
उमर्दा/कन्नौज। उमर्दा ब्लॉक के भुन्ना गांव स्थित गौशाला में गोवंश के भरण-पोषण को लेकर ग्रामीणों की शिकायतों ने व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि गौशाला में लंबे समय से गोवंश को मुख्य रूप से सूखा भूसा ही दिया जा रहा है, जबकि हरा चारा और अन्य पौष्टिक आहार की पर्याप्त व्यवस्था दिखाई नहीं दे रही है। उनका दावा है कि इससे कई पशु कमजोर होते जा रहे हैं।
ग्रामीणों का दावा—गौशाला बनने के बाद नहीं मिला हरा चारा
ग्रामीणों के अनुसार, गौशाला स्थापित होने के बाद से यहां रखे गए गोवंश को नियमित रूप से हरा चारा उपलब्ध नहीं कराया गया। ग्रामीणों ने सरकार की ओर से गोवंश के भरण-पोषण के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली धनराशि के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक जांच की पुष्टि फिलहाल उपलब्ध जानकारी में नहीं हुई है।
सरकारी व्यवस्था में सिर्फ भूसा ही नहीं, संतुलित आहार का प्रावधान
उत्तर प्रदेश सरकार की आधिकारिक गौशाला व्यवस्था से जुड़े दस्तावेज बताते हैं कि निराश्रित गोवंश के आश्रय स्थलों के संचालन और भरण-पोषण के लिए शासन स्तर पर दिशा-निर्देश जारी हैं। सरकारी पोर्टल पर भूसा संग्रहण और गोवंश के भरण-पोषण से संबंधित कई शासनादेश दर्ज हैं।सरकार की प्रकाशित जानकारी में गोवंश को भूसा, हरा चारा और दाना उपलब्ध कराने तथा पर्याप्त पानी की व्यवस्था पर जोर दिया गया है। मुख्यमंत्री स्तर से भी यह निर्देश दिए जा चुके हैं कि गोवंश को केवल सूखा भूसा नहीं, बल्कि हरा चारा भी उपलब्ध कराया जाए और भरण-पोषण के लिए जारी धनराशि का सदुपयोग सुनिश्चित किया जाए।
गौशाला में क्या मिल रहा है और क्या होना चाहिए—यही है असली सवाल
उपलब्ध सरकारी दिशा-निर्देशों में गोवंश के लिए चारे की व्यवस्था को लेकर मानक तय किए गए हैं। एक सरकारी मार्गदर्शिका में प्रति पशु चारे और भूसे की आवश्यकता के मानकीकरण का उल्लेख है। वहीं उत्तर प्रदेश की गौशाला संबंधी आधिकारिक योजना में संतुलित आहार के तौर पर भूसा/चारा, हरा चारा, खनिज-युक्त सामग्री और स्वच्छ पेयजल जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख मिलता है।ऐसे में भुन्ना गौशाला में वास्तव में प्रतिदिन कितना भूसा, हरा चारा और दाना पहुंच रहा है, कितने गोवंश दर्ज हैं और उनके अनुपात में कितना खर्च हो रहा है—इन बिंदुओं का सत्यापन मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकता है।
ग्रामीणों ने लगाए भ्रष्टाचार के आरोप, प्रधान ने किया खारिज
गांव के इंद्रेश कुमार, सुदमा, रवि समेत कई ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि सरकारी धन खर्च होने के बावजूद गोवंश को अपेक्षित आहार नहीं मिल रहा है। ग्रामीणों ने व्यवस्था की जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग उठाई है।दूसरी ओर, ग्राम प्रधान संजय कटियार ने ग्रामीणों द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार और अनदेखी के आरोपों को निराधार बताया है। ऐसे में आरोप और जवाब के बीच अब प्रशासनिक जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
रिकॉर्ड की जांच से साफ होगी तस्वीर
मामले में यदि प्रशासन जांच करता है तो गौशाला में दर्ज गोवंशों की संख्या, चारे की खरीद और आपूर्ति के बिल, स्टॉक रजिस्टर, भुगतान का विवरण, पशु चिकित्सा रिकॉर्ड तथा मौके पर उपलब्ध चारे का भौतिक सत्यापन महत्वपूर्ण होगा। इससे यह स्पष्ट किया जा सकेगा कि सरकारी मद से स्वीकृत धनराशि का वास्तविक उपयोग किस प्रकार हुआ और गौशाला में गोवंश को निर्धारित सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं।उत्तर प्रदेश सरकार का आधिकारिक गौशाला प्रबंधन पोर्टल शिकायत दर्ज कराने की सुविधा भी उपलब्ध कराता है और पशुधन समस्या निवारण के लिए टोल-फ्री नंबर 1800-180-5141 प्रदर्शित करता है।
अब जांच पर टिकी नजर, सामने आएगी दावों की सच्चाई
भुन्ना गौशाला को लेकर उठे सवाल फिलहाल ग्रामीणों के आरोप बनाम ग्राम प्रधान के खंडन तक सीमित हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध खोज में इस विशेष गौशाला के संबंध में कोई ऐसी स्वतंत्र और विश्वसनीय रिपोर्ट नहीं मिली, जिससे ग्रामीणों के आरोपों या भ्रष्टाचार के दावे की स्वतंत्र पुष्टि हो सके। इसलिए इसे प्रमाणित भ्रष्टाचार के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।अब निगाह इस बात पर रहेगी कि स्थानीय प्रशासन गौशाला का मौके पर निरीक्षण कर चारे की उपलब्धता, गोवंश की स्थिति और सरकारी धन के इस्तेमाल का सत्यापन करता है या नहीं।






