“भारत-तालिबान संबंधों पर पाक सेना का अजीब दावा: बयान गंभीर था, लेकिन दुनिया ने बना दिया मज़ाक”

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संवाद 24 दिल्ली |पाकिस्तान की सेना एक बार फिर अपने ही बयान के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है। इस बार वजह कोई सैन्य कार्रवाई या कूटनीतिक घटनाक्रम नहीं, बल्कि सेना के शीर्ष प्रवक्ता द्वारा दिया गया एक ऐसा बयान है, जिसे सुनकर सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक विश्लेषकों तक ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
पाक सेना के मीडिया विंग के प्रमुख ने हाल ही में एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान भारत और अफगानिस्तान के तालिबान शासन के बीच कथित “सांठ-गांठ” का आरोप लगाया। उनका दावा था कि भारत परोक्ष रूप से ऐसे तत्वों का समर्थन कर रहा है, जो पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए खतरा बने हुए हैं। हालांकि यह आरोप नया नहीं था, लेकिन जिस अंदाज़ में इसे प्रस्तुत किया गया, उसने पूरे बयान को विवाद और उपहास का विषय बना दिया।

गंभीर आरोप, लेकिन भाषा ने बिगाड़ दिया मामला
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान प्रवक्ता ने कहा कि भारत अपने विरोधियों को एक मंच पर लाकर पाकिस्तान को अस्थिर करना चाहता है। इसी क्रम में उन्होंने व्यंग्यात्मक और असामान्य शब्दों का प्रयोग किया, जो किसी आधिकारिक सैन्य वक्तव्य से मेल नहीं खाता। यही कारण रहा कि बयान की गंभीरता पीछे छूट गई और उसकी शैली चर्चा के केंद्र में आ गई।

सोशल मीडिया पर बयान बना मीम
बयान सामने आते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कई यूज़र्स ने इसे “ड्रामा से भरा भाषण” बताया, तो कुछ ने कहा कि पाकिस्तान सेना अब रणनीति से ज़्यादा संवाद शैली के कारण सुर्ख़ियों में है। मीम्स, व्यंग्यात्मक वीडियो और टिप्पणियों के ज़रिये इस बयान का मज़ाक उड़ाया गया।

पाकिस्तान के भीतर भी उठे सवाल
दिलचस्प बात यह रही कि सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय यूज़र्स ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान के अंदर से भी आलोचनात्मक आवाज़ें उठीं। कई पत्रकारों और विश्लेषकों ने सवाल किया कि क्या इस तरह के बयान देश की सुरक्षा नीति को मज़बूत करते हैं या उसे हास्यास्पद बना देते हैं। कुछ का मानना है कि आंतरिक राजनीतिक दबाव और सुरक्षा चुनौतियों से ध्यान हटाने के लिए ऐसे बयान दिए जा रहे हैं।
भारत-तालिबान संबंधों की वास्तविकता विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का अफगानिस्तान को लेकर रुख़ हमेशा कूटनीतिक और मानवीय रहा है। ऐसे में भारत और तालिबान के बीच किसी गुप्त गठबंधन का दावा बिना ठोस प्रमाण के किया जाना, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को प्रभावित करने में असफल रहता है। यही कारण है कि इस बयान को गंभीर चेतावनी की बजाय प्रचारात्मक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी देश की छवि सिर्फ़ उसकी सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि उसकी संवाद शैली और विश्वसनीयता से भी तय होती है। विश्लेषकों के अनुसार बार-बार बिना ठोस सबूतों के आरोप लगाने से पाकिस्तान की स्थिति कमज़ोर होती है और उसका प्रभाव सीमित रह जाता है।

डिजिटल युग में हर शब्द की कीमत
आज के डिजिटल दौर में कोई भी बयान सिर्फ़ प्रेस हॉल तक सीमित नहीं रहता। वह सेकंडों में दुनिया भर में फैल जाता है। ऐसे में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे भाषा और प्रस्तुति में संतुलन रखें। पाकिस्तान सेना का यह बयान इसी संतुलन की कमी का उदाहरण बनकर रह गया।

निष्कर्ष
भारत-तालिबान संबंधों पर लगाया गया आरोप भले ही पाकिस्तान की रणनीतिक सोच का हिस्सा हो, लेकिन जिस तरह से उसे पेश किया गया, उसने पूरे मुद्दे की गंभीरता को कम कर दिया। नतीजतन, यह बयान कूटनीतिक दबाव बनाने की बजाय सोशल मीडिया पर मज़ाक का कारण बन गया।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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