
संवाद 24 नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) को लेकर तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। आतंकवाद के मुद्दे पर भारत द्वारा अपनाए गए बेहद सख्त और आक्रामक रुख ने पाकिस्तान के हुक्मरानों से लेकर वहां की सेना तक की नींद उड़ा दी है। भारत सरकार द्वारा सिंधु नदी तंत्र के पानी पर कड़ा रुख अपनाने के बाद पूरे पाकिस्तान में पानी के बड़े संकट और हाहाकार की स्थिति पैदा हो गई है। इस बीच, अपनी खीझ और बौखलाहट को छुपाने के लिए पाकिस्तानी सेना ने भारत को गीदड़भभकी दी है। पाकिस्तानी सेना के शीर्ष जनरलों ने एक बैठक कर संकल्प लिया है कि वे भारत के इस कदम के खिलाफ ‘हर संभव कदम’ उठाएंगे, जिसने दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसियों के बीच एक नए ‘वॉटर वॉर’ (जल युद्ध) की आशंका को जन्म दे दिया है।
भारत का सख्त एक्शन: ‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते’
इस पूरे विवाद की जड़ भारत का वह ऐतिहासिक और कड़ा फैसला है, जिसके तहत नई दिल्ली ने सिंधु जल समझौते को पूरी तरह से ठंडे बस्ते (Abeyance) में डाल दिया है। भारत ने यह कदम पिछले साल पहलगाम में हुए कायरतापूर्ण और भीषण आतंकवादी हमले के बाद उठाया था। भारत ने साफ और दो टूक शब्दों में वैश्विक मंचों पर कह दिया है कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।” भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट है—जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से संचालित होने वाले सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह, हमेशा के लिए और प्रामाणिक रूप से बंद नहीं करता, तब तक उसके साथ किसी भी समझौते या पानी के साझाकरण पर कोई बात नहीं होगी। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हाल ही में भारत के इस रुख को दोहराते हुए कहा कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देना बंद नहीं करता, तब तक सिंधु जल समझौते को स्थगित रखने का भारत का फैसला पूरी तरह से लागू रहेगा। भारत की इस कड़ी कार्रवाई के कारण पाकिस्तान को मिलने वाले पानी के प्रवाह में भारी कमी आई है, जिससे वहां कृषि, सिंचाई और पीने के पानी का अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है।
पाकिस्तानी सेना की बौखलाहट और कोर कमांडरों की बैठक
भारत की इस आर्थिक और रणनीतिक घेराबंदी से घबराए पाकिस्तानी सेना प्रमुख (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ) फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर्स (GHQ) में 276वीं कोर कमांडरों की एक आपातकालीन बैठक बुलाई। इस उच्च स्तरीय सैन्य बैठक में पाकिस्तान की सुरक्षा स्थिति और भारत के कड़े कदमों की समीक्षा की गई। बैठक के बाद पाकिस्तानी सेना के आधिकारिक विंग ISPR द्वारा जारी एक बयान में कहा गया कि पाकिस्तानी सेना देश की जनता की आकांक्षाओं और सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप पाकिस्तान को सिंधु नदी के पानी का “जायज हिस्सा” दिलाने के लिए हर आवश्यक कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है। सेना ने पाकिस्तान की नेशनल सिक्योरिटी कमेटी (NSC) के उस पुराने और विवादित प्रस्ताव का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि भारत द्वारा पानी रोकना या उसका मार्ग बदलना एक ‘युद्ध की कार्रवाई’ (Act of War) माना जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तानी सेना का यह बयान उसकी आंतरिक नाकामी और जनता के गुस्से को डाइवर्ट करने की एक कोशिश मात्र है, क्योंकि पाकिस्तान इस समय इतिहास के सबसे खराब आर्थिक और कृषि संकट से गुजर रहा है।
पाकिस्तान के मंत्रियों की गीदड़भभकी: ‘हाथ काट देंगे’
सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार के मंत्री भी इस मुद्दे पर पूरी तरह से आपा खो चुके हैं। पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बेहद भड़काऊ और अमर्यादित बयान देते हुए कहा, “पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री के पास एक पानी की टोंटी (कंट्रोल) है। वह कहते हैं कि वह पाकिस्तान में पानी की एक बूंद भी नहीं जाने देंगे। हम उन हाथों को काट देंगे जो हमारे हक के पानी पर दावा ठोकेंगे।” वहीं पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने दावा किया कि 1960 का सिंधु जल समझौता एक कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज है और भारत इसे एकतरफा तरीके से निलंबित या संशोधित नहीं कर सकता। पाकिस्तान ने दुनिया के सामने रोना रोते हुए कहा है कि अगर भारत ने सिंधु नदी तंत्र का पानी पूरी तरह रोक दिया, तो पाकिस्तान की पूरी अर्थव्यवस्था जमींदोज हो जाएगी और वहां भुखमरी के हालात पैदा हो जाएंगे।
क्या है 1960 का सिंधु जल समझौता?
यह विवाद समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना जरूरी है। साल 1960 में विश्व बैंक (World Bank) की मध्यस्थता में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान के बीच सिंधु जल समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।
इस समझौते के तहत नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया था:
पूर्वी नदियां: रावी, ब्यास और सतलुज के पानी पर भारत को पूरा और विशेष अधिकार दिया गया।
पश्चिमी नदियां: सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश पानी पाकिस्तान को आवंटित किया गया था, हालांकि भारत को इन नदियों पर बिजली बनाने (Run-of-the-river projects) और सीमित सिंचाई का अधिकार मिला हुआ था।
पिछले छह दशकों में दोनों देशों के बीच तीन बड़े युद्ध होने के बावजूद यह समझौता टिका रहा। लेकिन पाकिस्तान की तरफ से लगातार जारी आतंकी गतिविधियों और उसकी नापाक हरकतों के कारण भारत के धैर्य का बांध अब टूट चुका है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के किसी भी विक्टिम कार्ड को भाव नहीं देने वाला है।
रणनीतिक बढ़त में भारत
रक्षा और कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत ने जल कूटनीति (Water Diplomacy) के जरिए पाकिस्तान की सबसे कमजोर नस पर हाथ रख दिया है। बिना एक भी गोली चलाए भारत ने पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया है। पाकिस्तान की सेना और सरकार चाहे जितने भी भड़काऊ बयान दे लें, लेकिन हकीकत यह है कि पानी की कमी से वहां की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि अगर पाकिस्तान को अपनी प्यास बुझानी है, तो उसे सबसे पहले आतंक की फैक्ट्रियों को ताला लगाना होगा, अन्यथा पानी की हर बूंद के लिए तरसना उसकी नियति बन जाएगी।






