
आचार्य मधुसूदन अग्निहोत्री (ज्योतिषाचार्य,कर्मकांड एवं धर्म निर्णय विशेषज्ञ) सनातन काल-गणना और हिंदू पंचांग की व्यवस्था अत्यंत वैज्ञानिक और खगोलीय पिंडों की गति पर आधारित है। अक्सर श्रद्धालुओं के मन में यह कौतूहल उत्पन्न होता है कि सामान्य वर्षों में गंगा दशहरा के ठीक अगले दिन ही निर्जला एकादशी का व्रत आता है, लेकिन इस वर्ष (2026) इन दोनों महा-पर्वों के मध्य पूरे एक महीने का लंबा अंतराल दिखाई दे रहा है!
इस अद्भुत खगोलीय अंतर का मूल कारण हिंदू पंचांग की ‘अधिक मास’ (मलमास या पुरुषोत्तम मास) व्यवस्था है। आइए, इस विषय को शास्त्रों के प्रामाणिक सिद्धांतों और वर्ष 2026 की सटीक तारीखों के आलोक में गहराई से समझते हैं।
अधिक मास की पहचान: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिस चंद्र मास की अवधि (अमावस्या से अमावस्या) के बीच सूर्य देव राशि परिवर्तन नहीं करते (अर्थात कोई संक्रांति नहीं होती), वह पूरा मास ‘अधिक मास’ कहलाता है।
वर्ष 2026 में ज्येष्ठ का महीना ही ‘अधिक मास’ के रूप में आया है, जिससे इस वर्ष दो ज्येष्ठ मास होंगे:
- अधिक ज्येष्ठ (मलमास): 17 मई 2026 से 15 जून 2026 तक।
- निज ज्येष्ठ (शुद्ध मास): 16 जून 2026 से आषाढ़ प्रारंभ होने तक।
गंगा दशहरा: अधिक ज्येष्ठ में ही मनाने का शास्त्रीय नियम
मूल तिथि विधान: शास्त्रों के अनुसार, पतितपावनी माँ गंगा का पृथ्वी पर अवतरण ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को हुआ था। धर्मसिन्धु का अकाट्य प्रमाण है:
“ज्येष्ठ शुक्ल दशम्यां गंगावतरणम्”
अर्थात— ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को ही गंगा का अवतरण हुआ था।
अधिक मास में निर्णय का आधार: शास्त्रों के अनुसार, जब पंचांग में दो ज्येष्ठ मास (अधिक और निज) आते हैं, तब आचार्यों ने परंपरा से यह निर्णय स्थापित किया है कि गंगा दशहरा सदैव ‘अधिक ज्येष्ठ’ (मलमास) में ही मनाया जाएगा। वर्ष 2026 में यह तिथि 26 मई 2026 (मंगलवार) को पड़ रही है। इसके पीछे दो मुख्य तर्क हैं:
- तिथि प्रधानता: गंगा दशहरा एक तिथि प्रधान पर्व है। यह तिथि अधिक मास के दौरान भी अपनी नैसर्गिक पवित्रता बनाए रखती है।
- स्नान एवं दान का महा-पुण्य: गंगा दशहरा स्नान, तर्पण और महादान का पर्व है। अधिक मास स्वयं में भगवान विष्णु (पुरुषोत्तम) को समर्पित अत्यंत पुण्यदायी मास है। इसलिए, इस विशेष मास में गंगा स्नान और दान करने का फल सामान्य से कई गुना अधिक बढ़ जाता है।
निर्जला एकादशी: केवल शुद्ध मास का कड़ा नियम
गंगा दशहरा के विपरीत, निर्जला एकादशी का महा-व्रत सदैव शुद्ध (निज) ज्येष्ठ मास की शुक्ल एकादशी को ही किया जाता है, अधिक मास में नहीं।
वैष्णव नियम: निर्णयसिन्धु एवं वैष्णवाचार परंपरा का स्पष्ट निर्देश है:
“निर्जला ज्येष्ठ शुक्लैकादश्यां भवेत्”
अर्थात— निर्जला व्रत केवल शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी में ही ग्रहण करने योग्य (ग्राह्य) है।
वर्ष 2026 की स्थिति: चूंकि अधिक ज्येष्ठ 15 जून को समाप्त हो जाएगा, इसलिए शुद्ध (निज) ज्येष्ठ मास की शुरुआत इसके बाद होगी। इसी नियम के कारण वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी का कठिन निर्जल व्रत 25 जून 2026 (गुरुवार) को रखा जाएगा।
तर्क: सनातन परंपरा में यह सर्वमान्य नियम है कि सभी नित्य-नैमित्तिक उपासनाएं, मुख्य व्रत, उपवास और कामना-सिद्धि से जुड़े कर्म केवल ‘निज (शुद्ध) मास’ में ही संपन्न किए जाते हैं, मलमास या अधिक मास में नहीं।
तात्विक निष्कर्ष (एक दृष्टि में)
यह सुंदर व्यवस्था दर्शाती है कि सनातन धर्म में पर्वों का निर्धारण केवल ऐतिहासिक घटना के समय पर ही नहीं, बल्कि परंपरा, धर्मशास्त्रीय निर्णय और व्रत के अंतर्निहित स्वरूप पर आधारित होता है।
आचार्य का संदेश
“काल का ज्ञान ही कर्म की सिद्धि है।” इस वर्ष 26 मई को अधिक ज्येष्ठ मास में पवित्र स्नान व दान करके माँ गंगा की कृपा प्राप्त करें, और उसके ठीक एक महीने बाद 25 जून को पूर्ण संयम के साथ निर्जला एकादशी का महा-व्रत रखकर श्रीहरि विष्णु का आशीर्वाद पाएं।







