जिनेवा शांति वार्ता बेनतीजा: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े कूटनीतिक फासले, वैश्विक अस्थिरता की नई लहर
Share your love

संवाद 24 नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय शांति की कोशिशों को उस समय बड़ा झटका लगा जब जिनेवा में आयोजित अमेरिका और ईरान के बीच की उच्च स्तरीय वार्ता बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई। इस विफलता ने न केवल मध्य पूर्व में तनाव कम करने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है, बल्कि वैश्विक राजनीति में एक नई अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है। दोनों देशों के बीच बढ़ते गतिरोध ने अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी चिंता में डाल दिया है।
वार्ता की विफलता और तकनीकी पेंच
जिनेवा में हुई इस बैठक का मुख्य उद्देश्य परमाणु कार्यक्रम और लंबे समय से चले आ रहे प्रतिबंधों पर एक सर्वमान्य समाधान खोजना था। हालाँकि, घंटों तक चली गहन चर्चा के बावजूद, दोनों पक्षों के बीच वैचारिक मतभेद इतने गहरे थे कि किसी भी साझा बयान पर सहमति नहीं बन सकी। जानकारों का कहना है कि शर्तों को लेकर दोनों ओर से बरती गई कड़ाई ने वार्ता की मेज पर मौजूद समाधान की संभावनाओं को समाप्त कर दिया।
कड़ा रुख और भविष्य की चुनौतियाँ
अमेरिकी प्रशासन की ओर से अब कूटनीतिक रुख और भी कड़ा होने के संकेत मिल रहे हैं। यह स्पष्ट कर दिया गया है कि कोई भी समझौता तब तक स्वीकार्य नहीं होगा जब तक वह अमेरिका के सुरक्षा मानकों और क्षेत्रीय हितों को पूरी तरह सुरक्षित न करे। वहीं दूसरी ओर, ईरान ने भी अपने रुख में लचीलापन दिखाने से इनकार कर दिया है। इस टकराव का नतीजा यह है कि अब ‘अधिकतम दबाव’ वाली पुरानी नीतियां फिर से सक्रिय हो सकती हैं, जिससे खाड़ी क्षेत्र में सैन्य और आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होने का डर है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर काले बादल
इस विफलता का असर केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। जिनेवा से आई इस खबर के बाद वैश्विक शेयर बाजारों और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव की संभावना बढ़ गई है। यूरोपीय संघ और अन्य मध्यस्थ देश, जो इस वार्ता को सफल बनाने के लिए महीनों से प्रयास कर रहे थे, अब भविष्य की रणनीति को लेकर पशोपेश में हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीति विफल रहती है, तो आने वाले समय में आर्थिक प्रतिबंधों का एक नया दौर शुरू हो सकता है, जिसका बोझ पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ सकता है।
समाधान की राह अब और कठिन
वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि अमेरिका और ईरान के बीच संवाद के दरवाजे फिलहाल के लिए लगभग बंद हो गए हैं। इस गतिरोध ने यह साबित कर दिया है कि बिना ठोस भरोसे और लचीलेपन के अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाना नामुमकिन है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कोई तीसरा पक्ष फिर से दोनों को मेज पर लाने का साहस दिखा पाएगा या फिर दुनिया एक नए कूटनीतिक शीत युद्ध की गवाह बनेगी।






