आर्कटिक की बर्फ पर सियासी संग्राम: पुतिन ने ट्रंप के ‘ग्रीनलैंड प्लान’ पर क्यों कहा- यह हमारा सिरदर्द नहीं?
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संवाद 24 नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उस समय खलबली मच गई जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सबसे चर्चित और विवादास्पद ‘ग्रीनलैंड डील’ पर अपनी चुप्पी तोड़ी। मॉस्को में आयोजित एक हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, जब दुनिया भर के पत्रकारों की नजरें यूक्रेन और वैश्विक ऊर्जा संकट पर थीं, तभी ग्रीनलैंड का मुद्दा अचानक सामने आया। पुतिन के इस बयान ने साफ कर दिया कि पर्दे के पीछे महाशक्तियों के बीच कुछ बड़ा पक रहा है।
घटनाक्रम: पुतिन ने कब और किस माहौल में दिया यह बयान?
यह पूरा मामला तब गरमाया जब मॉस्को में एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर राष्ट्रपति पुतिन मीडिया से मुखातिब थे। एक विदेशी पत्रकार ने सवाल दागा कि क्या रूस को लगता है कि ट्रंप का ग्रीनलैंड को खरीदने का विचार आर्कटिक में रूस के प्रभुत्व के लिए खतरा है? पुतिन ने जवाब दिया, “यह हमारा काम नहीं है (It is not our business)।” उन्होंने साफ किया कि रूस दूसरों के द्विपक्षीय व्यापारिक सौदों में टांग नहीं अड़ाता। पुतिन का यह बयान उस समय आया है जब डोनाल्ड ट्रंप दोबारा सत्ता में आने के बाद अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत रणनीतिक ठिकानों को मजबूत करने में जुटे हैं।
ट्रंप की जिद: कैसे शुरू हुई इस ‘महा-डील’ की कहानी?
ग्रीनलैंड को खरीदने का विचार पहली बार 2019 में ट्रंप के पिछले कार्यकाल के दौरान चर्चा में आया था। उस समय ट्रंप ने इसे “एक बड़ी रियल एस्टेट डील” बताया था। हालांकि, तब डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने इसे ‘हास्यास्पद’ कहकर खारिज कर दिया था। लेकिन ट्रंप हार मानने वालों में से नहीं हैं। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप की टीम ने दोबारा सत्ता संभालते ही डेनमार्क के साथ गुप्त वार्ता के संकेत दिए हैं। वे ग्रीनलैंड को न केवल उसके प्राकृतिक संसाधनों के लिए, बल्कि वहां मौजूद ‘थुले एयर बेस’ (Thule Air Base) के विस्तार के लिए भी जरूरी मानते हैं।
रणनीतिक बिसात: पुतिन की चुप्पी के पीछे छिपा असली ‘खेल’
भले ही पुतिन ने सार्वजनिक रूप से कहा हो कि यह उनका काम नहीं है, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां करती है। रूस ने पिछले दो सालों में आर्कटिक में अपनी सैन्य ताकत को दोगुना कर दिया है। रूस ने वहां नए रडार सिस्टम और ‘एस-400’ मिसाइल डिफेंस सिस्टम तैनात किए हैं। जानकारों का मानना है कि पुतिन का यह कहना कि “हमें फर्क नहीं पड़ता”, दरअसल अमेरिका को यह दिखाने की कोशिश है कि रूस अपनी सुरक्षा को लेकर इतना आश्वस्त है कि उसे ग्रीनलैंड में अमेरिकी हलचल से कोई डर नहीं लगता।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड का रुख: स्वाभिमान बनाम समझौता
कैसे होगा यह मुमकिन? ग्रीनलैंड आधिकारिक तौर पर डेनमार्क का हिस्सा है, लेकिन उसके पास अपनी आंतरिक स्वायत्तता है। वहां के स्थानीय लोग और सरकार किसी भी तरह की ‘बिक्री’ के सख्त खिलाफ हैं। हालांकि, अमेरिका का तर्क है कि वह ग्रीनलैंड की सुरक्षा और वहां के विकास के लिए अरबों डॉलर खर्च करने को तैयार है। पुतिन जानते हैं कि अगर डेनमार्क और अमेरिका के बीच इस मुद्दे पर ठनती है, तो इसका सीधा फायदा रूस को मिलेगा क्योंकि पश्चिमी देशों के बीच दरार पैदा होगी।
आर्कटिक का भविष्य: क्या पुतिन का ‘मौन’ लंबे समय तक रहेगा?
अंततः सवाल यह उठता है कि क्या वाकई पुतिन इस मामले से दूर रहेंगे? कूटनीति के जानकारों का कहना है कि पुतिन का “मौन” केवल तब तक है जब तक अमेरिका कोई बड़ा सैन्य कदम नहीं उठाता। यदि ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड में परमाणु हथियारों की तैनाती की कोशिश करता है, तो पुतिन का अगला बयान “यह हमारा काम नहीं है” से बदलकर “यह सीधे तौर पर रूस को चुनौती है” में बदल सकता है। फिलहाल, पूरी दुनिया इस बात पर नजर गड़ाए हुए है कि ट्रंप की व्यापारिक सोच और पुतिन की रणनीतिक चुप्पी आने वाले दिनों में क्या रंग लाती है।






