
संवाद 24 नई दिल्ली। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी निष्पक्षता को लेकर केंद्र सरकार और विपक्षी दलों के बीच टकराव अब अपने चरम पर पहुंच चुका है। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस सहित पूरे ‘इंडिया’ गठबंधन ने राजधानी दिल्ली में मोर्चा खोल दिया है। संसद परिसर से शुरू हुआ यह विरोध-प्रदर्शन अब राष्ट्रपति भवन की चौखट तक पहुंचने की तैयारी में है। चुनावी प्रक्रिया में कथित हेराफेरी, मतदाता सूचियों में भारी गड़बड़ियों और कथित ‘वोट चोरी’ के आरोपों को लेकर विपक्षी दल आर-पार की लड़ाई के मूड में नजर आ रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों ने साफ कर दिया है कि यह लड़ाई केवल एक अधिकारी के खिलाफ नहीं, बल्कि देश के संविधान और आम नागरिक के मताधिकार की रक्षा के लिए है। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष संस्था के रूप में कार्य करने के बजाय संदेहास्पद भूमिका निभा रहा है, जिससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की मूल भावना खतरे में पड़ गई है।
राष्ट्रपति से समय न मिलने पर सड़क पर उतरने का अल्टीमेटम
विपक्षी गठबंधन की ओर से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पत्र भेजकर मुलाकात का औपचारिक समय मांगा गया था। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के मुताबिक, पहला अनुरोध पत्र 2 अक्टूबर को भेजा गया था, जिसके बाद राष्ट्रपति भवन ने प्रतिनिधिमंडल में शामिल होने वाले नेताओं की सूची मांगी थी। इसके बाद 5 अक्टूबर को सभी प्रमुख नेताओं के नामों के साथ दोबारा पत्र भेजा गया, जिसमें 7, 8 या 9 अक्टूबर को मिलने का समय मांगा गया था। हालांकि, अब तक राष्ट्रपति भवन की ओर से कोई आधिकारिक समय तय नहीं किया गया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि वे राष्ट्रपति को मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों, ‘एसआईआर’ प्रक्रिया की विसंगतियों और वोट चोरी से जुड़े ठोस साक्ष्य सौंपना चाहते हैं। विपक्ष ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उन्हें समय नहीं मिला, तो संसद भवन से राष्ट्रपति भवन तक सांसदों का विशाल पैदल मार्च निकाला जाएगा।
दिल्ली में दिग्गजों का जमावड़ा, राहुल गांधी ने साधी विपक्षी एकजुटता
इस आंदोलन को धार देने और राष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाने के लिए राहुल गांधी ने विपक्ष के शीर्ष नेताओं से सीधा संवाद किया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, राजद के तेजस्वी यादव और शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे समेत कई कद्दावर नेताओं को दिल्ली आमंत्रित किया गया है। ममता बनर्जी ने दिल्ली रवाना होने से पहले कहा कि मतदान की विश्वसनीयता और वोट चोरी जैसे गंभीर मसले पर देशव्यापी साझा रणनीति बनाना वक्त की मांग है। वहीं, संसद के संविधान सदन (पुराने संसद भवन का केंद्रीय कक्ष) में विपक्षी दलों के सांसदों की एक आपात और उच्चस्तरीय बैठक बुलाई गई है, जिसमें सड़क से लेकर सदन तक सरकार और चुनाव आयोग को घेरने की आगे की रणनीति पर अंतिम मुहर लगाई जाएगी।
वीआईपी इलाकों में विरोध की रणनीति, छावनी में तब्दील लुटियंस दिल्ली
विपक्षी खेमे से जुड़े सूत्रों का कहना है कि उनका विरोध प्रदर्शन सिर्फ एक मार्च तक सीमित नहीं रहेगा। यदि उनकी चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया गया, तो राष्ट्रपति भवन के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उपराष्ट्रपति के आवासों के बाहर भी शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने के विकल्प खुले रखे गए हैं। विपक्ष के इस कड़े रुख और बड़े पैमाने पर सांसदों के जुटने की संभावना को देखते हुए दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह अलर्ट मोड पर हैं। लुटियंस दिल्ली, विजय चौक, संसद मार्ग और इंडिया गेट के आसपास सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए गए हैं। अर्धसैनिक बलों और पुलिस की अतिरिक्त कंपनियों की तैनाती के साथ जगह-जगह बहुस्तरीय बैरिकेडिंग कर दी गई है, जिससे नई दिल्ली क्षेत्र में यातायात पर भी असर पड़ने की आशंका है।
संस्थागत साख बनाम राजनीतिक दबाव का पेच
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संवैधानिक संस्था के प्रमुख के खिलाफ विपक्ष का यह साझा आंदोलन आने वाले चुनावी समीकरणों को गहरा प्रभावित कर सकता है। विपक्ष जहां इसे ‘लोकतंत्र बचाओ’ मुहिम के रूप में पेश कर रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इसे चुनावी हार की आशंका से उपजी हताशा और निष्पक्ष संस्थाओं को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश बता रहा है। अब सारा दारोमदार इस बात पर टिका है कि क्या राष्ट्रपति भवन विपक्षी नेताओं को मुलाकात का अवसर देता है या फिर दिल्ली की सड़कों पर सत्ता और विपक्ष के बीच एक और ऐतिहासिक सियासी टकराव देखने को मिलेगा। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठे ये सवाल भारतीय राजनीति में लंबे समय तक गूंजते रहेंगे।






