ट्रंप की ‘ऐतिहासिक’ शांति डील पर संकट: एम23 विद्रोहियों ने उवीरा पर कब्जा किया, ग्रेट लेक्स क्षेत्र में युद्ध का खतरा
Share your love

संवाद 24, अफ्रीका के ग्रेट लेक्स क्षेत्र में शांति की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी में वॉशिंगटन में हस्ताक्षरित डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) और रवांडा के बीच शांति समझौता, महज़ एक हफ्ते में ही गंभीर संकट में फंस गया है। एम23 विद्रोही समूह ने दक्षिण किवू प्रांत के रणनीतिक शहर उवीरा पर कब्जा करने का दावा किया है, जिससे पूरे क्षेत्र में युद्ध भड़कने की आशंका गहराती जा रही है।
अमेरिका ने सीधे तौर पर रवांडा पर विद्रोहियों का समर्थन करने का आरोप लगाया है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत ने कहा कि रवांडा क्षेत्र को शांति की ओर नहीं, बल्कि युद्ध की ओर धकेल रहा है। वहीं रवांडा ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि संघर्ष विराम के उल्लंघन के लिए उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
उवीरा क्यों है अहम?
उवीरा, बुजुंबुरा (बुरुंडी की राजधानी) से महज़ 27 किलोमीटर दूर स्थित है और यह दक्षिण किवू में कांगो सरकार का आख़िरी बड़ा सैन्य और प्रशासनिक गढ़ माना जाता था। यहां करीब 10 हजार बुरुंडी सैनिक कांगो सेना के समर्थन में तैनात थे। विशेषज्ञों के अनुसार, उवीरा के हाथ से निकलने से बुरुंडी की आपूर्ति लाइन कट गई है और उसकी सैन्य मौजूदगी कमजोर पड़ी है।
शांति वार्ता को चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि एम23 ने यह हमला वार्ता में दबाव बढ़ाने के लिए किया है। कनाडा स्थित अफ्रीका विशेषज्ञ प्रो. जेसन स्टर्न्स के मुताबिक, “यह हमला चल रही सभी शांति कोशिशों को चुनौती देता है और अमेरिका को भी असहज स्थिति में डालता है।”
गौरतलब है कि एम23 शांति समझौते का पक्षकार नहीं था। वह कतर की मध्यस्थता में चल रही एक अलग शांति प्रक्रिया का हिस्सा है, जो अब इस हमले के बाद ठप होती दिख रही है।
मानवीय संकट गहराया
संघर्ष तेज़ होने से करीब 50 हजार लोग बुरुंडी में शरण लेने को मजबूर हो चुके हैं। राहत एजेंसियों के मुताबिक, उवीरा के गिरने के बाद विस्थापन और तेज़ हो सकता है। शरणार्थी शिविरों में भोजन, ईंधन और दवाइयों की कमी की खबरें सामने आ रही हैं।
ड्रोन और अनुशासित सेना का असर
विशेषज्ञों का कहना है कि एम23 की सफलता के पीछे रवांडा की अनुशासित सेना और आधुनिक ड्रोन तकनीक की बड़ी भूमिका रही है। हालांकि रवांडा ने अपने सैनिकों की मौजूदगी से इनकार किया है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के पूर्व आकलनों में विद्रोहियों पर रवांडा के “व्यावहारिक नियंत्रण” की बात कही जा चुकी है।
आगे क्या?
शांति समझौते का भविष्य अब अनिश्चित नजर आ रहा है। अमेरिका, यूरोपीय संघ और कई यूरोपीय देशों ने संयुक्त बयान जारी कर एम23 और रवांडा रक्षा बल से तुरंत सैन्य कार्रवाई रोकने और कांगो से पीछे हटने की मांग की है।
कांगो के राष्ट्रपति फेलिक्स त्शिसेकेदी पर घरेलू दबाव बढ़ता जा रहा है। वहीं शांति की बहाली अब अमेरिका, कतर और अन्य अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करती दिख रही है।
संवाद 24, विश्लेषण
उवीरा पर कब्जे ने यह साफ कर दिया है कि केवल कूटनीतिक हस्ताक्षर ज़मीनी हकीकत नहीं बदलते। जब तक क्षेत्रीय शक्तियों के हित, विद्रोही समूहों की भूमिका और संसाधनों की राजनीति पर ठोस सहमति नहीं बनती, तब तक कांगो की शांति एक अधूरा सपना बनी रहेगी।






