देवता खुद नहीं दे सकते वोट, तो क्या उन्हें उनके हाल पर छोड़ देंगे? मद्रास हाईकोर्ट की फटकार ने हिलाया प्रशासन
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संवाद 24 तमिलनाडु । भारतीय न्यायपालिका ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि कानून की नजर में न केवल जीवित व्यक्ति, बल्कि मंदिर की मूर्तियों और देवताओं के भी अपने अधिकार होते हैं। मद्रास उच्च न्यायालय ने एक मंदिर की भूमि अतिक्रमण से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट की यह टिप्पणी अब सोशल मीडिया और कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है: “चूंकि देवता खुद वोट नहीं दे सकते, इसलिए क्या प्रशासन उन्हें असहाय छोड़ देगा?”
क्या है पूरा मामला?
यह मामला तमिलनाडु के एक प्राचीन मंदिर की बेशकीमती जमीन पर अवैध कब्जे से जुड़ा है। लंबे समय से मंदिर की भूमि पर भू-माफियाओं और स्थानीय रसूखदारों ने कब्जा कर रखा था, लेकिन स्थानीय प्रशासन और हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त (HR&CE) विभाग इस पर मूकदर्शक बना हुआ था। जब यह मामला अदालत की चौखट पर पहुँचा, तो न्यायमूर्ति की खंडपीठ ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गहरा रोष व्यक्त किया। अदालत ने पाया कि अधिकारी उन लोगों की शिकायतों पर तो तुरंत कार्रवाई करते हैं जो वोट बैंक का हिस्सा हैं, लेकिन जब बात मंदिर की संपत्ति की रक्षा की आती है, तो फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं।
अदालत की सख्त टिप्पणियाँ: ‘देवता एक कानूनी व्यक्ति’
सुनवाई के दौरान मद्रास हाईकोर्ट ने बेहद गंभीर और चुटीले अंदाज में अधिकारियों को आईना दिखाया। कोर्ट ने कहा:
वोट बनाम कर्तव्य: अधिकारी केवल जीवित मतदाताओं के प्रति अपनी जवाबदेही समझते हैं क्योंकि वे चुनाव को प्रभावित करते हैं। देवता वोट नहीं दे सकते, इसलिए उनकी संपत्ति की लूट होने दी जा रही है।
संरक्षक की भूमिका: कानून के तहत ‘डॉक्ट्रिन ऑफ पेरेन्स पैट्रिए’ (Parens Patriae) के अनुसार, अदालत और सरकार मूर्तियों (जो कि कानूनी रूप से नाबालिग मानी जाती हैं) की संरक्षक होती हैं। यदि संरक्षक ही सो जाए, तो संपत्ति का विनाश निश्चित है।
अतिक्रमण पर प्रहार: कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि मंदिर की एक इंच जमीन भी निजी स्वार्थ के लिए उपयोग नहीं होनी चाहिए।
प्रशासनिक विफलता पर सवाल
अदालत ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि विभाग के पास व्यापक शक्तियाँ होने के बावजूद अतिक्रमण हटाने में सालों लग जाते हैं। अक्सर यह देखा गया है कि रसूखदार लोग राजनीतिक संरक्षण का लाभ उठाकर मंदिर की जमीनों पर दुकानें, घर या व्यावसायिक परिसर बना लेते हैं। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहते हैं, तो इसे न्यायालय की अवमानना माना जाएगा।
“मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं हैं, वे हमारी संस्कृति और विरासत के केंद्र हैं। उनकी संपत्तियों की रक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है, न कि कोई उपकार।” – न्यायालय का अंश
इस फैसले के दूरगामी परिणाम
मदरास हाईकोर्ट का यह रुख देश भर के उन हजारों मंदिरों के लिए एक उम्मीद की किरण है जिनकी जमीनें कानूनी लड़ाइयों और अवैध कब्जों में फंसी हुई हैं। यह फैसला एक नजीर पेश करता है कि:
अधिकारियों की जवाबदेही केवल जीवित लोगों तक सीमित नहीं है।
सार्वजनिक और धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता अनिवार्य है।
धार्मिक ट्रस्टों को अपनी संपत्ति का ब्योरा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त कदम उठाने होंगे।
निष्कर्ष
अदालत ने साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में भले ही ‘सिर गिने’ जाते हों, लेकिन न्याय के तराजू में बेजुबान देवताओं के अधिकार भी उतने ही वजनदार हैं। अब देखना यह होगा कि इस फटकार के बाद तमिलनाडु का प्रशासन कितनी तेजी से हरकत में आता है और मंदिर की पवित्र भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराता है।






