सिम कार्ड फेंकने के बाद भी नहीं बच पाएंगे अपराधी! जानिए वो ‘सीक्रेट तकनीक’ जिससे पुलिस मिनटों में ढूंढ लेगी मोबाइल।

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संवाद 24 डेस्क। नई दिल्ली: डिजिटल युग में मोबाइल फोन सिर्फ बातचीत का जरिया नहीं, बल्कि हमारी पहचान बन चुका है। अक्सर अपराधी या मोबाइल चोरी करने वाले लोग सोचते हैं कि फोन से सिम कार्ड (SIM Card) निकाल देने या फोन स्विच ऑफ कर देने से उनकी लोकेशन ट्रैक नहीं की जा सकेगी। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? विज्ञान और कानून प्रवर्तन एजेंसियों (Law Enforcement Agencies) के पास ऐसी कई उन्नत तकनीकें हैं, जिनकी मदद से बिना सिम के भी मोबाइल की सटीक लोकेशन का पता लगाया जा सकता है।

IMEI नंबर: मोबाइल की डिजिटल कुंडली
जब आप फोन से सिम कार्ड निकाल देते हैं, तो सेलुलर नेटवर्क प्रदाता आपके फोन नंबर को ट्रैक नहीं कर सकते, लेकिन फोन की अपनी एक अलग पहचान होती है जिसे IMEI (International Mobile Equipment Identity) कहते हैं। यह 15 अंकों का एक विशिष्ट नंबर होता है जो दुनिया के हर मोबाइल हैंडसेट के लिए अलग होता है।
जैसे ही कोई फोन चालू होता है, वह नजदीकी सेलुलर टावर को सिग्नल भेजता है। भले ही उसमें सिम न हो, फोन इमरजेंसी कॉल की सुविधा के लिए नेटवर्क से जुड़ने की कोशिश करता है। इस प्रक्रिया में फोन अपना IMEI नंबर टावर के साथ साझा करता है। पुलिस इसी नंबर को सर्विस प्रोवाइडर्स के ‘ब्लैकलिस्ट’ या ‘ट्रैकिंग डेटाबेस’ में डाल देती है, जिससे फोन के ऑन होते ही अलर्ट मिल जाता है।

सेल टावर ट्रायंगुलेशन (Cell Tower Triangulation) विधि
बिना सिम के भी फोन की लोकेशन जानने के लिए पुलिस ‘सेल टावर ट्रायंगुलेशन’ तकनीक का इस्तेमाल करती है। हमारा फोन हर समय आसपास के कम से कम तीन या उससे अधिक टावरों के संपर्क में रहता है ताकि सिग्नल की मजबूती बनी रहे।
इस तकनीक में, पुलिस यह देखती है कि फोन का सिग्नल किन तीन टावरों से कितनी दूरी पर है। सिग्नल पहुंचने में लगने वाले समय (Time Difference of Arrival) के आधार पर एक भौगोलिक क्षेत्र का नक्शा तैयार किया जाता है, जिससे अपराधी या फोन की लोकेशन कुछ मीटर के दायरे में सीमित हो जाती है।

साइलेंट एसएमएस और डिजिटल फुटप्रिंट्स
आधुनिक तकनीक में ‘साइलेंट एसएमएस’ या ‘स्टील्थ पिंग’ का भी उपयोग किया जाता है। यह एक ऐसा मैसेज होता है जो यूजर को दिखाई नहीं देता और न ही कोई नोटिफिकेशन बजता है। लेकिन जैसे ही यह फोन पर पहुंचता है, फोन नजदीकी टावर को अपनी मौजूदगी का रिस्पॉन्स भेजता है। इसके अलावा, यदि फोन किसी सार्वजनिक वाई-फाई (Wi-Fi) से जुड़ता है, तो उसके MAC Address के जरिए भी उसे लोकेट किया जा सकता है।

GPS और क्लाउड सेवाओं की भूमिका
आजकल के स्मार्टफोन में इन-बिल्ट GPS (Global Positioning System) होता है। अगर फोन में इंटरनेट सक्रिय है (चाहे सिम से या वाई-फाई से), तो Google का ‘Find My Device’ या Apple का ‘Find My iPhone’ बेहद सटीक लोकेशन बताता है। पुलिस इन कंपनियों के साथ कानूनी समन्वय करके अपराधी का पीछा कर सकती है।
रोचक बात यह है कि एप्पल जैसी कंपनियां ‘ऑफलाइन फाइंडिंग’ तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। इसमें यदि आपका फोन बंद है या बिना इंटरनेट के है, तो भी वह आसपास के अन्य आईफोन को एन्क्रिप्टेड ब्लूटूथ सिग्नल भेजता है, जिससे उसकी लोकेशन मालिक तक पहुंच जाती है।

कानून और सुरक्षा का समन्वय
भारत में, पुलिस विभाग ‘सेंट्रल इक्विपमेंट आइडेंटिटी रजिस्टर’ (CEIR) पोर्टल का उपयोग करता है। यह दूरसंचार विभाग की एक पहल है। यदि आपका फोन चोरी हो जाता है, तो आप इस पोर्टल पर अपना IMEI ब्लॉक कर सकते हैं। इसके बाद, अगर कोई व्यक्ति उस फोन में नया सिम भी डालता है, तो वह फोन काम नहीं करेगा और तुरंत पुलिस को लोकेशन की सूचना मिल जाएगी।

तकनीक ने अपराधियों के लिए बचना लगभग नामुमकिन बना दिया है। सिम कार्ड निकालना महज एक अस्थायी बाधा है, लेकिन फोन का हार्डवेयर (IMEI और अन्य सेंसर) हमेशा अपने पीछे निशान छोड़ता है। सुरक्षा विशेषज्ञों की सलाह है कि फोन खोने पर तुरंत FIR दर्ज कराएं और IMEI नंबर को ब्लॉक करवाएं ताकि तकनीक का लाभ उठाकर उसे समय रहते बरामद किया जा सके।

Geeta Singh
Geeta Singh

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