
पूराराय, कन्नौज। कन्नौज के पूराराय क्षेत्र में चल रही राम कथा के छठवें दिन भगवान श्रीराम और उनके अनुज भरत के बीच प्रेम, त्याग और समर्पण का भावपूर्ण प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावुक हो उठे। कथा व्यास आचार्य आशुतोष मिश्र, जो सीतापुर से आए हैं, ने भरत चरित्र का वर्णन करते हुए भाई के प्रति प्रेम और धर्म के प्रति उनकी निष्ठा को कथा के माध्यम से प्रस्तुत किया।
ननिहाल से लौटे भरत को मिले अशुभ संकेत
कथा के दौरान आचार्य ने बताया कि ननिहाल से अयोध्या लौटने पर भरत को परिस्थितियां असामान्य दिखाई दीं। राजमहल में पसरे शोक और पिता राजा दशरथ के निधन की जानकारी मिलने के बाद जब उन्हें श्रीराम के वनवास का समाचार मिला तो वे अत्यंत दुखी हुए। इसके बाद भरत ने श्रीराम को अयोध्या वापस लाने का निर्णय लिया।
श्रीराम को लौटाने वन पहुंचे भरत
कथा में बताया गया कि भरत श्रीराम को वापस लाने के लिए वन पहुंचे और उनसे अयोध्या लौटने का आग्रह किया। श्रीराम ने पिता के वचन को सर्वोपरि मानते हुए वनवास की अवधि पूरी करने का निर्णय कायम रखा। राम-भरत संवाद का यही प्रसंग रामचरितमानस के अयोध्याकांड में प्रमुख रूप से वर्णित है।
चरण पादुका लेकर लौटे भरत, नंदीग्राम में किया तपस्वी जीवन
आचार्य ने भरत के त्याग और समर्पण का वर्णन करते हुए बताया कि श्रीराम के वापस न लौटने पर भरत उनकी चरण पादुकाएं लेकर अयोध्या लौटे और उन्हें राज्यासन पर स्थापित किया। इसके बाद उन्होंने स्वयं नंदीग्राम में तपस्वी जीवन अपनाते हुए श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में राज्य संचालन किया। रामचरितमानस के संबंधित प्रसंग में भी पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित करने और नंदीग्राम में भरत के निवास का उल्लेख मिलता है।
श्री राम जय राम’ संकीर्तन से भक्तिमय हुआ वातावरण
कथा के दौरान ‘श्री राम जय राम’ का संकीर्तन हुआ। भक्ति और राम नाम के जयघोष से कथा पंडाल का वातावरण भक्तिमय हो गया। भरत के चरित्र के माध्यम से श्रोताओं के सामने त्याग, कर्तव्य, भाईचारे और समर्पण का संदेश रखा गया।
श्रद्धालुओं ने किया आरती-पूजन
कथा कार्यक्रम में पत्रकार कुंवर देवेंद्र सिंह एवं उनकी पत्नी राखी सिंह ने आरती-पूजन किया। इस अवसर पर राजपाल सिंह, अमित कुमार, अमित कुमार शर्मा, आचार्य सुधीर चतुर्वेदी, जगपाल सिंह और रक्षपाल सिंह सहित अन्य श्रद्धालु मौजूद रहे।भरत चरित्र के प्रसंग के दौरान पंडाल में श्रद्धा और भावुकता का वातावरण देखने को मिला। कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया गया कि सच्चा प्रेम अधिकार की भावना से नहीं, बल्कि त्याग, मर्यादा और समर्पण से परिभाषित होता है।






