वंदे भारत अभी 160 पर ही थी कि चीन ने छू लिया 700 का आंकड़ा! क्या भारत की बुलेट ट्रेन और हाइपरलूप दे पाएंगे टक्कर?

संवाद 24 नई दिल्ली। इक्कीसवीं सदी में दुनिया के ताकतवर देशों के बीच की जंग अब केवल सरहदों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह तकनीक और रफ्तार के गलियारों में भी लड़ी जा रही है। हाल ही में चीन से आई एक खबर ने पूरी दुनिया के परिवहन विशेषज्ञों को चौंका दिया है। जहाँ भारत अपनी सेमी-हाई-स्पीड ‘वंदे भारत’ ट्रेनों के विस्तार और उनकी 160 किमी/घंटा की रफ्तार पर गर्व कर रहा है, वहीं पड़ोसी देश चीन ने एक ऐसी ‘अल्ट्रा-हाई-स्पीड’ मैगलेव (Maglev) तकनीक का सफल परीक्षण किया है, जिसकी गति विमानों को टक्कर देने वाली है।

चीन का ऐतिहासिक परीक्षण: 2 सेकंड में 700 किमी/घंटा की रफ्तार
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (SCMP) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, चीन की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है जो विज्ञान कथा (Science Fiction) जैसी लगती है। एक विशेष रूप से निर्मित 400 मीटर (1,310 फुट) लंबी मैग्नेटिक लेविटेशन टेस्ट लाइन पर, वैज्ञानिकों ने एक टन वजनी वाहन को मात्र दो सेकंड के भीतर 700 किलोमीटर प्रति घंटे (लगभग 435 मील प्रति घंटा) की अविश्वसनीय रफ्तार तक पहुँचाया।

यह परीक्षण केवल रफ्तार के मामले में ही नहीं, बल्कि नियंत्रण के मामले में भी अभूतपूर्व रहा। इतनी भीषण गति प्राप्त करने के बाद, वाहन को सुरक्षित रूप से रोक भी लिया गया। यह तकनीक ‘इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च’ सिद्धांत पर आधारित है, जिसका उपयोग भविष्य में न केवल ज़मीनी परिवहन बल्कि अंतरिक्ष अभियानों में भी किया जा सकता है।

क्या है मैगलेव तकनीक और यह इतनी तेज़ क्यों है?
मैगलेव, यानी ‘मैग्नेटिक लेविटेशन’ (Magnetic Levitation), एक ऐसी प्रणाली है जिसमें ट्रेन पटरियों के संपर्क में नहीं रहती। चुंबकीय शक्ति के कारण ट्रेन ट्रैक से कुछ इंच ऊपर हवा में तैरती है। चूंकि ट्रेन और ट्रैक के बीच कोई घर्षण (Friction) नहीं होता, इसलिए ऊर्जा का नुकसान न्यूनतम होता है और गति की कोई ऊपरी सीमा व्यावहारिक रूप से नहीं रह जाती।

चीन के इस ताज़ा परीक्षण में ‘शून्य वायु प्रतिरोध’ (Zero Air Resistance) के सिद्धांत पर भी काम किया जा रहा है। यदि इन ट्रेनों को वैक्यूम ट्यूब के भीतर चलाया जाए, तो ये 1000 किमी/घंटा की गति भी पार कर सकती हैं। चीन वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा हाई-स्पीड रेल नेटवर्क संचालित करता है, लेकिन 700 किमी/घंटा की यह छलांग उसे परिवहन के एक नए युग में ले जाएगी।

भारत की वंदे भारत: यथार्थ और चुनौतियाँ
चीन की तुलना में भारत की स्थिति को देखें, तो भारत वर्तमान में अपने रेल नेटवर्क के आधुनिकीकरण के शुरुआती चरण में है। स्वदेशी तकनीक से निर्मित ‘वंदे भारत’ एक्सप्रेस भारत की इंजीनियरिंग क्षमता का प्रतीक बनकर उभरी है। आधिकारिक तौर पर, वंदे भारत की अधिकतम परीक्षण गति 180 किमी/घंटा है, जबकि परिचालन स्तर पर यह ज्यादातर रूटों पर 130 से 160 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ रही है।

भारत के लिए चुनौती तकनीक की नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की है। भारतीय पटरियाँ पुरानी हैं और इतनी अधिक गति झेलने के लिए डिज़ाइन नहीं की गई हैं। इसके अलावा, भारत में रेल मार्गों पर मवेशियों का आना और घुमावदार ट्रैक बड़ी बाधाएं हैं। जबकि चीन मैगलेव के जरिए भविष्य की नींव रख रहा है, भारत अभी अपनी पटरियों को 160 किमी/घंटा के अनुकूल बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

वैश्विक प्रतिस्पर्धा: कौन कहाँ खड़ा है?
परिवहन के क्षेत्र में इस समय तीन मुख्य प्रौद्योगिकियां दौड़ में हैं:

  • पारंपरिक हाई-स्पीड रेल: जैसे भारत की वंदे भारत या जापान की शिंकानसेन (बिना मैगलेव वाली)।
  • मैगलेव: जापान और चीन इसमें अग्रणी हैं। जापान की एल0 सीरीज मैगलेव के नाम 603 किमी/घंटा का रिकॉर्ड था, जिसे अब चीन के इस नए परीक्षण ने चुनौती दी है।
  • हाइपरलूप: एलन मस्क द्वारा प्रस्तावित यह तकनीक वैक्यूम ट्यूब में मैगलेव का उपयोग करती है, जो 1200 किमी/घंटा तक जा सकती है।

चीन का 700 किमी/घंटा का सफल टेस्ट यह दर्शाता है कि वह हाइपरलूप और पारंपरिक मैगलेव के बीच के अंतर को बहुत तेज़ी से भर रहा है।

आर्थिक और सामरिक प्रभाव
चीन की इस सफलता के गहरे निहितार्थ हैं। यदि 700 किमी/घंटा की रफ्तार वाली ट्रेनें व्यावसायिक रूप से शुरू हो जाती हैं, तो बीजिंग से शंघाई (लगभग 1200 किमी) की दूरी मात्र डेढ़ से दो घंटे में तय की जा सकेगी। यह हवाई यात्रा के विकल्प के रूप में उभरेगा और कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद करेगा। सामरिक दृष्टि से, ऐसी तकनीक भारी सैन्य साजो-सामान को देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पलक झपकते पहुँचाने में सक्षम बनाती है। चीन की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी का इसमें शामिल होना यह संकेत देता है कि इस तकनीक का उपयोग भविष्य में रक्षा क्षेत्र में भी किया जाएगा।

भारत के लिए क्या हैं सबक?
संवाद 24 के विश्लेषण के अनुसार, भारत को अपनी ‘बुलेट ट्रेन’ परियोजना (मुंबई-अहमदाबाद) में तेजी लाने के साथ-साथ भविष्य की तकनीकों पर निवेश करना होगा। भारत वर्तमान में जापान की मदद से 320 किमी/घंटा वाली बुलेट ट्रेन पर काम कर रहा है। लेकिन चीन के 700 किमी/घंटा के परीक्षण ने यह साफ कर दिया है कि जब तक भारत अपनी पहली बुलेट ट्रेन शुरू करेगा, दुनिया उससे दो पीढ़ी आगे निकल चुकी होगी। हमें ‘वंदे भारत’ जैसी ट्रेनों से आगे बढ़कर स्वदेशी मैगलेव या हाइपरलूप अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

भारत चुपचाप अपनी दो महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर काम कर रहा है। एक तरफ बुलेट ट्रेन (MAHSR) है जो सधा हुआ और परीक्षित समाधान है, तो दूसरी तरफ हाइपरलूप है जो परिवहन की परिभाषा बदलने का माद्दा रखता है। दिसंबर 2025 तक की स्थिति के अनुसार, दोनों परियोजनाओं में काफी प्रगति देखी गई है।

मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) प्रोजेक्ट, जिसे आम भाषा में बुलेट ट्रेन कहा जाता है, अब फाइलों से निकलकर पटरियों पर आता दिख रहा है। 508 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर का निर्माण कार्य 2025 के अंत तक निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका है। गुजरात के सूरत, वडोदरा और अहमदाबाद जैसे शहरों में स्टेशन और वायडक्ट (elevated tracks) का काम लगभग पूरा होने की कगार पर है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, इस रूट पर लगभग 409 किलोमीटर पिलर्स खड़े किए जा चुके हैं और 330 किलोमीटर से अधिक वायडक्ट का निर्माण पूरा हो चुका है। महाराष्ट्र खंड में भी, बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) से शिलफाटा के बीच भारत की पहली 21 किलोमीटर लंबी अंडर-सी (समुद्र के नीचे) टनल का काम तेजी से चल रहा है। रेल मंत्रालय का लक्ष्य है कि अगस्त 2027 तक सूरत से वापी के बीच पहला खंड शुरू कर दिया जाए, जबकि पूरी लाइन 2029 तक चालू होने की उम्मीद है। यह ट्रेन 320 किमी/घंटा की परिचालन गति से चलेगी, जो भारत की मौजूदा रेल यात्रा को पूरी तरह बदल देगी।

जहाँ बुलेट ट्रेन पटरियों पर दौड़ती है, वहीं हाइपरलूप एक बंद ‘वैक्यूम ट्यूब’ के भीतर तैरते हुए कैप्सूल की तरह चलती है। भारत में इस तकनीक का केंद्र आईआईटी मद्रास (IIT Madras) बना हुआ है। रेल मंत्रालय के सहयोग से, आईआईटी मद्रास ने चेन्नई में 422 मीटर लंबा भारत का पहला हाइपरलूप टेस्ट ट्रैक सफलतापूर्वक तैयार कर लिया है।

दिसंबर 2025 की घोषणाओं के अनुसार, भारत अब व्यावसायिक परिचालन की दिशा में बढ़ते हुए 40-50 किलोमीटर लंबे पहले व्यावसायिक कॉरिडोर की योजना बना रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में टाटा और अन्य भागीदारों के साथ मिलकर JNPT पोर्ट से वधावन पोर्ट के बीच माल ढुलाई (Freight) के लिए हाइपरलूप के उपयोग पर एमओयू साइन किया है। सैद्धांतिक रूप से, हाइपरलूप 1,000 से 1,200 किमी/घंटा की गति हासिल कर सकता है, जिससे दिल्ली से हरिद्वार या मुंबई से पुणे जैसे सफर मात्र 20-25 मिनट में सिमट जाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को इन दोनों तकनीकों की जरूरत है। जहाँ बुलेट ट्रेन भारी संख्या में यात्रियों (Mass Transit) को सुरक्षित और तेज परिवहन देगी, वहीं हाइपरलूप भविष्य में लंबी दूरी के सफ़र और त्वरित माल ढुलाई के लिए गेम-चेंजर साबित होगा। चीन के 700 किमी/घंटा वाले मैगलेव टेस्ट ने भारत के इन प्रयासों को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है, क्योंकि अब प्रतिस्पर्धा केवल पटरियों तक सीमित नहीं रही।

अंततः हम कह सकते हैं कि चीन का 700 किमी/घंटा की रफ्तार का परीक्षण केवल एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं है, बल्कि यह वैश्विक मंच पर तकनीक की श्रेष्ठता का प्रदर्शन है। भारत के लिए यह ‘वेक-अप कॉल’ है। वंदे भारत निश्चित रूप से एक शानदार उपलब्धि है, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए हमें अपनी महत्वाकांक्षाओं को और ऊँचा उठाना होगा। रफ्तार की इस रेस में जो देश आज तकनीक विकसित करेगा, वही कल की दुनिया पर राज करेगा।

Samvad 24 Office
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