संसद में आधी आबादी अब भी पीछे: महिला प्रतिनिधित्व क्यों नहीं पकड़ पा रहा रफ्तार

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संवाद 24 नई दिल्ली। देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर लंबे समय से चर्चा हो रही है, लेकिन हकीकत यह है कि संसद में महिलाओं की मौजूदगी अब भी उम्मीद से काफी कम है। हालिया घटनाक्रम और आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि आधी आबादी होने के बावजूद महिलाएं निर्णय लेने वाली संस्थाओं में बराबरी की हिस्सेदारी से दूर हैं।

महिलाओं की हिस्सेदारी: आंकड़े बताते हैं सच्चाई
भारत की संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी सीमित है। लोकसभा में महिलाओं की संख्या लगभग 14% के आसपास है, जबकि राज्यसभा में यह करीब 17% है। राज्यों की विधानसभाओं में यह आंकड़ा और भी कम, लगभग 10% के आसपास बना हुआ है। यह स्थिति तब है जब महिलाएं देश की कुल आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं और चुनावों में उनकी भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है।

वैश्विक तुलना में भारत पीछे
दुनिया के कई देशों ने महिला प्रतिनिधित्व के मामले में उल्लेखनीय प्रगति की है। वैश्विक औसत लगभग 25% से अधिक है, जबकि भारत इससे काफी पीछे है। स्वीडन, दक्षिण अफ्रीका और ब्रिटेन जैसे देशों में संसद में महिलाओं की भागीदारी 40% या उससे अधिक तक पहुंच चुकी है, जबकि भारत की रैंकिंग 140 से भी नीचे बनी हुई है।

महिला आरक्षण का मुद्दा फिर चर्चा में
हाल ही में संसद में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने से जुड़ा विधेयक चर्चा में आया, लेकिन यह पास नहीं हो सका। इस बिल को संसद की सीटों के पुनर्निर्धारण (delimitation) से जोड़ दिया गया था, जिस पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया।

परिसीमन से संतुलित प्रतिनिधित्व का मार्ग
परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित करना होता है, ताकि प्रत्येक क्षेत्र को समान और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व मिल सके। यदि महिला आरक्षण को परिसीमन के बाद लागू किया जाता, तो यह सुनिश्चित किया जा सकता था कि महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें वास्तविक जनसंख्या संतुलन को प्रतिबिंबित करें और देश के विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं को समान अवसर मिल सके। परिसीमन से उन क्षेत्रों को भी उचित प्रतिनिधित्व मिलता है जहां जनसंख्या में वृद्धि हुई है, जिससे महिलाओं की भागीदारी अधिक प्रभावी और सम्मानजनक रूप में सामने आ सकती थी। इस दृष्टि से परिसीमन महिला आरक्षण को दीर्घकालिक रूप से अधिक न्यायसंगत बनाने का एक महत्वपूर्ण आधार माना जा सकता है।

विपक्ष के विरोध पर उठते सवाल
आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो परिसीमन के बाद महिला आरक्षण लागू करने की व्यवस्था का विरोध कई सवाल खड़े करता है। यदि उद्देश्य महिलाओं को सशक्त बनाना था, तो ऐसी प्रक्रिया का समर्थन किया जा सकता था जो प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित और प्रभावी बनाती। विरोध के कारण यह धारणा बनी कि राजनीतिक हित महिलाओं के प्रतिनिधित्व से ऊपर रखे गए, जिससे इस महत्वपूर्ण सुधार के लागू होने में देरी हुई। कई विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन के लाभों को स्वीकार करते हुए सहमति बनाई जाती, तो महिलाओं की भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में अधिक ठोस प्रगति संभव हो सकती थी।

क्यों पीछे हैं महिलाएं? प्रमुख कारण
महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व के पीछे कई सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं:
सामाजिक बाधाएं: पारंपरिक सोच और पारिवारिक जिम्मेदारियां महिलाओं को राजनीति में आने से रोकती हैं।
राजनीतिक दलों की भूमिका: पार्टियां अक्सर महिलाओं को टिकट देने में हिचकिचाती हैं या उन्हें कमजोर सीटों पर उतारती हैं।
आर्थिक और संसाधन की कमी: चुनाव लड़ने के लिए जरूरी संसाधनों तक महिलाओं की पहुंच सीमित रहती है।
राजनीतिक माहौल: अपराध और धनबल वाली राजनीति महिलाओं के लिए चुनौतीपूर्ण मानी जाती है।

कानून बने, लेकिन असर धीमा
महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान पहले भी लाया जा चुका है, लेकिन इसका क्रियान्वयन अभी तक पूरी तरह नहीं हो पाया है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इसे प्रभावी रूप से लागू नहीं किया जाएगा, तब तक वास्तविक बदलाव संभव नहीं है।

धीमी लेकिन लगातार प्रगति
हालांकि स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। पिछले कुछ दशकों में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ी है। 1990 के दशक में जहां संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी 7% के आसपास थी, वहीं अब यह लगभग दोगुनी हो चुकी है। इसके अलावा, स्थानीय निकायों में आरक्षण के कारण पंचायत स्तर पर महिलाओं की भागीदारी काफी मजबूत हुई है, जो भविष्य में राष्ट्रीय राजनीति के लिए आधार तैयार कर सकती है।

आगे का रास्ता: क्या होना चाहिए?
विशेषज्ञ मानते हैं कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए सिर्फ कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए:
राजनीतिक दलों को महिलाओं को अधिक टिकट देने होंगे
चुनावी खर्च और संसाधनों तक समान पहुंच सुनिश्चित करनी होगी
समाज में जागरूकता और समर्थन बढ़ाना होगा
आरक्षण कानून को समयबद्ध तरीके से लागू करना होगा

बराबरी की राजनीति कब?
भारत ने कई क्षेत्रों में महिलाओं की उपलब्धियों को देखा है, लेकिन राजनीति में उनकी भागीदारी अब भी सीमित है। जब तक संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या संतुलित नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र पूरी तरह प्रतिनिधिक नहीं माना जा सकता। महिलाओं की बढ़ती भागीदारी न सिर्फ समानता का सवाल है, बल्कि बेहतर और समावेशी शासन की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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