सर्पगंधा (Rauwolfia serpentina) की जड़ें और कंद: आयुर्वेद में महत्व, औषधीय गुण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

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संवाद 24 डेस्क। सर्पगंधा, जिसे संस्कृत में “सर्पगन्धा”, हिंदी में “चंद्रभागा” या “नागमूल” भी कहा जाता है, भारतीय आयुर्वेद की एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पति है। इसका वैज्ञानिक नाम Rauwolfia serpentina है और यह मुख्यतः भारतीय उपमहाद्वीप के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाई जाती है। सर्पगंधा का उपयोग विशेष रूप से इसकी जड़ों (Roots) और कंद (Rhizomes) के कारण किया जाता है, जिनमें अनेक शक्तिशाली जैव सक्रिय तत्व पाए जाते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में भी इस पौधे को उच्च रक्तचाप (Hypertension) और मानसिक विकारों के उपचार में ऐतिहासिक महत्व प्राप्त है।

आयुर्वेद में सर्पगंधा को मन, मस्तिष्क और हृदय पर प्रभाव डालने वाली प्रमुख औषधियों में माना गया है। इसकी जड़ें शांति प्रदान करने वाली, निद्राजनक (Sleep-inducing), रक्तचाप नियंत्रक तथा तंत्रिका तंत्र को संतुलित करने वाली मानी जाती हैं। वर्तमान समय में भी आयुर्वेदिक चिकित्सक इसका उपयोग विभिन्न रोगों में सावधानीपूर्वक करते हैं।

वनस्पति परिचय और संरचना
सर्पगंधा एक छोटा झाड़ीदार पौधा है जिसकी ऊँचाई लगभग 30–60 सेंटीमीटर तक होती है। इसकी पत्तियाँ लंबी, चिकनी और चमकदार होती हैं तथा फूल छोटे गुलाबी या सफेद रंग के होते हैं। फल पकने पर बैंगनी या काले रंग के दिखाई देते हैं। औषधीय उपयोग के लिए मुख्यतः इसकी जड़ें और भूमिगत तना (Rhizome) उपयोग में लाए जाते हैं।

जड़ों में कई प्रकार के एल्कलॉइड (Alkaloids) पाए जाते हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
• रेसर्पीन (Reserpine)
• अजमालीन (Ajmaline)
• सर्पेन्टीन (Serpentine)
• योहिम्बीन (Yohimbine)

ये सभी यौगिक शरीर के तंत्रिका तंत्र, हृदय तथा रक्त परिसंचरण प्रणाली पर प्रभाव डालते हैं।

आयुर्वेदिक गुणधर्म (द्रव्यगुण विज्ञान के अनुसार)
आयुर्वेद में सर्पगंधा के गुण निम्न प्रकार बताए गए हैं:
• रस (Taste): तिक्त (कड़वा), कषाय (कसैला)
• गुण (Properties): लघु, रूक्ष
• वीर्य (Potency): शीत
• विपाक: कटु
• प्रभाव: मन शांत करने वाला, निद्राजनक, रक्तचाप नियंत्रक

यह मुख्यतः वात और पित्त दोष को संतुलित करने में सहायक मानी जाती है।

आयुर्वेदिक ग्रंथों में उल्लेख
प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में सर्पगंधा का वर्णन विषहर, निद्राजनक और मानसिक रोगों में उपयोगी औषधि के रूप में किया गया है। विशेष रूप से
चरक संहिता और
सुश्रुत संहिता
में सर्पदंश (साँप के काटने), अनिद्रा, मानसिक उत्तेजना और ज्वर जैसे रोगों में इसके प्रयोग का उल्लेख मिलता है।

सर्पगंधा की जड़ों और कंद के प्रमुख लाभ

  1. उच्च रक्तचाप (Hypertension) नियंत्रण
    सर्पगंधा का सबसे प्रसिद्ध उपयोग रक्तचाप को नियंत्रित करने में है। इसके एल्कलॉइड रेसर्पीन का उपयोग आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा में भी किया गया है। यह सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम की गतिविधि को कम करके रक्तचाप को घटाने में सहायता करता है।

आयुर्वेदिक दृष्टि से यह हृदय और रक्तवाहिनियों पर शीतल प्रभाव डालती है तथा तनाव कम करती है, जिससे रक्तचाप संतुलित होता है।

  1. अनिद्रा (Insomnia) में लाभ
    जो लोग लंबे समय से नींद न आने की समस्या से पीड़ित होते हैं, उनके लिए सर्पगंधा की जड़ अत्यंत उपयोगी मानी जाती है। यह मस्तिष्क की अत्यधिक उत्तेजना को कम करके प्राकृतिक नींद लाने में मदद करती है।
  2. मानसिक तनाव और चिंता
    सर्पगंधा एक प्राकृतिक ट्रैंक्विलाइज़र (शांतिदायक) की तरह कार्य करती है। यह चिंता, घबराहट, चिड़चिड़ापन और मानसिक अस्थिरता को कम करने में सहायक है। आयुर्वेद में इसे “मनःप्रशमन” औषधि कहा जाता है।
  3. हृदय स्वास्थ्य
    सर्पगंधा हृदय की धड़कन को संतुलित करने में मदद करती है। यह हृदय गति की अनियमितता (Arrhythmia) में भी उपयोगी बताई गई है। अजमालीन नामक एल्कलॉइड हृदय के विद्युत संचार को प्रभावित करके धड़कन को स्थिर करने में सहायक हो सकता है।
  4. मानसिक रोगों में उपयोग
    पुराने समय में सर्पगंधा का उपयोग उन्माद (Psychosis), हिस्टीरिया और अन्य मानसिक विकारों में किया जाता था। आधुनिक चिकित्सा में भी इसका ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि रेसर्पीन मानसिक रोगों की प्रारंभिक दवाओं में से एक रहा है।
  5. दर्द और सूजन में राहत
    सर्पगंधा में हल्के एनाल्जेसिक (दर्द निवारक) गुण भी पाए जाते हैं। यह विशेष रूप से सिरदर्द और तंत्रिका संबंधी दर्द में उपयोगी हो सकती है।
  6. सर्पदंश (Snake Bite) में पारंपरिक उपयोग
    आयुर्वेदिक और लोक चिकित्सा में सर्पगंधा का उपयोग साँप के काटने में भी किया जाता रहा है। हालांकि आधुनिक चिकित्सा में एंटी-वेनम ही मुख्य उपचार है, लेकिन पारंपरिक संदर्भों में इसका उल्लेख मिलता है।
  7. पाचन सुधार
    यह औषधि हल्की पाचन सुधारक भी मानी जाती है। कड़वे रस के कारण यह अग्नि को संतुलित करने में मदद कर सकती है।

आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक अनुसंधानों में सर्पगंधा के निम्न प्रभाव पाए गए हैं:
• रक्तचाप कम करने वाला प्रभाव
• सिडेटिव (शांतिदायक) प्रभाव
• एंटी-साइकोटिक प्रभाव
• हृदय गति नियंत्रक प्रभाव

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी पारंपरिक औषधीय पौधों के महत्व को स्वीकार किया है, और सर्पगंधा उन पौधों में शामिल है जिनका वैश्विक औषधीय महत्व है।

आयुर्वेद में उपयोग की विधियाँ
सर्पगंधा का उपयोग कई रूपों में किया जाता है:
1. चूर्ण (Powder) – जड़ का सूखा पाउडर
2. घन वटी – टैबलेट रूप
3. काढ़ा (Decoction) – उबालकर बनाया गया अर्क
4. अर्क / एक्सट्रैक्ट – आधुनिक हर्बल तैयारी

मात्रा रोग, आयु और शरीर प्रकृति के अनुसार आयुर्वेदिक चिकित्सक द्वारा निर्धारित की जाती है।

खेती और संरक्षण का महत्व
अत्यधिक उपयोग के कारण सर्पगंधा कई क्षेत्रों में दुर्लभ होती जा रही है। इसलिए इसकी खेती और संरक्षण आवश्यक है। भारत में इसे औषधीय पौधों की संरक्षित श्रेणी में भी शामिल किया गया है।

अन्य औषधियों के साथ संयोजन

आयुर्वेद में सर्पगंधा को कई अन्य औषधियों के साथ मिलाकर दिया जाता है, जैसे:
• ब्राह्मी
• जटामांसी
• अश्वगंधा
• शंखपुष्पी

ये संयोजन मानसिक रोगों और तनाव में अधिक प्रभावी माने जाते हैं।

संभावित दुष्प्रभाव
हालांकि सर्पगंधा प्राकृतिक औषधि है, लेकिन इसमें शक्तिशाली एल्कलॉइड होने के कारण कुछ दुष्प्रभाव हो सकते हैं:
• अत्यधिक नींद
• लो ब्लड प्रेशर
• नाक बंद होना
• पेट संबंधी समस्या
• अवसाद (लंबे समय तक अधिक मात्रा में)

इसलिए इसका उपयोग हमेशा चिकित्सकीय सलाह से करना चाहिए।

सावधानियाँ (Precautions)
1. गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएँ बिना चिकित्सक सलाह के इसका उपयोग न करें।
2. लो ब्लड प्रेशर वाले मरीज इसे सावधानी से लें।
3. डिप्रेशन के मरीज में यह लक्षण बढ़ा सकती है।
4. अन्य ब्लड प्रेशर या मानसिक रोग की दवाओं के साथ लेने से पहले डॉक्टर से परामर्श आवश्यक है।
5. लंबे समय तक स्वयं सेवन न करें।
6. बच्चों में उपयोग केवल विशेषज्ञ की निगरानी में करें।
7. ऑपरेशन से पहले इसका सेवन बंद करना चाहिए क्योंकि यह रक्तचाप को प्रभावित कर सकती है।

सर्पगंधा आयुर्वेद की अत्यंत महत्वपूर्ण औषधियों में से एक है, जिसकी जड़ें और कंद अनेक रोगों में उपयोगी सिद्ध हुए हैं। यह विशेष रूप से उच्च रक्तचाप, अनिद्रा, मानसिक तनाव और तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याओं में लाभकारी मानी जाती है। प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक शोध दोनों ही इसके औषधीय महत्व की पुष्टि करते हैं। हालांकि इसकी शक्ति को देखते हुए इसका उपयोग केवल योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह से ही करना चाहिए।

डिस्क्लेमर
किसी भी आयुर्वेदिक उत्पाद का सेवन अथवा प्रयोग करने से पूर्व योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करना आवश्यक है। लेख में वर्णित लाभ पारंपरिक ग्रंथों एवं उपलब्ध शोधों पर आधारित हैं, जिनके परिणाम व्यक्ति विशेष में भिन्न हो सकते हैं। लेखक एवं प्रकाशक किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दुष्प्रभाव, हानि या गलत उपयोग के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।

Radha Singh
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