वेनेजुएला में तख्तापलट के बाद अब क्यूबा की बारी? व्हाइट हाउस की सीधी चेतावनी, जल्द गिर जाएगी कम्युनिस्ट सरकार
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संवाद 24 नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है। वेनेजुएला में ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ के जरिए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने और वहां की सत्ता संरचना को हिला देने के बाद अब ट्रंप प्रशासन का अगला निशाना पड़ोसी देश क्यूबा बन गया है। व्हाइट हाउस से जारी हालिया बयानों और सोशल मीडिया पर ट्रंप की सक्रियता ने साफ कर दिया है कि लैटिन अमेरिका में दशकों से जमी कम्युनिस्ट सरकारों के दिन अब गिनती के रह गए हैं।
वेनेजुएला के बाद क्यूबा पर कसता शिकंजा
हाल ही में अमेरिकी विशेष बलों ने वेनेजुएला की राजधानी काराकास में एक साहसिक सैन्य कार्रवाई करते हुए निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोर्स को हिरासत में लिया था। इस घटना के ठीक बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने क्यूबा को सीधी चेतावनी देते हुए कहा कि वह “समय रहते समझौता कर ले, वरना बहुत देर हो जाएगी।” ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर स्पष्ट संदेश दिया— “क्यूबा अब तक वेनेजुएला से मिलने वाले मुफ्त तेल और पैसे पर जिंदा था, लेकिन अब यह सब पूरी तरह बंद होने जा रहा है। शून्य!”दरअसल, क्यूबा अपनी अर्थव्यवस्था और ऊर्जा जरूरतों के लिए लंबे समय से वेनेजुएला पर निर्भर रहा है। जानकारों का मानना है कि मादुरो के पतन के साथ ही क्यूबा की लाइफलाइन कट गई है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो, जो खुद क्यूबाई मूल के हैं, इस रणनीति के पीछे के मुख्य चेहरा माने जा रहे हैं।
‘जल्द गिरेगी क्यूबा की सरकार’: ट्रंप का दावा
ट्रंप ने हाल ही में एयरफोर्स वन पर पत्रकारों से बातचीत के दौरान संकेत दिया कि क्यूबा का मौजूदा शासन बेहद कमजोर स्थिति में है। उन्होंने कहा, “क्यूबा ने वर्षों तक वेनेजुएला के तानाशाहों को सुरक्षा सेवाएं प्रदान कीं और बदले में भारी मात्रा में तेल और पैसा वसूला। लेकिन अब वे लोग (वेनेजुएला में तैनात क्यूबाई सुरक्षाकर्मी) जा चुके हैं। क्यूबा की अर्थव्यवस्था ढहने के कगार पर है और वहां की जनता बदलाव चाहती है।”अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि वेनेजुएला से तेल की आपूर्ति रुकने से क्यूबा में ब्लैकआउट, परिवहन संकट और खाद्य सामग्री की भारी किल्लत पैदा होगी, जिससे वहां की जनता सड़कों पर उतरने को मजबूर हो जाएगी। ट्रंप के इस रुख को ‘न्यू मोनरो डॉक्ट्रिन’ या ‘ट्रंप कोरोलरी’ के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य पश्चिमी गोलार्ध से अमेरिकी विरोधी ताकतों का सफाया करना है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और चिंताएं
जहां एक ओर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू जैसे सहयोगियों ने इसे “शानदार ऑपरेशन” बताकर ट्रंप की तारीफ की है, वहीं संयुक्त राष्ट्र और कई लातिन अमेरिकी देशों ने इसे संप्रभुता का उल्लंघन बताया है। कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने भी ट्रंप के तीखे तेवरों पर नाराजगी जताते हुए इसे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करने वाला कदम बताया है। दूसरी ओर, क्यूबा की सरकार ने अमेरिका पर “आर्थिक आतंकवाद” का आरोप लगाया है। हवाना के अधिकारियों का कहना है कि वे किसी भी दबाव के आगे झुकेंगे नहीं। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि तेल की कमी ने द्वीप देश को अंधेरे में धकेलना शुरू कर दिया है।
क्या होगा अगला कदम?
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप का मकसद केवल प्रतिबंध लगाना नहीं बल्कि क्यूबा में “सत्ता परिवर्तन” (Regime Change) लाना है। व्हाइट हाउस के सूत्रों का कहना है कि प्रशासन क्यूबा सरकार के भीतर उन लोगों की तलाश कर रहा है जो एक नए सौदे के लिए बातचीत कर सकें। यदि क्यूबा ‘डील’ के लिए तैयार नहीं होता है, तो अमेरिका सीधे सैन्य हस्तक्षेप या और कड़े समुद्री नाकेबंदी जैसे विकल्पों पर विचार कर सकता है।






