निजता से समझौता नहीं: व्हाट्सऐप-मेटा की डेटा नीति पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

संवाद 24 डेस्क। विवाद मूल रूप से व्हाट्सऐप की 2021 में अपडेट की गई प्राइवेसी पॉलिसी से शुरू हुआ, जिसमें यूजर्स को “लेना है तो लो, नहीं तो छोड़ दो” के आधार पर डेटा शेयरिंग स्वीकारने को मजबूर किया गया। इसका मतलब यह था कि अगर कोई यूजर इस नीति को स्वीकार नहीं करता तो वह व्हाट्सऐप का उपयोग नहीं कर सकता। इस नीति के तहत व्हाट्सऐप उपयोगकर्ताओं का डेटा अपनी अन्य मेटा समूह कंपनियों के साथ साझा कर सकता था, जिससे डेटा का व्यावसायिक उपयोग भी संभव होता था।

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने इस नीति को डोमिनेंस के दुरुपयोग और उपभोक्ता के निजता अधिकार का हनन माना और जुलाई 2024 में मेटा/व्हाट्सऐप पर ₹213.14 करोड़ का जुर्माना लगाया। इसके साथ ही CCI ने कई सुधारात्मक निर्देश भी दिए, जैसे कि स्पष्ट opt-in/opt-out विकल्प देना और डेटा शेयरिंग की प्रकृति व उद्देश्य को स्पष्ट रूप से बताना।

इस फैसले के खिलाफ मेटा और व्हाट्सऐप ने अपील National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) में दायर की, जो जनवरी 2025 में जुर्माने को बरकरार रखते हुए कुछ डेटा शेयरिंग प्रतिबंधों को हटाने वाला फैसला दे बैठा। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई: 3 फ़रवरी 2026
सुनवाई के दौरान एक तीन-न्यायाधीशीय बेंच — जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमलया बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम़. पंचोली शामिल थे — ने मेटा और व्हाट्सऐप की गोपनीयता नीति को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि भारत में किसी भी कंपनी को नागरिकों के निजता के अधिकार के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि:
प्राइवेसी पॉलिसी की भाषा इतनी जटिल और चालाकी से तैयार की जाती है कि आम आदमी उसे समझ ही नहीं पाता।

बिना स्पष्ट opt-out विकल्प दिए यूजर को ऐसा चैनल चुनने के लिए मजबूर करना निजता के अधिकार का उल्लंघन है।

इस तरह की नीति को “निजता जानकारी की चोरी का सभ्य तरीका” कहना गलत नहीं होगा।

यदि कंपनियाँ भारतीय संविधान का पालन नहीं कर सकतीं, तो उन्हें भारत छोड़ देना चाहिए।

बेंच ने यह भी निर्देश दिया कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को भी इस मामले में पक्षकार बनाया जाए, और अगले निर्णय (interim order) के लिए 9 फ़रवरी 2026 को तारीख निर्धारित की। अदालत ने कहा कि या तो मेटा/व्हाट्सऐप डेटा शेयर न करने का लिखित आश्वासन दें, या अदालत को अंतरिम आदेश पारित करना होगा।

अदालत के मुख्य तर्क और चिन्ताएँ

निजता अधिकार संविधानिक अधिकार
सुनवाई के दौरान अदालत ने बार-बार यह रेखांकित किया कि निजता का अधिकार संविधान की मूल भावना का हिस्सा है और इसे व्यापारिक हितों के लिए समझौता नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि केवल सहमति मांग लेना ही पर्याप्त नहीं है — वह सहमति साफ़, पारदर्शी और समझने योग्य होनी चाहिए।

“Take It or Leave It” नीति की समस्या
जब एक कंपनी यूजर को कोई विकल्प ही नहीं देती कि वह डेटा साझा करना चाहता है या नहीं, तो वह उपयोगकर्ता की पसंद को सीमित करती है। ऐसे मामलों में अदालत ने कहा कि डेटा का व्यापारिक उपयोग बिना स्पष्ट तरीके से बताये पूर्णतः अस्वीकार्य है।

डेटा का टार्गेटेड विज्ञापन के लिए उपयोग
अदालत ने यह सवाल उठाया कि किस प्रकार डेटा — यहां तक कि एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड संदेशो से जुड़े मेटाडेटा का उपयोग — व्यावसायिक विज्ञापन के लिए किया जा सकता है और यह कैसे उपयोगकर्ताओं के निजता अधिकार को प्रभावित करता है।

महत्वपूर्ण प्रभाव
यह मामला तकनीकी कंपनियों के लिए भारत में डेटा प्राइवेसी और उपभोक्ता अधिकारों की दिशा तय करने वाला हो सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट अपना रुख बनाए रखता है, तो:

कंपनियों को स्पष्ट opt-in/opt-out मैकेनिज़्म देना अनिवार्य हो जाएगा।

उपयोगकर्ता डेटा के व्यावसायिक उपयोग पर नियंत्रण सख्त हो सकता है।

भारत में डेटा-नियमों के अनुपालन के नए मानक बन सकते हैं।

वैश्विक तकनीकी दिग्गजों को भारतीय कानून और संविधान के अनुरूप अपनी प्राइवेसी नीतियों को संशोधित करना पड़ सकता है।

भारत का शीर्ष न्यायालय डिजिटल निजता के महत्व को बेहद गंभीरता से ले रहा है और स्पष्ट कर चुका है कि किसी भी बहुराष्ट्रीय तकनीकी कंपनी को नागरिकों के संवैधानिक अधिकार के साथ समझौता करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। व्हाट्सऐप और मेटा के खिलाफ यह सुनवाई डेटा-शेयरिंग, गोपनीयता, और उपयोगकर्ता नियंत्रण के मुद्दों पर देश में तकनीकी कंपनियों के दायित्वों को स्पष्ट तरीके से परिभाषित कर सकती है। 9 फ़रवरी 2026 को आएगा अगला अंतरिम आदेश, जो इस विवाद का अगला मोड़ तय करेगा।

Geeta Singh
Geeta Singh

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