न्यायपालिका में AI को गति देने की तैयारी: चैटजीपीटी का हवाला देने वाले जज AI कमेटी में शामिल
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संवाद 24,नई दिल्ली। देश में न्यायिक प्रणाली के आधुनिकीकरण की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर गठित अपनी कमेटी का पुनर्गठन किया है। इस कमेटी में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के जज जस्टिस अनूप चितकारा को शामिल किया गया है, जो देश में पहले ऐसे न्यायाधीश हैं जिन्होंने 2023 में एक न्यायिक आदेश में चैटजीपीटी का संदर्भ लिया था।
यह कमेटी भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पहल पर बनाई गई है, जिसका उद्देश्य न्यायपालिका में तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देना और अदालतों की कार्यप्रणाली को अधिक आधुनिक, पारदर्शी और कुशल बनाना है। कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा करेंगे। इसके अन्य सदस्यों में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा, केरल हाई कोर्ट के जस्टिस राजा विजया राघवन वी. के. और कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस सूरज गोविंद राज शामिल हैं।
कमेटी अदालतों की कार्यप्रणाली को तेज करने के लिए ठोस सुझाव देगी। इसमें डिजिटल केस मैनेजमेंट, ऑटोमैटिक शेड्यूलिंग, दस्तावेजों के बेहतर प्रबंधन, डेटा आधारित वर्कफ्लो सिस्टम और मुकदमेबाजों के लिए प्रक्रियाओं को सरल बनाने जैसे विषय शामिल हैं। इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि तकनीक के माध्यम से न्याय वितरण प्रणाली अधिक प्रभावी बन सके।
दोबारा गठित इस कमेटी का मुख्य उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट से लेकर अधीनस्थ अदालतों तक AI टूल्स के विकास और उनके क्रियान्वयन को गति देना है। कमेटी AI आधारित न्यायिक सुधारों की रणनीतिक दिशा तय करेगी और सभी तकनीकी पहलुओं की समीक्षा करेगी, ताकि न्यायपालिका में सुरक्षित और जिम्मेदार तरीके से AI का उपयोग किया जा सके।
गौरतलब है कि जस्टिस अनूप चितकारा ने 2023 में एक जमानत आदेश में पहली बार चैटजीपीटी का संदर्भ लिया था। यह मामला क्रूरता से जुड़े हमले के आरोपों से संबंधित था। अंतरराष्ट्रीय न्यायशास्त्र की तुलना के उद्देश्य से उन्होंने चैटजीपीटी से यह जानने की कोशिश की थी कि ऐसी परिस्थितियों में अन्य देशों में जमानत के मानदंड कैसे तय किए जाते हैं। उन्होंने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि AI टूल का उपयोग केवल वैश्विक कानूनी दृष्टिकोण को समझने के लिए किया गया है, न कि न्यायिक निर्णय का आधार बनाने के लिए।
इस पहल को भारतीय न्यायपालिका में तकनीक आधारित सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।






