
संवाद 24 नई दिल्ली। भारत के उच्चतम न्यायालय ने धर्मांतरण और अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक मुद्दे पर अपनी व्यवस्था को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने उस ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार (Review) याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसी क्षण से उसका अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इस पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि पूर्व में दिए गए फैसले के रिकॉर्ड में ऐसी कोई त्रुटि या खामी नहीं है, जिसके आधार पर इस पर दोबारा विचार किया जाए। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता की ओर से मांगी गई मौखिक सुनवाई की अपील को भी खारिज कर दिया।
क्या था सुप्रीम कोर्ट का मूल फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले को बरकरार रखते हुए यह दूरगामी फैसला सुनाया था। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह सवाल था कि क्या कोई व्यक्ति ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाने के बाद भी अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा और उससे मिलने वाले कानूनी व संवैधानिक लाभ बरकरार रख सकता है।
अदालत के फैसले के प्रमुख बिंदु:
संविधान आदेश 1950 का पालन: संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के खंड 3 के तहत SC का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वालों तक ही सीमित है।
तत्काल प्रभाव से दर्जा खत्म: यदि कोई व्यक्ति ईसाई या किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करता है, तो जन्म चाहे किसी भी अनुसूचित जाति में हुआ हो, परिवर्तन के उसी क्षण से उसका SC दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है।
SC/ST एक्ट का संरक्षण नहीं: धर्मांतरण के बाद वह व्यक्ति SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में विशेष संरक्षण का दावा नहीं कर सकता।
आंध्र प्रदेश के पादरी आनंद का मामला
यह पूरा कानूनी विवाद आंध्र प्रदेश के चिंथाड़ा आनंद से जुड़े एक मामले के बाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। आनंद ने आरोप लगाया था कि कुछ लोगों ने उन्हें जातिसूचक गालियां दीं और उनके साथ मारपीट की, जिसके आधार पर SC/ST एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
हालांकि, जांच और सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि आनंद पिछले एक दशक से भी अधिक समय से ईसाई धर्म का पालन कर रहे थे और एक चर्च में पादरी के रूप में सेवाएं दे रहे थे। आरोपियों की दलील को स्वीकार करते हुए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एफआईआर को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि ईसाई धर्म अपना चुके व्यक्ति को कानूनन अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता, भले ही उसके पास पुराना SC प्रमाण पत्र ही क्यों न हो। सुप्रीम कोर्ट ने इसी आदेश पर अपनी अंतिम मुहर लगाई थी।
पुनः धर्म वापसी (Re-conversion) पर क्या है नियम?
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया था कि यदि कोई व्यक्ति धर्मांतरण के बाद वापस अपने मूल धर्म (हिंदू, सिख या बौद्ध) में लौटता है, तो वह अपना SC दर्जा दोबारा प्राप्त कर सकता है। हालांकि इसके लिए तीन शर्तें अनिवार्य हैं:
- व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि उसने मूल धर्म में औपचारिक वापसी की है।
- उसके मूल जाति समुदाय के सदस्यों ने उसे पुनः अपने समाज में स्वीकार कर लिया है।
- समुदाय में उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान पुनः स्थापित हो चुकी है।
देश भर में फैसले का बड़ा असर
पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट का यह रुख कानूनन अंतिम रूप ले चुका है। इस फैसले से देश भर में चल रहे धर्मांतरण, फर्जी जाति प्रमाण पत्र के जरिए आरक्षण और कानूनी लाभ उठाने की कोशिशों पर विराम लगेगा। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह आदेश स्पष्ट करता है कि कोई व्यक्ति एक साथ दो अलग-अलग धार्मिक पहचानों और उनके संवैधानिक लाभों का दावा नहीं कर सकता।






