बांग्लादेश में हिंदू होना बना मौत की सज़ा : ईशनिंदा के नाम पर मजदूर की भीड़ ने की नृशंस हत्या, शव जलाकर दरिंदगी की हदें पार
Share your love

संवाद 24 विशेष रिपोर्ट। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों की एक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। ईशनिंदा के आरोप की आड़ में एक हिंदू मजदूर को भीड़ ने बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला और फिर उसके शव को पेड़ से बांधकर जला दिया। यह घटना न सिर्फ कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि मानवाधिकारों की खुलेआम हत्या का प्रतीक बन गई है।
मृतक की पहचान दीपू चंद्र दास के रूप में हुई है, जो एक गारमेंट फैक्ट्री में मजदूरी कर जीवन यापन करता था। वह बांग्लादेश के मैमनसिंह जिले के भालुका उपजिला क्षेत्र में किराए के मकान में रहता था। आरोप है कि कुछ लोगों ने उस पर पैगंबर मुहम्मद के संबंध में आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया, जिसके बाद गुरुवार रात करीब 9 बजे उग्र भीड़ ने उसे घेर लिया।
प्रत्यक्षदर्शियों और पुलिस सूत्रों के अनुसार, भीड़ ने पहले दीपू चंद्र दास को बेरहमी से पीटा, जिससे मौके पर ही उसकी मौत हो गई। इसके बाद भीड़ यहीं नहीं रुकी—शव को एक पेड़ से बांधकर आग के हवाले कर दिया गया। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और किसी तरह हालात को काबू में कर शव को अपने कब्जे में लिया।
शव को पोस्टमार्टम के लिए मैमनसिंह मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेज दिया गया है। हालांकि, हैरानी की बात यह है कि घटना के कई घंटे बाद तक भी औपचारिक मामला दर्ज नहीं किया गया। पुलिस का कहना है कि पीड़ित के परिवार का पता लगाने की कोशिश की जा रही है और शिकायत मिलने के बाद आगे की कार्रवाई होगी।
यह जघन्य हत्या ऐसे समय पर हुई है जब बांग्लादेश पहले से ही हिंसा की आग में झुलस रहा है। कट्टरपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद देश के कई हिस्सों, खासकर ढाका में, उग्र प्रदर्शन, तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं सामने आई हैं। मीडिया संस्थानों पर हमले हुए, विदेशी राजनयिक ठिकानों के बाहर पत्थरबाजी की गई और भारत विरोधी नारे भी लगाए गए।
इस घटना को लेकर भारत में भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। राजनीतिक दलों ने बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा पर सवाल उठाते हुए अंतरिम सरकार की भूमिका पर चिंता जताई है। सोशल मीडिया पर भी इस हत्या को लेकर आक्रोश है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की मांग की जा रही है।
सम्वाद24 यह सवाल उठाता है—
क्या ईशनिंदा के आरोप अब कानून से ऊपर हो गए हैं?
क्या अल्पसंख्यकों की जान की कोई कीमत नहीं रह गई है?
जब तक दोषियों को सख्त सजा नहीं मिलती और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, तब तक ऐसे अपराध इंसानियत को यूं ही शर्मसार करते रहेंगे।






