हिंदू मूल से ‘क़ायदे-आज़म’ तक: मोहम्मद अली जिन्ना की वह कहानी, जिसे पाकिस्तान अक्सर नजरअंदाज़ करता है
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संवाद 24 चरण प्रीत सिंह। पाकिस्तान आज अपने संस्थापक और ‘क़ायदे-आज़म’ कहे जाने वाले Muhammad Ali Jinnah की 149वीं जयंती मना रहा है। सरकारी आयोजनों, भाषणों और श्रद्धांजलियों के बीच जिन्ना की ज़िंदगी का वह पक्ष फिर चर्चा में है, जिसे पाकिस्तान के आधिकारिक विमर्श में शायद ही कभी प्रमुखता मिलती हो।
धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमि
25 दिसंबर 1876 को ब्रिटिश भारत में जन्मे जिन्ना को आज इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान के संस्थापक के रूप में याद किया जाता है, लेकिन इतिहास बताता है कि उनका परिवार इस्लाम में अपेक्षाकृत नया था। कई ऐतिहासिक स्रोतों और शोध लेखों के अनुसार, जिन्ना के जन्म के समय उनके पिता हिंदू थे और बाद में उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाया।
गुजरात से कराची तक की यात्रा
जिन्ना के पिता पुंजालाल ठक्कर और दादा प्रेमजीभाई ठक्कर गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र से जुड़े थे। दादा प्रेमजीभाई ठक्कर लोहाना हिंदू समुदाय से आते थे और उन्होंने वेरावल में मछली के व्यापार की शुरुआत की। उस दौर में इस पेशे को सामाजिक रूप से हेय माना जाता था, जिसके कारण उन्हें अपने ही समुदाय के विरोध और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। इस सामाजिक दबाव का असर परिवार की पूरी दिशा पर पड़ा। विरोध से तंग आकर परिवार ने गुजरात छोड़ दिया और कराची की ओर रुख किया, जो उस समय एक उभरता हुआ बंदरगाह शहर था।
धर्म परिवर्तन और नाम परिवर्तन
इतिहासकारों के अनुसार, कराची में बसने के बाद पुंजालाल ठक्कर ने शिया इस्लाम के आगा खानी संप्रदाय को अपनाया। धर्म परिवर्तन के बाद, राजकोट की आगा खानी मस्जिद में उनके बच्चों, जिसमें मोहम्मद अली जिन्ना भी शामिल थे के नाम बदले गए। यह भी उल्लेखनीय है कि जिन्ना की प्रारंभिक शैक्षणिक दस्तावेज़ों में उनका नाम ‘एम. ज़ेड. ठक्कर’ दर्ज मिलता है। दसवीं कक्षा के बाद उनके जीवन में धार्मिक पहचान का यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखता है।
पश्चिमी सोच वाले वकील
कराची से प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद जिन्ना कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए। वहां से लौटकर उन्होंने भारत के सबसे प्रभावशाली वकीलों में अपनी पहचान बनाई। शुरुआती राजनीतिक जीवन में जिन्ना Indian National Congress से जुड़े रहे और उन्हें हिंदू-मुस्लिम एकता का मजबूत समर्थक माना जाता था। उनका पहनावा, रहन-सहन और सोच पूरी तरह पश्चिमी थी। 1930 के दशक तक वे न तो धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग करते थे और न ही मुस्लिम राजनीति के कट्टर चेहरे के रूप में पहचाने जाते थे।
मुस्लिम लीग से पाकिस्तान तक
1937 के बाद जिन्ना के राजनीतिक रुख में बड़ा बदलाव आया। उन्होंने All-India Muslim League को नया स्वरूप दिया और धीरे-धीरे मुस्लिम पहचान को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। इसी दौर में उन्होंने शेरवानी और टोपी पहननी शुरू की, जो बाद में उनकी पहचान बन गई। यही वह समय था, जब उन्होंने धर्म के आधार पर अलग राष्ट्र की मांग को मजबूती से आगे बढ़ाया। अंततः 1947 में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया।
विरोधाभासों से भरा व्यक्तित्व
यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जिन्ना लंबे समय तक मुस्लिम दक्षिणपंथी नेताओं में लोकप्रिय नहीं थे। कई मौलवियों और कट्टरपंथी समूहों ने उन्हें “पर्याप्त इस्लामी” न मानते हुए आलोचना की। बावजूद इसके, राजनीतिक परिस्थितियों और ब्रिटिश रणनीति के बीच जिन्ना पाकिस्तान आंदोलन के निर्विवाद नेता बनकर उभरे।
इतिहास का वह अध्याय, जो असहज करता है
आज जब पाकिस्तान जिन्ना की जयंती मना रहा है, तब उनकी जीवन-कथा का यह पक्ष यह सवाल भी उठाता है कि क्या इतिहास को केवल सुविधा के अनुसार याद किया जाना चाहिए? एक ऐसे नेता, जिनकी जड़ें हिंदू समाज में थीं, जिनकी सोच पश्चिमी थी और जो जीवन के बड़े हिस्से में धर्मनिरपेक्ष राजनीति करते रहे, उन्हीं के नाम पर बना पाकिस्तान आज धार्मिक पहचान की सख्त परिभाषाओं में खुद को बांधे हुए है।
मोहम्मद अली जिन्ना की कहानी सिर्फ पाकिस्तान की स्थापना की कहानी नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया के सामाजिक दबावों, धार्मिक पहचान और राजनीति के जटिल रिश्तों की भी गवाही देती है, एक ऐसी कहानी, जिसे पूरा पढ़ना और समझना आज भी जरूरी है।






