अमेरिका में भारतीयों को बड़ा झटका, टेक्सास गवर्नर ने H-1B वीजा पर लगाई रोक, एमेजॉन, गूगल और TCS जैसी कंपनियों में मचेगी खलबली?
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संवाद 24 नई दिल्ली। अमेरिका में नौकरी का सपना देखने वाले भारतीयों और वहां कार्यरत आईटी प्रोफेशनल्स के लिए एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने एक बड़ा और कड़ा कदम उठाते हुए राज्य की सभी सरकारी एजेंसियों और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में नए H-1B वीजा आवेदनों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। इस फैसले ने न केवल अमेरिका में रह रहे प्रवासी भारतीयों, बल्कि एमेजॉन, गूगल और टीसीएस (TCS) जैसी दिग्गज कंपनियों के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
क्या है गवर्नर का आदेश?
गवर्नर ग्रेग एबॉट ने यह निर्देश जारी किया है कि टेक्सास के टैक्सपेयर्स के पैसे से चलने वाले संस्थानों और सरकारी विभागों में अब विदेशी कामगारों की जगह स्थानीय अमेरिकियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इस आदेश के तहत, 31 मई 2027 तक किसी भी नए H-1B वीजा के लिए आवेदन नहीं किया जा सकेगा। गवर्नर का तर्क है कि H-1B वीजा कार्यक्रम का दुरुपयोग किया जा रहा है, जिससे स्थानीय युवाओं के रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि “सरकारी पदों पर पहला हक टेक्सास के नागरिकों का होना चाहिए।”
TCS, एमेजॉन और गूगल पर इसका असर
भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के लिए यह खबर काफी महत्वपूर्ण है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, TCS अमेरिका में H-1B वीजा का लाभ उठाने वाली शीर्ष कंपनियों में से एक रही है। हालांकि, TCS ने पहले ही अपनी रणनीति बदलते हुए अमेरिका में स्थानीय स्तर पर भर्ती बढ़ाने और H-1B पर निर्भरता कम करने के संकेत दिए थे। लेकिन टेक्सास जैसे बड़े राज्य में इस तरह की पाबंदी अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन सकती है। वहीं, एमेजॉन और गूगल जैसी टेक दिग्गज कंपनियां, जिनके बड़े ऑपरेशंस टेक्सास में हैं, उन्हें भी अपनी भविष्य की नियुक्तियों के लिए नए सिरे से सोचना होगा। हालांकि गवर्नर का वर्तमान आदेश केवल सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों पर लागू है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह निजी क्षेत्र के लिए भी एक कड़ा संदेश है। ट्रंप प्रशासन द्वारा H-1B आवेदन पर $100,000 (करीब 84 लाख रुपये) की भारी-भरकम फीस लगाने के बाद अब राज्यों के स्तर पर ऐसी पाबंदियां विदेशी टैलेंट के लिए अमेरिका के दरवाजे बंद करने जैसा है।
31 मई 2027 तक का ‘डेड लॉक’
गवर्नर का यह प्रतिबंध अगले विधायी सत्र के अंत यानी मई 2027 तक जारी रहेगा। इस दौरान यदि किसी विश्वविद्यालय या एजेंसी को बहुत जरूरी होने पर किसी विदेशी विशेषज्ञ को नियुक्त करना है, तो उन्हें ‘टेक्सास वर्कफोर्स कमीशन’ से लिखित अनुमति लेनी होगी। यह अनुमति तभी मिलेगी जब संस्थान यह साबित कर पाएगा कि उस विशेष पद के लिए कोई भी योग्य स्थानीय अमेरिकी उपलब्ध नहीं है।
भारतीयों की चिंता क्यों बढ़ी?
अमेरिका में H-1B वीजा पाने वालों में सबसे बड़ी संख्या भारतीयों की होती है। हजारों छात्र हर साल टेक्सास की यूनिवर्सिटीज में पढ़ने जाते हैं और वहीं रिसर्च या शिक्षण कार्य के लिए H-1B वीजा का सहारा लेते हैं। अब इन छात्रों के लिए वहां नौकरी पाना लगभग असंभव हो जाएगा। इसके अलावा, जो लोग पहले से वहां काम कर रहे हैं, उनके डेटा की भी जांच के आदेश दिए गए हैं। गवर्नर ने कंपनियों और संस्थानों से रिपोर्ट मांगी है कि वे 2025 में कितने वीजा प्रायोजित कर चुके हैं और उन कर्मचारियों की राष्ट्रीयता क्या है।
बदल रहा है अमेरिका का मिजाज
टेक्सास का यह फैसला डोनल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति की अगली कड़ी माना जा रहा है। फ्लोरिडा जैसे अन्य राज्य भी इसी तरह के कदम उठाने की तैयारी में हैं। संवाद 24 के पाठकों को यह समझना होगा कि अब वैश्विक नौकरियों का बाजार बदल रहा है। अब केवल डिग्री नहीं, बल्कि ‘अति-विशिष्ट कौशल’ (Unique Skill Set) ही विदेशी धरती पर नौकरी की गारंटी बन पाएगा। भारत की आईटी कंपनियों को अब अपनी पूरी कार्यप्रणाली को ‘लोकल हायरिंग’ और ‘एआई (AI)’ आधारित सेवाओं की ओर मोड़ना होगा।






