
संवाद 24 नई दिल्ली। देश में बहुप्रतीक्षित परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया को लेकर सत्तापक्ष और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बीच सियासी तकरार अचानक तेज हो गई है। संसद के एक संभावित विशेष सत्र के आहूत होने की सुगबुगाहट के बीच केंद्र सरकार ने कांग्रेस पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया है कि सरकार की ओर से परिसीमन जैसे ऐतिहासिक और संवेदनशील विषय पर आम सहमति बनाने के लिए बार-बार प्रयास किए गए, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने इस पर चर्चा के लिए कोई समय या तारीख तय नहीं की। इस टकराव के सामने आने के बाद दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इस बात की हलचल तेज हो गई है कि क्या केंद्र सरकार परिसीमन से जुड़े अहम विधेयकों को संसद के पटल पर रखने की पूरी तैयारी में है।
खरगे के पत्र पर रिजिजू का तीखा पलटवार
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा था। खरगे ने इस पत्र में परिसीमन और अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक विषयों पर सर्वदलीय परामर्श बुलाने की मांग की थी। इसके साथ ही उन्होंने मानसून सत्र के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बावजूद संसद का सत्रावसान (Prorogation) करने में हो रही देरी पर सवाल खड़े किए थे।
प्रधानमंत्री को लिखे गए इसी पत्र का बिंदुवार जवाब देते हुए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया। रिजिजू ने कहा कि सरकार ने पिछले संसद सत्र के दौरान खुद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से संपर्क साधा था। उन्होंने दोनों शीर्ष नेताओं से मिलकर इस महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक चर्चा करने का आग्रह किया था। रिजिजू के मुताबिक, सरकार द्वारा बार-बार आग्रह किए जाने के बाद भी कांग्रेस ने विचार-विमर्श के लिए कोई तारीख या समय मुकर्रर नहीं किया। ऐसे में अब दोबारा सर्वदलीय परामर्श की मांग करना समझ से परे और केवल राजनीतिक दिखावा है।
अन्य दलों के साथ सरकार का संवाद, कांग्रेस को अलग-थलग करने की रणनीति
केंद्रीय मंत्री ने यह भी उजागर किया कि जब कांग्रेस की तरफ से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो सरकार हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठी। केंद्र ने अन्य क्षेत्रीय और विपक्षी राजनीतिक दलों के साथ सीधा संपर्क स्थापित किया। इस मसले पर समाजवादी पार्टी (SP), डीएमके (DMK), वाईएसआरसीपी (YSRCP), एनसीपी-शरद पवार गुट (NCP-SP), शिवसेना (UBT), एआईएमआईएम (AIMIM) और बीजेडी (BJD) समेत कई प्रमुख दलों के प्रतिनिधियों से गहन बातचीत की गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रिजिजू के इस बयान से साफ संकेत मिलता है कि सरकार ने परिसीमन जैसे बड़े नीतिगत मुद्दे पर अधिकांश विपक्षी दलों के साथ बैकचैनल और औपचारिक बातचीत की है। इससे यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि देश के हित से जुड़े इस महत्वपूर्ण मामले में कांग्रेस खुद को मुख्यधारा से अलग कर चुकी है।
सत्रावसान में देरी और विशेष सत्र के संकेत
कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने पत्र में मानसून सत्र के बाद सत्रावसान न किए जाने को लेकर संवैधानिक मर्यादाओं का हवाला दिया था। इस पर संसदीय कार्य मंत्री ने पुराने संसदीय उदाहरणों और परंपराओं का हवाला देते हुए स्थिति साफ की। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान में ऐसा कोई अनिवार्य नियम या तय समय-सीमा नहीं है जिसके तहत अनिश्चितकाल के लिए सदन स्थगित होने के तुरंत बाद सत्रावसान करना अनिवार्य हो। अतीत में भी ऐसी कई मिसालें रही हैं जब सत्र को जीवित रखा गया ताकि आवश्यकता पड़ने पर सांसदों को दोबारा बुलाया जा सके। जानकारों का कहना है कि सत्र का विधिवत सत्रावसान न करना इस बात का पुख्ता संकेत है कि सरकार किसी भी समय संसद की विशेष बैठक या विस्तारित सत्र बुला सकती है। यदि सरकार परिसीमन और उससे जुड़े संवैधानिक संशोधन विधेयकों को सदन में पेश करने का फैसला करती है, तो यह कदम देश की आने वाली चुनावी व्यवस्था, सीटों के पुनर्गठन और प्रतिनिधित्व के संतुलन की दृष्टि से मील का पत्थर साबित हो सकता है।
राष्ट्रीय राजनीति में अब क्या होगा आगे?
परिसीमन का विषय उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के संतुलन को लेकर पहले से ही बेहद संवेदनशील रहा है। कई क्षेत्रीय दलों की इस पर अपनी-अपनी चिंताएं और शर्तें हैं। हालांकि, सरकार द्वारा विभिन्न दलों को बातचीत की मेज पर लाने और कांग्रेस के रुख को उजागर करने के बाद यह साफ हो गया है कि संसद के भीतर एक बड़ा टकराव देखने को मिल सकता है।






