“पंचमहाभूत” आयुर्वेद का मूल मंत्र: पाँच तत्वों का संतुलन ही है स्वस्थ जीवन की कुंजी

संवाद 24 डेस्क। भारतीय दर्शन में “पंचमहाभूत” — आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी — को सृष्टि के मूलभूत तत्व माना गया है। यह अवधारणा केवल आध्यात्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि मानव शरीर, प्रकृति, स्वास्थ्य, पर्यावरण और ब्रह्मांड की संरचना को समझने का एक समग्र दृष्टिकोण है। वेद, उपनिषद, सांख्य दर्शन और आयुर्वेद में इन तत्वों का विस्तार से वर्णन मिलता है। भारतीय चिंतन परंपरा के अनुसार समस्त ब्रह्मांड (स्थूल जगत) और सूक्ष्म जगत अर्थात मानव शरीर इन्हीं पाँच तत्वों से निर्मित है। इन तत्वों के संतुलन में ही स्वास्थ्य, स्थिरता और जीवन की निरंतरता निहित है।

पंचमहाभूत की संकल्पना का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से मिलता है। ऋग्वेद, तैत्तिरीय उपनिषद और चरक संहिता में सृष्टि के क्रमिक विकास और तत्वों की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है। सांख्य दर्शन के अनुसार अव्यक्त प्रकृति से महत, अहंकार और तत्पश्चात पंचतन्मात्राओं के माध्यम से पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होती है। यह दार्शनिक मॉडल सृष्टि की भौतिक और चेतन संरचना को एक व्यवस्थित क्रम में समझाने का प्रयास करता है।

आकाश तत्व : विस्तार और ध्वनि का आधार
आकाश पंचमहाभूतों में सबसे सूक्ष्म तत्व माना जाता है। इसका मूल गुण “शब्द” है। ध्वनि के संचार के लिए आकाश आवश्यक माध्यम है। दार्शनिक दृष्टि से आकाश शून्यता या रिक्तता का प्रतीक है, जो अस्तित्व को स्थान प्रदान करता है। यदि आकाश न हो, तो अन्य तत्वों के अस्तित्व का आधार ही समाप्त हो जाए। आयुर्वेद के अनुसार शरीर के भीतर जो रिक्त स्थान हैं — जैसे कोशिकाओं के बीच का स्पेस, नाड़ियों के मार्ग, मुख, नासिका, कान — वे आकाश तत्व के प्रतीक हैं।

आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से देखें तो ब्रह्मांड का अधिकांश भाग रिक्त अंतरिक्ष है, जिसमें ग्रह, तारे और आकाशगंगाएँ स्थित हैं। भारतीय दर्शन में आकाश को केवल भौतिक शून्य नहीं, बल्कि संभावनाओं के अनंत विस्तार के रूप में देखा गया है। मनुष्य के मानसिक और आध्यात्मिक विकास में भी “आंतरिक आकाश” की अवधारणा महत्वपूर्ण मानी गई है।

वायु तत्व : गति और स्पर्श का प्रतिनिधि
वायु तत्व का मूल गुण “स्पर्श” और विशेषता “गति” है। यह जीवन की सक्रियता और संचार का प्रतीक है। शरीर में श्वास-प्रश्वास, रक्त प्रवाह, स्नायु गतिविधियाँ और तंत्रिका तंत्र का कार्य वायु तत्व से संबद्ध माने जाते हैं। आयुर्वेद में वात दोष का आधार मुख्यतः वायु और आकाश तत्व हैं। यदि वायु असंतुलित हो जाए तो शरीर में दर्द, कंपकंपी, अनिद्रा, चिंता और शुष्कता जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

पर्यावरणीय संदर्भ में वायु जीवन का अनिवार्य आधार है। ऑक्सीजन के बिना जीवन संभव नहीं। भारतीय परंपरा में वायु को देवतुल्य सम्मान दिया गया है, जो जीवन शक्ति का वाहक है। योग और प्राणायाम की विधियाँ वायु तत्व के संतुलन पर विशेष बल देती हैं, जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सुदृढ़ होता है।

अग्नि तत्व : ऊर्जा और रूपांतरण की शक्ति
अग्नि तत्व का मूल गुण “रूप” और “ऊष्मा” है। यह परिवर्तन और ऊर्जा का प्रतीक है। आयुर्वेद में अग्नि को पाचन शक्ति के रूप में देखा जाता है, जिसे “जठराग्नि” कहा गया है। भोजन का पाचन, ऊर्जा का उत्पादन और शरीर की चयापचय क्रियाएँ अग्नि तत्व पर निर्भर करती हैं। यदि अग्नि मंद हो जाए तो अपच, आलस्य और रोग उत्पन्न होते हैं; यदि अत्यधिक प्रबल हो तो जलन, क्रोध और सूजन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
सूर्य को अग्नि का सर्वोच्च प्रतीक माना गया है। सौर ऊर्जा पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व का मूल स्रोत है। आधुनिक विज्ञान भी ऊर्जा और ताप को जीवन प्रक्रियाओं के केंद्र में रखता है। इस प्रकार अग्नि तत्व आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जल तत्व : जीवन और तरलता का आधार
जल तत्व का गुण “रस” और “तरलता” है। यह जीवन का मूल आधार है। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति जल में ही मानी जाती है। मानव शरीर का लगभग 60-70 प्रतिशत भाग जल से बना है। रक्त, लसीका, पसीना और अन्य शारीरिक द्रव जल तत्व के प्रतीक हैं। आयुर्वेद में कफ दोष का संबंध जल और पृथ्वी तत्व से है।

जल का संतुलन स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। जल की कमी से निर्जलीकरण, थकान और त्वचा संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। भारतीय संस्कृति में नदियों को माता का दर्जा दिया गया है, क्योंकि वे जीवनदायिनी हैं। पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में जल संसाधनों की रक्षा आज अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन चुका है।

पृथ्वी तत्व : स्थिरता और संरचना का प्रतीक
पृथ्वी तत्व का गुण “गंध” और विशेषता “स्थिरता” है। यह दृढ़ता, संरचना और आधार का प्रतिनिधित्व करता है। मानव शरीर की हड्डियाँ, मांसपेशियाँ, त्वचा और नाखून पृथ्वी तत्व से जुड़े माने जाते हैं। यदि यह तत्व संतुलित हो तो व्यक्ति में धैर्य, स्थिरता और शक्ति बनी रहती है।
कृषि, भोजन और प्राकृतिक संसाधन पृथ्वी पर निर्भर हैं। भूमि का क्षरण, प्रदूषण और अति दोहन पृथ्वी तत्व के असंतुलन के संकेत हैं। भारतीय दर्शन में पृथ्वी को धैर्य और सहनशीलता की मूर्ति माना गया है।

आयुर्वेद में पंचमहाभूत और त्रिदोष सिद्धांत
आयुर्वेद पंचमहाभूत सिद्धांत को त्रिदोष — वात, पित्त और कफ के माध्यम से व्यावहारिक रूप देता है। वात (आकाश + वायु), पित्त (अग्नि + जल) और कफ (जल + पृथ्वी) शरीर की जैविक शक्तियाँ हैं। सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम् में इनके संतुलन को स्वास्थ्य का मूल आधार बताया गया है। रोग तब उत्पन्न होते हैं जब ये दोष असंतुलित हो जाते हैं। उपचार में आहार, विहार, औषधि और पंचकर्म जैसी विधियों का उपयोग किया जाता है।

आधुनिक विज्ञान और पंचमहाभूत
यद्यपि आधुनिक विज्ञान पंचमहाभूत की अवधारणा को उसी रूप में स्वीकार नहीं करता, परंतु पदार्थ की अवस्थाएँ — ठोस, द्रव, गैस, ऊर्जा और अंतरिक्ष — इन तत्वों से तुलनीय मानी जा सकती हैं। पंचमहाभूत का सिद्धांत प्रतीकात्मक होते हुए भी प्रकृति के संतुलन और पारिस्थितिकी तंत्र की समझ प्रदान करता है। पर्यावरणीय संकट, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण की चुनौतियाँ इस संतुलन के बिगड़ने का संकेत देती हैं।

समकालीन प्रासंगिकता
आज जब मानव जीवन तनाव, प्रदूषण और असंतुलित जीवनशैली से प्रभावित है, तब पंचमहाभूत की अवधारणा संतुलन और समग्रता की प्रेरणा देती है। योग, ध्यान, आयुर्वेदिक आहार और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियाँ इन तत्वों के संतुलन पर बल देती हैं। यह सिद्धांत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक है।

पंचमहाभूत भारतीय ज्ञान परंपरा की एक गहन और वैज्ञानिक दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी केवल भौतिक तत्व नहीं, बल्कि जीवन, स्वास्थ्य और चेतना के आधार हैं। इनका संतुलन बनाए रखना ही समग्र स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संतुलन की कुंजी है। आधुनिक युग में भी यह सिद्धांत मानवता को प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देता है।

Geeta Singh
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