राजनाथ सिंह बोले – सिंध हमेशा हमारी सभ्यता का हिस्सा, भविष्य में सीमा बदलना भी संभव
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संवाद 24
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि “आज भले ही सिंध की भूमि भारत का हिस्सा नहीं है, लेकिन सभ्यता के अनुसार सिंध हमेशा भारत का ही भाग रहा है। सीमा कब बदल जाए, कोई नहीं जानता। संभव है कि कल फिर से सिंध भारत में शामिल हो जाए।”
वे रविवार को दिल्ली में आयोजित सिंधी सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का उल्लेख करते हुए बताया कि आडवाणी ने अपनी एक पुस्तक में लिखा था कि सिंधी हिंदू, विशेष रूप से उनकी पीढ़ी के लोग, आज भी सिंध को भारत से अलग नहीं मानते।
सिंध के भारत से अलग होने का इतिहास
- 1947 के बंटवारे में सिंध पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।
- यह पाकिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा प्रांत है, जिसकी राजधानी कराची है।
- यहां मुख्य रूप से उर्दू, सिंधी और अंग्रेजी बोली जाती हैं।
बंटवारा इतना गहरा था कि 2 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले थार रेगिस्तान का बड़ा हिस्सा अलग हो गया। इसके बाद बड़े पैमाने पर पलायन हुआ, जिससे सिंध की तरक्की हिंसा और गरीबी में बदल गई।
सिंध से हिंदुओं का पलायन और असर
- उस समय लगभग 8 लाख हिंदू सिंध छोड़कर भारत आए।
- जिन मुसलमानों ने भारत से सिंध में पलायन किया, उन्हें स्थानीय लोगों ने “मुहाजिर” कहा।
- इससे सिंधियों व मुहाजिरों में लंबे समय तक हिंसा होती रही।
20वीं सदी की शुरुआत तक सिंध की अर्थव्यवस्था में हिंदुओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
सिंध के शहरी क्षेत्र कराची और हैदराबाद में रहने वाले हिंदू कुशल व्यापारी और मध्य/उच्च वर्ग से संबंध रखते थे।
बंटवारे के बाद उनका पलायन सिंध की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ा। आज तुलना की जाए तो भारत में सिंधी समुदाय बड़े व्यापारी और समृद्ध है, जबकि पाकिस्तान के सिंधी अधिकतर आर्थिक रूप से कमजोर हैं।
सिंध कभी बंबई प्रांत का हिस्सा था
- 1936 तक सिंध गुजरात और महाराष्ट्र के साथ बंबई प्रांत में शामिल था।
- सिंध को अलग प्रदेश बनाने के लिए हिंदू और मुस्लिमों ने मिलकर आंदोलन किया था।
- 1913 में हिंदू नेता हरचंद्राई ने इसके लिए कांग्रेस से मांग की।
- 1938 में मुस्लिम लीग के सम्मेलन में पहली बार ‘पाकिस्तान’ की आधिकारिक मांग सिंध से उठी।
1942 में सिंध विधानसभा ने पाकिस्तान के पक्ष में प्रस्ताव पास कर दिया। मात्र 5 वर्ष बाद 1947 में बंटवारा हुआ, पर उस समय किसी को इस विनाश का अंदेशा नहीं था।
“सिंध सिर्फ भूमि नहीं, हमारी सभ्यता है”
राजनाथ सिंह ने कहा कि सिंध केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, इतिहास और पहचान का हिस्सा है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि “भविष्य में geopolitical स्थिति बदले तो सीमाओं का पुनर्निर्धारण संभव है।”






