लोकतंत्र का ‘शुद्धिकरण’ या सियासी घमासान? तमिलनाडु में वोटर लिस्ट से 74 लाख नाम गायब, इलेक्शन कमीशन के फैसले से मचा हड़कंप
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संवाद 24 तमिलनाडु । भारतीय लोकतंत्र के महापर्व यानी चुनावों से पहले मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन तमिलनाडु में इस बार जो हुआ उसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) अभियान के बाद राज्य की मतदाता सूची से करीब 74 लाख नाम हटा दिए गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम कटने से न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है, बल्कि आम जनता के बीच भी अपने मताधिकार को लेकर चिंता की लहर दौड़ गई है।
क्या है पूरा मामला?
तमिलनाडु के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) अर्चना पटनायक द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस विशेष अभियान से पहले राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 6.41 करोड़ थी। हालांकि, गहन जांच और सत्यापन के बाद अब यह संख्या घटकर 5.67 करोड़ रह गई है। आयोग का तर्क है कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची को त्रुटिहीन और पारदर्शी बनाने के लिए अनिवार्य थी। हटाए गए नामों में वे लोग शामिल हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है, जो दूसरी जगह शिफ्ट हो गए हैं या जिनके नाम एक से अधिक बार दर्ज थे।
आंकड़ों का खेल और जिलों का हाल
रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा कटौती राज्य की राजधानी चेन्नई और उसके आसपास के शहरी इलाकों में देखी गई है। अकेले चेन्नई में ही लगभग 14 लाख नाम हटाए गए हैं। इसके अलावा कोयंबटूर, वेल्लोर और मदुरै जैसे बड़े जिलों में भी लाखों की संख्या में नाम काटे गए हैं। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि लगभग 27 लाख नाम ‘मृत’ घोषित होने के कारण हटाए गए, जबकि 66 लाख से अधिक लोग ऐसे थे जो अब अपने पंजीकृत पते पर नहीं रह रहे थे। करीब 3.4 लाख नाम डुप्लीकेट (दोहरी प्रविष्टि) पाए गए।
विपक्ष के आरोप और सत्ता पक्ष की दलील
इस भारी कटौती ने राज्य में एक बड़ा सियासी विवाद खड़ा कर दिया है। सत्तारूढ़ द्रमुक (DMK) और कांग्रेस गठबंधन ने इस प्रक्रिया के समय और तरीके पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि इतनी जल्दीबाजी में किए गए ‘शुद्धिकरण’ से वास्तविक मतदाता भी सूची से बाहर हो गए हैं। कई परिवारों ने शिकायत की है कि उनके जीवित सदस्यों को भी कागजों पर ‘मृत’ दिखाकर वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। वहीं दूसरी ओर, अन्नाद्रमुक (AIADMK) और भाजपा ने चुनाव आयोग के इस कदम का स्वागत किया है। विपक्षी नेता ई. पलानीस्वामी ने कहा कि यह कदम फर्जी मतदान रोकने के लिए जरूरी था। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले चुनावों में ‘घोस्ट वोटर्स’ (फर्जी मतदाता) की वजह से चुनावी नतीजे प्रभावित होते रहे हैं।
आम जनता पर क्या होगा असर?
74 लाख नामों की इस कटौती का सीधा असर आने वाले विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा। चुनाव आयोग ने हालांकि यह आश्वासन दिया है कि जिन लोगों के नाम गलती से कटे हैं, वे फॉर्म-6 भरकर फिर से अपना नाम जुड़वा सकते हैं। लेकिन जानकारों का मानना है कि ग्रामीण और कम पढ़े-लिखे तबकों के लिए दोबारा पंजीकरण की यह प्रक्रिया किसी चुनौती से कम नहीं होगी। चुनाव आयोग के लिए चुनौती अब यह है कि वह इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखे और यह सुनिश्चित करे कि एक भी पात्र नागरिक अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित न रहे। तमिलनाडु की यह घटना देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक नजीर बनेगी कि डिजिटल युग में मतदाता सूचियों का प्रबंधन कितना संवेदनशील और महत्वपूर्ण कार्य है।






