समुद्र के नीचे छिपा खतरा: क्या किसी भी वक्त ठप हो सकता है भारत का इंटरनेट?

संवाद 24 डेस्क। आज जब दुनिया डिजिटल क्रांति के शिखर पर खड़ी है, तब हम अक्सर इंटरनेट को केवल मोबाइल नेटवर्क, वाई-फाई या सैटेलाइट से जोड़कर देखते हैं। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। वैश्विक इंटरनेट ट्रैफिक का लगभग 95% हिस्सा समुद्र के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स के जरिए संचालित होता है। ये केबल्स आधुनिक दुनिया की वह “डिजिटल धमनियां” हैं, जिन पर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था, संचार व्यवस्था और तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र निर्भर करता है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।

क्या हैं अंडरसी (Submarine) केबल्स?
अंडरसी केबल्स वे फाइबर ऑप्टिक तार हैं, जो महासागरों के तल पर बिछाए जाते हैं और महाद्वीपों को आपस में जोड़ते हैं।
भारत में करीब 17 से अधिक अंतरराष्ट्रीय अंडरसी केबल सिस्टम हैं, जो देश को वैश्विक इंटरनेट से जोड़ते हैं।
इनके माध्यम से:
बैंकिंग ट्रांजैक्शन
क्लाउड डेटा ट्रांसफर
अंतरराष्ट्रीय कॉल और वीडियो
IT और BPO सेवाएं चलती हैं।

बढ़ता खतरा: क्यों चर्चा में हैं ये केबल्स?
हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने इन केबल्स को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
भारत सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों से रिस्क एनालिसिस और बैकअप प्लान तैयार करने को कहा है।
ईरान और रेड सी क्षेत्र में तनाव के कारण इंटरनेट बाधित होने का खतरा बढ़ गया है।
यह सिर्फ सैद्धांतिक खतरा नहीं है—ऐसी घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं।

जब कट गई केबल्स: इतिहास के सबक
2008 का बड़ा झटका
2008 में मध्य-पूर्व क्षेत्र में कई केबल कटने से भारत सहित कई देशों में इंटरनेट धीमा हो गया था।
2025 रेड सी घटना
सितंबर 2025 में रेड सी में केबल कटने से भारत, पाकिस्तान और मध्य-पूर्व में इंटरनेट प्रभावित हुआ।
इन घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि इंटरनेट की यह संरचना कितनी संवेदनशील है।

सबसे बड़ा खतरा: रेड सी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़
रेड सी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ ऐसे समुद्री मार्ग हैं, जहां से भारत का बड़ा इंटरनेट ट्रैफिक गुजरता है। रेड सी दुनिया के इंटरनेट ट्रैफिक का महत्वपूर्ण हिस्सा वहन करता है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ भारत के पश्चिमी इंटरनेट कनेक्शन का बड़ा मार्ग है अगर इन क्षेत्रों में केबल क्षतिग्रस्त होते हैं, तो:
इंटरनेट स्पीड धीमी हो सकती है
अंतरराष्ट्रीय सेवाएं बाधित हो सकती हैं
डिजिटल अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है

खतरे के प्रकार: सिर्फ युद्ध नहीं, कई कारण
अंडरसी केबल्स को कई तरह के खतरे होते हैं:
. भू-राजनीतिक (Geopolitical) खतरे
युद्ध और तनाव
आतंकी या गैर-राज्य तत्वों द्वारा नुकसान
. मानवजनित दुर्घटनाएं
जहाजों के एंकर
मछली पकड़ने के जाल
. प्राकृतिक आपदाएं
भूकंप
सुनामी
समुद्री भूस्खलन
. अप्रत्याशित कारण
समुद्री जीवों द्वारा नुकसान
केबल का घिसना

भारत पर संभावित प्रभाव
अगर अंडरसी केबल्स बाधित होते हैं, तो भारत पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है:
. आर्थिक असर
भारत का IT और BPO सेक्टर पूरी तरह ग्लोबल कनेक्टिविटी पर निर्भर है।
. बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली
SWIFT जैसे सिस्टम के जरिए रोजाना लाखों अंतरराष्ट्रीय ट्रांजैक्शन होते हैं।
. राष्ट्रीय सुरक्षा
सैन्य संचार और निगरानी भी इन केबल्स पर निर्भर करती है।
. डिजिटल सेवाएं
UPI
आधार
सरकारी योजनाएं इन सभी पर असर पड़ सकता है।

कितना बड़ा हो सकता है नुकसान?
विशेषज्ञों के अनुसार:
रेड सी में बाधा आने पर भारत का 25% इंटरनेट प्रभावित हो सकता है
2008 जैसी स्थिति में 80% तक कनेक्टिविटी प्रभावित हो चुकी है

भारत की तैयारी: कितना मजबूत है सिस्टम?
भारत ने खतरे को देखते हुए कई कदम उठाए हैं:
. वैकल्पिक रूट (Alternate Routing)
ट्रैफिक को अन्य केबल्स से रीरूट किया जाता है
इससे पूरी तरह इंटरनेट बंद नहीं होता
. सरकार की सक्रियता
टेलीकॉम कंपनियों से contingency plan मांगा गया
जोखिम विश्लेषण पर जोर
. नए केबल प्रोजेक्ट
भारत को केंद्र बनाकर नए ग्लोबल नेटवर्क विकसित किए जा रहे हैं
. सैटेलाइट इंटरनेट विकल्प
Starlink जैसे विकल्प भविष्य में बैकअप बन सकते हैं

बड़ी चुनौती: मरम्मत और समय
अंडरसी केबल्स को ठीक करना आसान नहीं है:
समुद्र में सटीक स्थान ढूंढना
विशेष जहाजों की जरूरत
कई सप्ताह या महीनों का समय
युद्ध या तनाव के समय यह प्रक्रिया और कठिन हो जाती है।

क्या पर्याप्त है सुरक्षा?
विशेषज्ञ मानते हैं कि:
केबल्स की सुरक्षा के लिए वैश्विक सहयोग जरूरी है
वर्तमान कानून (UNCLOS) पर्याप्त नहीं हैं
भारत को चाहिए:
अधिक केबल रूट
मजबूत निगरानी प्रणाली
घरेलू रिपेयर क्षमता

भविष्य की दिशा: सुरक्षित डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर
भविष्य में भारत को इन कदमों पर ध्यान देना होगा:
अंडरवाटर डोमेन अवेयरनेस (UDA)
अधिक केबल डाइवर्सिटी
घरेलू निर्माण और मरम्मत क्षमता
साइबर और भौतिक सुरक्षा का एकीकरण

अदृश्य संकट, लेकिन वास्तविक खतरा
अंडरसी केबल्स पर मंडराता खतरा सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का मुद्दा है। आज जब भारत डिजिटल सुपरपावर बनने की ओर अग्रसर है, तब इन “अदृश्य लाइनों” की सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि अगर ये केबल्स कटती हैं, तो सिर्फ इंटरनेट नहीं— बल्कि पूरी डिजिटल दुनिया थम सकती है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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