सोशल मीडिया पर लगेगी उम्र की लगाम? AI और डीपफेक पर सरकार की बड़ी तैयारी

संवाद 24 डेस्क। गत सप्ताह नई दिल्ली में आयोजित India AI Impact Summit 2026 का आयोजन ऐसे समय में हुआ जब दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक के फायदे और नुकसान दोनों पर गहरा शोध और विचार चल रहा है। यह सम्मेलन भारत के लिए केवल तकनीकी चर्चाओं का मंच नहीं रहा, बल्कि एक स्पष्ट नीति-निर्माण दिशा की शुरुआत भी बन गया है। सम्मेलन में, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने AI की संभावनाओं, सोशल मीडिया नियंत्रण, डीपफेक खतरों, कानूनी ढांचे और राष्ट्रीय हितों के लिए AI रणनीति पर भावनात्मक लेकिन अत्यंत व्यावहारिक बयान दिए।

AI साम्राज्य में निवेश और भारत की आर्थिक आकांक्षाएँ
AI तकनीक केवल नीति-निर्माण या तकनीकी बहस तक सीमित नहीं है; यह आर्थिक अवसरों का एक विशाल क्षेत्र भी है। वैष्णव ने अपने भाषण में स्पष्ट किया कि भारत अगले दो वर्षों में AI और उससे जुड़े क्षेत्रों में लगभग 200 बिलियन डॉलर से अधिक निवेश की उम्मीद कर रहा है, जिसमे वैश्विक निवेशक, स्टार्टअप, घरेलू कंपनियां और सरकारी परियोजनाएँ शामिल हैं।
यह निवेश न केवल AI-आधारित उत्पादों और सेवाओं के विकास में सहायता करेगा, बल्कि आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और भारत को वैश्विक तकनीकी मानचित्र पर एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगा।

पॉजिटिव AI बनाम नकारात्मक AI प्रभाव
वैष्णव ने कहा कि आज दुनिया के कई देश इस बात पर सहमत हैं कि AI तकनीक का उपयोग सकारात्मक उद्देश्यों जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और स्मार्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए होना चाहिए। लेकिन इसके विपरीत, AI के नकारात्मक उपयोग जैसे अनियंत्रित डीपफेक वीडियो, गलत जानकारी, निजता उल्लंघन, साइबर अपराध और डिजिटल हानियों को रोकने के लिए एक टेक्नो-लीगल ढांचे की आवश्यकता है।
उन्होने स्पष्ट रूप से कहा कि केवल नियम बनाना ही पर्याप्त नहीं है; टेक्नोलॉजी-आधारित समाधान और कानूनी प्रतिबंधों का संयोजन ही भविष्य की चुनौतियों का समाधान कर सकता है — जिसे वैधानिक और तकनीकी दोनों दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है।

सोशल मीडिया पर उम्र-आधारित नियंत्रण का विचार
सबसे चर्चा में रहा विषय था सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर उम्र-आधारित प्रतिबंधों को लागू करने का विचार। वैष्णव ने कहा कि सरकार सोशल मीडिया कंपनियों के साथ बातचीत कर रही है ताकि यह तय किया जा सके कि किस उम्र के उपयोगकर्ताओं को कौन-सा कंटेंट दिखाया जाना चाहिए और किन कंटेंट तक पहुँच प्रतिबंधित होनी चाहिए।
उनका यह बयान वैश्विक प्रवृत्ति के अनुरूप है, जहां कई देशों ने बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए कठोर नियम अपनाए हैं। ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों ने पहले से ही बच्चों के लिए उम्र सत्यापन और अभिभावकीय सहमति जैसे मानदंड विकसित किए हैं।
वैष्णव ने अपने भाषण में यह भी कहा कि भारत ने पहले से ही डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट में उम्र-आधारित वर्गीकरण लागू किया है, लेकिन आगे और स्पष्ट नियमों पर पार्लियामेंट में व्यापक सहमति बनाना आवश्यक है।

डीपफेक तकनीक: खतरा या चुनौती?
समारोह में डीपफेक तकनीक को लेकर भी विस्तृत चर्चा हुई। डीपफेक वीडियो और ऑडियो आज तेजी से विकसित हो रहे हैं और राजनीतिक, सामाजिक तथा व्यक्तिगत स्तर पर गलत जानकारी फैलाने का एक शक्तिशाली उपकरण बन चुके हैं।
वैष्णव ने स्पष्ट किया कि डीपफेक तकनीक प्रत्यक्ष रूप से लोकतंत्र, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और सामाजिक स्थिरता को खतरे में डाल सकती है। उन्होंने कहा कि यह समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है और इसे रोकने के लिए मजबूत नियम और क़ानूनी संरचना विकसित करना आवश्यक है।
वेबसाइटों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही बढ़ाने के साथ ही डीपफेक सामग्री की पहचान, ट्रैकिंग और दंडात्मक प्रावधानों को लागू करने पर भी ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर भी डीपफेक नियंत्रण को लेकर चर्चा हो रही है और भारत भी इसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

सोशल मीडिया कंपनियों के लिए कानूनी अनुपालन
वैष्णव ने दोबारा स्पष्ट किया कि चाहे Netflix, YouTube, Meta या X जैसे वैश्विक प्लेटफॉर्म हों, सभी को भारत के कानूनी ढांचे, संविधान और सांस्कृतिक मानकों के तहत काम करना होगा।
उनका यह बयान वैश्विक तकनीकी कंपनियों को भारत में अपनी नीतियों और संचालन के लिए स्थानीय कानूनों का सम्मान करने की याद दिलाता है। अब तक भारत ने कई बार डिजिटल प्लेटफॉर्मों के जवाबदेही मानदंडों को सख्त किया है — जिसमें कन्टेंट हटाने की समय-सीमा, डेटालोकलाइजेशन नीति और उपयोगकर्ता सुरक्षा उपाय शामिल हैं।

Techno-Legal दृष्टिकोण: नियम से परे सोच
वैष्णव ने केवल नियमों पर निर्भर रहने की बजाए टेक्नो-लीगल अप्रोच अपनाने की बात कही। इसका मतलब है कि तकनीकी समाधान के साथ कानूनी संरचना को मिलाकर AI-सेफ्टी और उपयोगकर्ता सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
यह दृष्टिकोण पारंपरिक नियम-आधारित प्रणाली से आगे बढ़ता है क्योंकि यह उभरती तकनीकों के साथ तालमेल बनाए रखता है और परिवर्तनशील खतरों का सामना करने के लिए अधिक लचीला होता है।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर AI नीति की दिशा
भारत न केवल घरेलू AI नीति-निर्माण में सक्रिय है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी AI के सुरक्षित और नैतिक उपयोग को लेकर साझेदारी मजबूत कर रहा है। वैष्णव ने बताया कि भारत विश्व के 30 से अधिक देशों के साथ AI विनियमन, सुरक्षा मानकों और डिजिटल नैतिकता पर वार्ता कर रहा है।
इस पहल से भारत AI शासन और मानकीकरण के वैश्विक मंचों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है, जिससे वैश्विक AI रणनीति को नैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों के आधार पर आकार दिया जा सके।

AI Safety Institute और भविष्य की संरचना
भारत AI विनियमन और सुरक्षा के क्षेत्र में पहले से ही कई पहल कर रहा है, जिनमें AI सेफ्टी इंस्टिट्यूट की स्थापना भी शामिल है, जिसका लक्ष्य AI के सुरक्षित प्रयोग के मानदंड और मानक स्थापित करना है।
यह संस्था टेक्निकल समाधान, जोखिम पहचान, आंतर-संचालन मानक और जवाबदेही क्षमताओं को विकसित करेगी — जो भविष्य में AI नियंत्रण को और अधिक प्रभावशाली बनाएगी।

एक संतुलित डिजिटल भविष्य की दिशा में
India AI Impact Summit 2026 में अश्विनी वैष्णव के बयान ने स्पष्ट संकेत दिया कि भारत का लक्ष्य AI को नियंत्रित, सुरक्षित और नैतिक रूप से विकसित करना है। उम्र-आधारित सीमाओं, डीपफेक नियंत्रण, सोशल मीडिया कंपनी के अनुपालन और टेक्नो-लीगल ढांचे के माध्यम से यह दिशा स्पष्टता से उभरकर सामने आई है।
AI तकनीक जहाँ एक ओर नवाचार, आर्थिक विकास और सामाजिक लाभ का रास्ता खोलती है, वहीं इसके संभावित दुरुपयोग के खिलाफ सख्त सुरक्षा उपायों की भी आवश्यकता है। भारत इन दोनों आयामों को संतुलित करते हुए एक नैतिक, सुरक्षित और समावेशी डिजिटल भविष्य की ओर अग्रसर है — जो न केवल राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी है, बल्कि वैश्विक प्लेटफॉर्मों के संदर्भ में भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

Geeta Singh
Geeta Singh

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Get regular updates on your mail from Samvad 24 News