कानून में नहीं है “डिजिटल अरेस्ट”, फिर कैसे लूट रहे हैं साइबर अपराधी?
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संवाद 24 डेस्क। डिजिटल इंडिया के विस्तार ने जहां लोगों के जीवन को सरल, तेज़ और अधिक सुविधाजनक बनाया है, वहीं इसी डिजिटल दुनिया में ठगों और साइबर अपराधियों ने नए-नए जाल फैलाये हैं। इनमें से “डिजिटल अरेस्ट” ठगी (Digital Arrest Scam) एक ऐसा खतरनाक फ्रॉड है, जिसने लाखों भारतीयों को आर्थिक, मानसिक और सामाजिक रूप से प्रभावित किया है। लेकिन ऐसा क्या है, क्यों यह फैल रहा है, कानून की क्या स्थिति है, और पीड़ित क्या कर सकते हैं – ये सभी पहलू आज की डिजिटल सुरक्षा विमर्श का केंद्र हैं।
आज के लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है, लेकिन साइबर अपराधी किस तरह इसे डर, धमकी और धोखे के रूप में इस्तेमाल करते हैं, जिससे असहाय नागरिक भारी आर्थिक हानि भुगतते हैं।
डिजिटल अरेस्ट क्या है? – धोखे की परिभाषा
असल में डिजिटल अरेस्ट नामक कोई शब्द, कोई कानूनी प्रावधान या गिरफ्तारी प्रक्रिया भारतीय कानून में मौजूद नहीं है। यह सिर्फ़ साइबर ठगों द्वारा रची गई एक धोखाधड़ी की रणनीति है जिसमें अपराधी खुद को सरकारी अधिकारी, पुलिस, कस्टम अधिकारी, या अन्य एजेंसियों का प्रतिनिधि बताकर नागरिक को फंसाने की कोशिश करते हैं।
उदाहरणार्थ, न केवल यह शब्द क़ानून में मौजूद नहीं है, बल्कि वास्तविक सरकारी अधिकारी कभी भी फोन या वीडियो कॉल पर किसी को गिरफ्तार करने की धमकी नहीं देते और न ही पैसे मांगते हैं।
एक प्रमुख साइबर अपराध विशेषज्ञ बताते हैं कि:
“डिजिटल अरेस्ट जैसा कोई कानूनी शब्द नहीं है और भारतीय कानून में यह प्रक्रिया मान्यता प्राप्त नहीं है।”
फ्रॉड की स्क्रिप्ट: अपराधी कैसे काम करते हैं
डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड के पीछे साइबर अपराधियों की एक सुसंगठित स्क्रिप्ट होती है, जिसमें वे निम्नलिखित तरीकों से अपनी चाल चलते हैं:
. कॉल या वीडियो कॉल से प्रारंभिक संपर्क
अपराधी अनजान नंबर से कॉल करता है या वीडियो कॉल करता है।
खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, कस्टम, या किसी उच्च अधिकारी का बताकर संपर्क करता है।
. भय पैदा करना
आपको बताते हैं कि आपके नाम से कोई गंभीर अपराध हुआ है — जैसे ड्रग्स तस्करी, पैसा लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद की फाइनेंसिंग, धोखाधड़ी इत्यादि।
ये आरोप आपके बैंक खाते, आपके आधार नंबर या आपके नाम पर भेजे गए पैकेट के बारे में आधारित होते हैं।
. नकली दस्तावेज दिखाना
अपराधी fake warrants, fake FIRs, पुलिस के आदेश, कोर्ट के फ़र्जी दस्तावेज और सरकारी आईडी दिखा कर आपको भ्रमित करते हैं।
. लगातार कॉल से मानसिक दबाव
पीड़ित को घंटों कॉल पर बांध कर रखते हैं और डरते हैं कि अगर वे सहयोग नहीं करेंगे तो उन्हें “डिजिटल गिरफ्तार” किया जाएगा।
. पैसे और बैंक जानकारी माँगना
फिर वे तुरंत पैसे, बैंक डिटेल्स, OTP, डेबिट/क्रेडिट कार्ड जानकारी, या फंड ट्रांसफ़र करने को कहते हैं।
कई बार पीड़ित को “सुरक्षा राशि” के नाम पर पैसे ट्रांस्फर करने के लिए कहा जाता है।
यह स्क्रिप्ट अधिकतर मानसिक दबाव, चोरी की रणनीति और भय-मनिपुलेशन पर आधारित होती है, जिससे पीड़ित तुरन्त निर्णय ले लेते हैं।
एक खौफनाक सत्य: बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान
डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड केवल एक छोटा-सा धोखा नहीं है – यह बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान का रूप ले चुका है। कई मामलों में पीड़ितों ने करोड़ों रुपये की हानि उठाई है, जिनमें से कई वरिष्ठ नागरिक, गृहिणियाँ, व्यवसायी और प्रोफेशनल शामिल हैं।
. विशाल धोखाधड़ी के उदाहरण
एक 78 वर्षीय सेवानिवृत्त बैंकर को लगभग ₹23 करोड़ तक की राशि फ्रॉड हो गई, क्योंकि अपराधियों ने पूरे एक महीने तक उन्हें “डिजिटल अरेस्ट” में रखा और हर दिन पैसे ट्रांस्फर करवाये।
कई वरिष्ठ नागरिकों ने शिकायत की कि आरोपियों ने उन्हें घर में ही “डिजिटल गिरफ्तारी” की तरह रखा और लगातार दबाव डाला।
इस तरह के मामलों में साइबर अपराधियों का उद्देश्य सिर्फ़ फ़ोन कॉल नहीं होता, बल्कि वे लम्बे समय तक पीड़ित को भ्रमित कर सकते हैं और बड़े फ़ाइनेंसियल नुकसान का लाभ उठाते हैं।
कानून की स्थिति – क्या “डिजिटल अरेस्ट” वैध है?
यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। भारत के कानून में डिजिटल अरेस्ट नामक कोई गिरफ्तारी प्रावधान नहीं है। इसका अर्थ यह है कि न तो पुलिस, न ही कोई सरकारी एजेंसी आपको इस नाम से गिरफ्तार कर सकती है।
कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो:
यदि कोई व्यक्ति सचमुच अपराध में लिप्त है, तो उसकी असली गिरफ्तारी कानून के नियम और प्रक्रिया (CrPC) के अनुरूप होती है।
अदालत के आदेश, गिरफ्तारी वारंट और आदेश कागज़ पर आधिकारिक होते हैं – न कि वीडियो कॉल या फोन पर।
जिस तरह के धमकी, डर और दबाव का इस्तेमाल अपराधी करते हैं, वह सभी कानून के विरुद्ध है और न्यायालय इसे धोखाधड़ी, धमकी, इंटरसेप्टिंग डेटा, और वायर फ्रॉड जैसी धाराओं के तहत देखता है।
साइबर क्राइम की चेतावनी और ICICI बैंक का अलर्ट
दरअसल, क्योंकि यह फ्रॉड इतना व्यापक और जानलेवा रूप ले रहा है, बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने भी अपने ग्राहकों को चेतावनी जारी की है। इसी कड़ी में ICICI बैंक ने अपने खाताधारकों को ईमेल और नोटिफ़िकेशन भेजकर स्पष्ट किया कि:
✔️ “डिजिटल अरेस्ट” कानून में नहीं है। ✔️ फोन या वीडियो कॉल पर पैसे मांगना या धमकी देना साइबर फ्रॉड है, वास्तविक प्रक्रिया नहीं। ✔️ किसी भी संदिग्ध कॉल पर कभी भरोसा न करें। ✔️ विशेष रूप से OTP, बैंक डिटेल या खाता डिटेल शेयर न करें जब तक आप संदेह न मिटा लें।
बैंक ने स्पष्ट किया कि वास्तविक सरकारी अधिकारी कभी भी ऐसा तरीका नहीं अपनाते, और अगर कोई पूछे तो तुरंत National Cyber Crime Reporting Portal (नैशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल) पर रिपोर्ट करें।
पीड़ितों के अनुभव – सच के करीब
डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी के कई मामलों में पीड़ितों ने खुद अपने अनुभव साझा किये हैं। इनमें से कुछ प्रमुख अनुभव हैं:
. वापसी की आशा
एक पीड़ित के पिता ने लगभग ₹10 लाख खो दिए, लेकिन उन्होंने शिकायत जल्द दर्ज कराई, जिससे कुछ राशि वापस पाने में मदद मिली।
. आनंद की मौत जैसी घटनाएँ
एक 76 वर्षीय व्यक्ति को लगातार दबाव में रखकर तीन दिनों तक रखा गया, जिसके बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई।
भारतीय न्याय प्रणाली और सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिक्रिया
साइबर फ्रॉड के बढ़ते मामलों के मद्देनज़र सर्वोच्च न्यायालय भी सक्रिय हुआ है। एक बड़े मामले में जहाँ एक पूर्व बैंकर ₹23 करोड़ की राशि का नुकसान हुआ, सुप्रीम कोर्ट ने सेंटर, CBI, RBI और बैंकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह दिखाता है कि मुद्दा न केवल आर्थिक नुकसान का है, बल्कि न्यायिक स्तर पर भी गंभीरता से लिया जा रहा है।
किस प्रकार से बचें – सावधानियों के व्यावहारिक सुझाव
इस पूरी चुनौती के बीच, नागरिकों को खुद को सुरक्षित रखने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम उठाने होंगे:
. संदिग्ध कॉल की पहचान
सरकारी अधिकारी कभी भी अनजान नंबर से वीडियो कॉल पर “गिरफ्तारी” जैसी धमकी नहीं देते।
किसी भी कथित “अधिकारक” की पहचान पूछें और असली लिंक/आईडी की पुष्टि करें।
. कोई भी बैंक डिटेल कभी साझा न करें
OTP, क्रेडिट/डेबिट जानकारी या नेट बैंकिंग डिटेल किसी भी अनजान व्यक्ति से साझा न करें।
. शांत रहें और तुरंत जांच करें
अगर कोई डर या दबाव डालता है, तो तुरंत फोन काट दें और संबंधित संस्था से खुद संपर्क करें।
. फौरी शिकायत दर्ज कराएँ
National Cyber Crime Reporting Portal पर तुरंत रिपोर्ट करें।
फोन पर 1930 सायबर हेल्पलाइन पर संपर्क करें।
. बैंक से तत्काल सम्पर्क करें
अपने बैंक की फ़्रॉड डिटेक्शन लाइन पर तुरंत रिपोर्ट करें।
साक्षरता, सुरक्षा और सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता
डिजिटल इंडिया का सपना तभी सुरक्षित रहेगा जब हम तकनीकी ज्ञान, साइबर सुरक्षा साक्षरता और डिजिटल फ्रॉड के खिलाफ सतर्कता को बढ़ावा दें। “डिजिटल अरेस्ट” जैसे भ्रामक शब्द का सही अर्थ समझना, साइबर अपराधियों के खेल को पहचानना और सतर्क रहना – यही हमारे सामूहिक समाधान हैं।
साइबर अपराधी हर कदम पर नई तकनीकों और रणनीतियों का उपयोग करते हैं, और इसी लिए हमें न केवल कानूनी जागरूकता बल्कि तकनीकी, सामाजिक और सामूहिक सहयोग की आवश्यकता है, ताकि लोग सुरक्षित रहें और धोखे का शिकार न बनें।
आज का सच यही है – डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी अपराध का नाम है, गिरफ्तारी का नहीं, और प्रत्येक नागरिक को इस धोखे से खुद को बचाना सीखना चाहिए।






