भारत का संतुलित संदेश: वेनेजुएला संकट में संवाद, शांति और नागरिक सुरक्षा पर ज़ोर
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संवाद 24 दिल्ली। दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में गहराते राजनीतिक संकट ने एक बार फिर वैश्विक समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा है। सत्ता संघर्ष, अंतरराष्ट्रीय दबाव और आंतरिक अस्थिरता के बीच आम नागरिकों का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। ऐसे समय में भारत ने बेहद संतुलित, परिपक्व और जिम्मेदार रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी संकट का स्थायी समाधान टकराव या बल प्रयोग से नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से ही निकल सकता है। भारत के इस दृष्टिकोण को विदेश मंत्री एस. जयशंकर के हालिया बयान से मजबूती मिली है, जिसमें उन्होंने वेनेजुएला की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने और बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की। भारत का यह रुख केवल कूटनीतिक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उसकी उस विदेश नीति को दर्शाता है जिसमें मानवीय सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कानून को प्राथमिकता दी जाती है।
वेनेजुएला संकट: कैसे बिगड़े हालात
वेनेजुएला बीते कई वर्षों से राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और सामाजिक तनाव से जूझ रहा है। सत्ता को लेकर मतभेद, विपक्ष और सरकार के बीच टकराव, तथा बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप ने हालात को और जटिल बना दिया है। देश की अर्थव्यवस्था पहले ही मुद्रास्फीति, बेरोज़गारी और आवश्यक वस्तुओं की कमी से प्रभावित रही है, ऐसे में राजनीतिक अनिश्चितता ने आम जनता की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी हैं। हालिया घटनाक्रमों ने संकट को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। सत्ता संरचना में बदलाव, अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ और संभावित प्रतिबंधों की चर्चाओं ने यह संकेत दिया है कि यदि हालात जल्द नहीं संभले, तो इसका असर पूरे लैटिन अमेरिका की स्थिरता पर पड़ सकता है।
भारत की चिंता: राजनीति नहीं, इंसान केंद्र में
भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में यह साफ किया है कि उसकी सबसे बड़ी चिंता वेनेजुएला के आम नागरिक हैं। भारत का मानना है कि किसी भी राजनीतिक या कूटनीतिक संघर्ष की सबसे बड़ी कीमत आम लोग चुकाते हैं—चाहे वह भोजन की कमी हो, स्वास्थ्य सेवाओं पर असर हो या सुरक्षा का संकट। भारत का यह दृष्टिकोण उसकी पारंपरिक विदेश नीति से मेल खाता है, जहाँ वह आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से बचते हुए मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देता रहा है। जयशंकर के बयान में यह संदेश स्पष्ट था कि भारत किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय समाधान-केंद्रित भूमिका निभाना चाहता है।
संवाद क्यों ज़रूरी है
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, वेनेजुएला जैसे जटिल संकट में संवाद ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जो सभी पक्षों को स्वीकार्य समाधान तक पहुँचा सकता है। सैन्य दबाव, आर्थिक प्रतिबंध या बाहरी हस्तक्षेप अल्पकालिक प्रभाव तो डाल सकते हैं, लेकिन वे अक्सर स्थिति को और विस्फोटक बना देते हैं।
भारत का मानना है कि:
संवाद से भरोसे की बहाली संभव है
लोकतांत्रिक संस्थाओं को मज़बूती मिलती है
आम नागरिकों को राहत मिलती है
क्षेत्रीय और वैश्विक अस्थिरता रोकी जा सकती है
इसी कारण भारत लगातार यह कहता रहा है कि सभी पक्ष बातचीत की मेज़ पर लौटें और ऐसा समाधान खोजें जो वेनेजुएला की जनता के भविष्य को सुरक्षित कर सके।






