शीर्षक: आयुर्वेद में केवड़ा (Kewra) : औषधीय गुण, चिकित्सीय उपयोग एवं समग्र महत्व

संवाद 24 डेस्क। आयुर्वेद भारत की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है, जिसमें वनस्पतियों, खनिजों और प्राकृतिक पदार्थों के माध्यम से शरीर, मन और आत्मा के संतुलन पर विशेष बल दिया गया है। इन्हीं औषधीय वनस्पतियों में केवड़ा (Pandanus odoratissimus / Pandanus tectorius) का एक विशिष्ट स्थान है। केवड़ा अपनी सुगंध, शीतल प्रभाव और औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित है। सामान्यतः इसे सुगंधित पुष्प के रूप में जाना जाता है, परंतु आयुर्वेद के अनुसार इसके फूल, पत्तियाँ, जड़ और उससे प्राप्त अर्क अनेक रोगों में उपयोगी माने गए हैं।

यह लेख आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से केवड़ा के गुण, लाभ, चिकित्सीय उपयोग, रस–गुण–वीर्य–विपाक, आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से इसके प्रभाव तथा अंत में आवश्यक सावधानियों पर विशेष रूप से प्रकाश डालता है।

केवड़ा का संक्षिप्त परिचय
केवड़ा एक उष्णकटिबंधीय पौधा है, जो मुख्यतः भारत के तटीय क्षेत्रों, विशेषकर ओडिशा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश तथा दक्षिण भारत में पाया जाता है। इसका पौधा झाड़ीदार होता है और इसके पुष्प अत्यंत सुगंधित होते हैं। इन्हीं पुष्पों से केवड़ा जल (Kewra Water) और केवड़ा अर्क तैयार किया जाता है, जिसका उपयोग औषधीय एवं खाद्य पदार्थों में होता है।

आयुर्वेद में केवड़ा को “केतकी” नाम से भी जाना जाता है। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और भावप्रकाश निघंटु जैसे ग्रंथों में केतकी के औषधीय गुणों का उल्लेख मिलता है।

आयुर्वेदिक दृष्टि से केवड़ा का स्वरूप (रस–गुण–वीर्य–विपाक)
आयुर्वेद में किसी भी औषधि का मूल्यांकन उसके रस, गुण, वीर्य और विपाक के आधार पर किया जाता है।
• रस (Taste): तिक्त (कड़वा), मधुर
• गुण (Properties): लघु, स्निग्ध, सुगंधित
• वीर्य (Potency): शीत
• विपाक (Post-digestive effect): मधुर
इन गुणों के कारण केवड़ा मुख्यतः पित्त दोष को शांत करता है, जबकि वात को संतुलित रखता है। कफ पर इसका प्रभाव सीमित माना गया है।

केवड़ा के प्रमुख औषधीय गुण
केवड़ा को आयुर्वेद में कई प्रकार के औषधीय गुणों से युक्त माना गया है, जिनमें प्रमुख हैं:
• शीतल एवं दाहशामक
• मूत्रल (मूत्र प्रवाह को बढ़ाने वाला)
• हृदय को सशक्त करने वाला
• मानसिक शांति प्रदान करने वाला
• पाचन को संतुलित करने वाला
• त्वचा रोगों में लाभकारी
इन गुणों के कारण केवड़ा को आंतरिक और बाह्य, दोनों प्रकार के उपचारों में प्रयोग किया जाता है।

पाचन तंत्र पर केवड़ा के लाभ
आयुर्वेद के अनुसार पाचन अग्नि का संतुलन स्वास्थ्य की कुंजी है। केवड़ा अपने शीतल और सुगंधित गुणों के कारण पाचन तंत्र पर सौम्य प्रभाव डालता है।

यह अम्लपित्त, जलन, अपच और मतली जैसी समस्याओं में उपयोगी माना जाता है। केवड़ा जल का सीमित मात्रा में सेवन पेट की गर्मी को शांत करता है और पाचन रसों के स्राव को संतुलित करता है। विशेष रूप से गर्मी के मौसम में यह शरीर को अंदर से ठंडक प्रदान करता है।

मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव
केवड़ा की सुगंध को आयुर्वेद में मनःशामक (calming) माना गया है। इसकी प्राकृतिक खुशबू मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव डालती है और तनाव, चिंता एवं मानसिक थकान को कम करने में सहायक होती है।

अरोमाथेरेपी में भी केवड़ा का उपयोग किया जाता है। आयुर्वेदिक दृष्टि से यह सत्त्व गुण को बढ़ाता है, जिससे मन शांत, एकाग्र और संतुलित रहता है। अनिद्रा, बेचैनी और मानसिक अशांति में केवड़ा जल या केवड़ा युक्त औषधियाँ सहायक हो सकती हैं।

हृदय स्वास्थ्य में केवड़ा का महत्व
आयुर्वेद में हृदय को केवल एक अंग नहीं, बल्कि चेतना और भावनाओं का केंद्र माना गया है। केवड़ा के शीतल और स्निग्ध गुण हृदय को शांति प्रदान करते हैं।
यह हृदय की जलन, धड़कन की असामान्यता और मानसिक तनाव से उत्पन्न हृदय संबंधी समस्याओं में सहायक माना जाता है। पारंपरिक रूप से केवड़ा युक्त शीतल पेय हृदय को ताजगी देने के लिए प्रयोग किए जाते रहे हैं।

मूत्र तंत्र एवं गुर्दों पर प्रभाव
केवड़ा को मूत्रल गुणों से युक्त बताया गया है। यह मूत्र प्रवाह को सुचारु बनाने में सहायक होता है और शरीर से विषैले तत्वों के निष्कासन में मदद करता है। मूत्र में जलन, बार-बार पेशाब आना और पित्तजन्य मूत्र विकारों में केवड़ा उपयोगी माना जाता है। हालांकि, आयुर्वेद में इसे सहायक औषधि के रूप में देखा जाता है, न कि मुख्य उपचार के रूप में।

त्वचा एवं सौंदर्य में केवड़ा का उपयोग
केवड़ा का शीतल और सुगंधित स्वभाव त्वचा के लिए लाभकारी माना गया है। आयुर्वेद में इसका उपयोग दाह, जलन, घमौरियाँ और हल्के त्वचा विकारों में किया जाता है।

केवड़ा जल से त्वचा को धोने से ताजगी मिलती है और पसीने की दुर्गंध कम होती है। कुछ पारंपरिक सौंदर्य विधियों में केवड़ा को उबटन या लेप के रूप में भी प्रयोग किया गया है।

श्वसन तंत्र पर प्रभाव
केवड़ा की सुगंध श्वसन तंत्र को भी प्रभावित करती है। हल्के रूप में इसकी खुशबू लेने से मन प्रसन्न होता है और सांस लेने में सहजता महसूस होती है।
आयुर्वेद में इसे कफ नाशक औषधि के रूप में प्रमुखता नहीं दी गई है, परंतु मानसिक शांति के माध्यम से यह श्वसन संबंधी तनाव को कम करने में सहायक हो सकता है।

आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक शोधों में केवड़ा के फूलों में पाए जाने वाले कुछ सुगंधित यौगिकों (aromatic compounds) को तनाव कम करने और हल्के एंटीऑक्सीडेंट गुणों से युक्त पाया गया है।
हालांकि, आयुर्वेदिक उपयोग मुख्यतः पारंपरिक अनुभव और शास्त्रीय वर्णनों पर आधारित है। आधुनिक विज्ञान अभी इसके सभी औषधीय गुणों पर विस्तृत शोध की प्रक्रिया में है।

आयुर्वेदिक औषधियों एवं आहार में केवड़ा
केवड़ा का उपयोग आयुर्वेदिक शरबतों, अर्कों और शीतल पेयों में किया जाता है। इसके अलावा, कुछ औषधीय योगों में इसे सहायक द्रव्य के रूप में मिलाया जाता है।
भारतीय पारंपरिक पाकशास्त्र में भी केवड़ा जल का सीमित उपयोग भोजन को सुगंधित एवं पाचन के अनुकूल बनाने के लिए किया जाता है।

सावधानियाँ
केवड़ा एक प्रभावशाली आयुर्वेदिक द्रव्य है, परंतु इसके उपयोग में संतुलन और विवेक आवश्यक है।

मुख्य सावधानियाँ:
1. अत्यधिक मात्रा में केवड़ा जल या अर्क का सेवन करने से सिरदर्द या मतली हो सकती है।
2. गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान इसके सेवन से पहले वैद्य या चिकित्सक की सलाह आवश्यक है।
3. अत्यधिक कफ प्रकृति वाले व्यक्तियों में इसका उपयोग सीमित मात्रा में करना चाहिए।
4. कृत्रिम केवड़ा एसेंस के स्थान पर शुद्ध और प्राकृतिक केवड़ा उत्पाद ही उपयोग करें।
5. किसी गंभीर रोग की अवस्था में इसे केवल सहायक के रूप में लें, मुख्य उपचार के रूप में नहीं।

निष्कर्षतः, आयुर्वेद में केवड़ा एक सुगंधित, शीतल और मन–शरीर को संतुलित करने वाली औषधि के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उचित मात्रा, सही विधि और विशेषज्ञ सलाह के साथ इसका प्रयोग स्वास्थ्य, मानसिक शांति और जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है।

डिस्क्लेमर
किसी भी आयुर्वेदिक उत्पाद का सेवन अथवा प्रयोग करने से पूर्व योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करना आवश्यक है। लेख में वर्णित लाभ पारंपरिक ग्रंथों एवं उपलब्ध शोधों पर आधारित हैं, जिनके परिणाम व्यक्ति विशेष में भिन्न हो सकते हैं। लेखक एवं प्रकाशक किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दुष्प्रभाव, हानि या गलत उपयोग के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।

Radha Singh
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