MNREGA से ‘जी-राम-जी’ तक: विधेयकों के हिंदी नामों ने बढ़ाया सियासी ताप, उत्तर-दक्षिण की बहस फिर तेज

Share your love

संवाद 24 नई दिल्ली। केंद्र सरकार के हालिया विधेयकों के नाम हिंदी में रखे जाने की परंपरा ने संसद से लेकर राज्यों तक नई बहस छेड़ दी है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MNREGA) के नाम में संभावित बदलाव को लेकर उठे विवाद ने इस मुद्दे को और गहरा कर दिया है। बीते कुछ महीनों में सरकार की ओर से पेश किए गए कई विधेयक केवल हिंदी नामों के साथ सामने आए हैं, जिसे विपक्ष का एक वर्ग भाषा के जरिए एकरूपता थोपने की कोशिश बता रहा है।

सबसे तीखी प्रतिक्रिया दक्षिण भारत से आई है, जहां कई नेताओं ने इसे हिंदी थोपने से जोड़ते हुए संविधान की भावना के खिलाफ बताया है। विपक्ष का कहना है कि अब तक चली आ रही वह परंपरा, जिसमें विधेयकों के नाम हिंदी और अंग्रेजी—दोनों भाषाओं में होते थे—धीरे-धीरे खत्म की जा रही है।

कौन-कौन से विधेयक बने विवाद की वजह?
सरकार की ओर से लाया गया ‘विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण)’ विधेयक, जिसे संक्षेप में ‘जी-राम-जी’ कहा जा रहा है, MNREGA की जगह ले सकता है। इसी तरह उच्च शिक्षा सुधार से जुड़े विधेयक का नाम ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान’ रखा गया है। बीमा कानूनों में संशोधन के लिए ‘सबका बीमा, सबकी रक्षा’ शीर्षक वाला विधेयक भी पेश किया गया।

परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी निवेश की अनुमति देने से जुड़े विधेयक का नाम अंग्रेजी में रखा गया, लेकिन उसका संक्षिप्त नाम ‘SHANTI’ (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India) भी विवाद का कारण बन गया। इससे पहले, औपनिवेशिक दौर के कानूनों की जगह भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य विधेयक लागू किए जा चुके हैं। 1934 के एयरक्राफ्ट एक्ट की जगह ‘भारतीय वायुयान विधेयक’ ने भी ले ली है।

संसद में उठा विरोध
लोकसभा में ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान’ विधेयक पेश किए जाने के दौरान RSP(A) सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने कहा कि उन्हें ऐसे लंबे हिंदी नाम बोलने में ही कठिनाई हो रही है। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 348 का उल्लंघन बताया, जिसके तहत कानूनों के आधिकारिक नाम अंग्रेजी में होने की बात कही गई है।

कांग्रेस सांसद जोति मणि और DMK के टी.एम. सेल्वगणपति ने भी सरकार के रुख पर आपत्ति जताई। जोति मणि ने आरोप लगाया कि यह हिंदी थोपने की कोशिश है और तमिलनाडु को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में तीन-भाषा नीति के विरोध के चलते SSA फंड से वंचित किया गया। DMK के वरिष्ठ नेता टी.आर. बालू ने भी दक्षिणी राज्यों पर भाषा के दबाव का मुद्दा उठाया।

चिदंबरम का सवाल
कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने इसे गैर-हिंदी भाषी राज्यों का अपमान बताया। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा कि 75 वर्षों से यह परंपरा रही है कि विधेयकों के अंग्रेजी संस्करण में अंग्रेजी और हिंदी संस्करण में हिंदी शीर्षक होते थे। जब इतने वर्षों तक किसी को दिक्कत नहीं हुई, तो सरकार अब इस परंपरा को क्यों बदल रही है?

राजनीति के केंद्र में भाषा
MNREGA का नाम बदलने को लेकर कांग्रेस जहां इसे महात्मा गांधी के नाम से जुड़ी योजना का अपमान बता रही है, वहीं भाजपा पलटवार करते हुए इसे विपक्ष की हिंदू संस्कृति के प्रति कथित असहिष्णुता करार दे रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधेयकों के हिंदी नामों का यह प्रयोग उत्तर और दक्षिण भारत के बीच पहले से मौजूद भाषाई संवेदनशीलता को और तेज कर सकता है।

भाषा, कानून और राजनीति के इस संगम में अब सवाल यह है कि क्या सरकार अपने फैसले पर कायम रहेगी या बढ़ते विरोध के बीच कोई संतुलित रास्ता निकाला जाएगा।

Samvad 24 Office
Samvad 24 Office

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Get regular updates on your mail from Samvad 24 News