC) के इतिहास में संभवतः पहली बार एक साथ 57 मेट्रो स्टेशनों को शुक्रवार रात 9 बजे से ही अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया। इसके अलावा सराय काले खां और न्यू अशोक नगर ‘नमो भारत’ रीजनल रैपिड ट्रांजिट स्टेशनों को भी शनिवार देर रात तक के लिए बंद किया गया है।
रेलवे सेवाओं पर भी इस आंदोलन की सीधी मार पड़ी है। नई दिल्ली, हजरत निजामुद्दीन और तिलक ब्रिज रेलवे स्टेशन से चलने और आने वाली करीब 224 से अधिक ट्रेनों को निरस्त कर दिया गया है। इनमें राजधानी एक्सप्रेस, शताब्दी एक्सप्रेस, वंदे भारत और 179 लोकल व पैसेंजर ट्रेनें शामिल हैं। ट्रेनों और मेट्रो के अचानक बंद होने से हजारों दैनिक यात्री, नौकरीपेशा लोग और दूर-दराज से आने वाले मुसाफिर स्टेशनों पर ही फंसे नजर आए।
छावनी में तब्दील लुटियंस जोन: 35 हजार जवान और इंटरनेट पाबंदी
दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने राजधानी को अभेद्य किले में बदल दिया है। सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), सीमा सुरक्षा बल (BSF) और दिल्ली पुलिस के 35 हजार से अधिक जवानों को तैनात किया गया है। किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए जंतर-मंतर, संसद मार्ग और इंडिया गेट के चारों तरफ वज्र वाहन, दंगा नियंत्रण दस्ते और वॉटर कैनन (जल तोपों) को तैयार रखा गया है। इतना ही नहीं, सूचनाओं के फैलाव और डिजिटल भीड़ जुटाने की कोशिशों को रोकने के लिए जनपथ और कर्तव्य पथ से चार किलोमीटर के दायरे में 24 घंटे के लिए इंटरनेट सेवाएं भी निलंबित कर दी गई हैं। दिल्ली पुलिस के अनुसार, किसी भी प्रदर्शनकारी को जंतर-मंतर तक पहुंचने नहीं दिया जाएगा और उन्हें एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन या दिल्ली बॉर्डर पर ही रोककर 35 विशेष डिटेंशन सेंटरों में भेजा जाएगा। अब तक आम आदमी पार्टी, सीजेपी और विभिन्न वामपंथी संगठनों से जुड़े 200 से अधिक सक्रिय कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया जा चुका है।
प्रशासन का तर्क और कानूनी पेंच
दिल्ली पुलिस की संयुक्त आयुक्त (नई दिल्ली रेंज) नूपुर प्रसाद के अनुसार, आयोजकों ने 10 अक्टूबर के इस बड़े प्रदर्शन के लिए महज तीन दिन पहले (7 अक्टूबर) आवेदन दिया था, जबकि सुरक्षा नियमों के अनुसार ऐसे किसी भी व्यापक आयोजन के लिए कम से कम 10 दिन पूर्व अनुमति पत्र देना अनिवार्य होता है। समय पर आवेदन न मिलने और सुरक्षा कारणों का हवाला देकर यह अनुमति खारिज कर दी गई थी। दूसरी ओर, इस पूरे मामले पर देश की सर्वोच्च अदालत की टिप्पणियां और विपक्ष के नेताओं का राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगना यह साफ दर्शाता है कि यह मुद्दा केवल सड़क तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि आने वाले दिनों में देश के राजनीतिक और संवैधानिक गलियारों में एक बड़ा सियासी तूफान खड़ा करने वाला है।






