आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा में गिलोय की भूमिका

संवाद 24 डेस्क।भारतीय आयुर्वेद परंपरा में जिन औषधीय पौधों को अमृत की संज्ञा दी गई है, उनमें गिलोय का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। इसे संस्कृत में गुडूची, अमृता और चक्रांगी भी कहा जाता है। गिलोय को रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, ज्वर नाशक, रक्त शुद्धिकरण और दीर्घायु प्रदान करने वाली औषधि माना गया है। आधुनिक विज्ञान भी इसके औषधीय गुणों की पुष्टि कर रहा है। आयुर्वेद में गिलोय केवल एक औषधि नहीं, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य का आधार मानी जाती है।

गिलोय का परिचय और वनस्पति स्वरूप
गिलोय एक बहुवर्षीय, पर्णपाती, लता रूपी पौधा है जो सामान्यतः नीम, आम या जामुन जैसे वृक्षों पर चढ़ता है। इसके हृदयाकार पत्ते और हरे-भूरे तने इसकी पहचान हैं। आयुर्वेद में विशेष रूप से नीम पर चढ़ी गिलोय को श्रेष्ठ माना गया है, जिसे नीम गिलोय कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Tinospora cordifolia है और यह भारत, नेपाल तथा श्रीलंका में व्यापक रूप से पाई जाती है।

आयुर्वेद में गिलोय का महत्व
आयुर्वेदिक ग्रंथों जैसे चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और भावप्रकाश निघंटु में गिलोय का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसे त्रिदोषनाशक वात, पित्त और कफ तीनों दोषों को संतुलित करने वाली औषधि माना गया है। गिलोय का रस, क्वाथ, चूर्ण और घन वटी के रूप में उपयोग किया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार गिलोय शरीर की अग्नि को संतुलित कर पाचन को सुदृढ़ बनाती है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में गिलोय
गिलोय को प्राकृतिक इम्यूनोमॉड्यूलेटर कहा जाता है। यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत कर संक्रमणों से लड़ने की क्षमता बढ़ाती है। नियमित सेवन से बार-बार होने वाले सर्दी-जुकाम, वायरल बुखार और मौसमी बीमारियों से बचाव होता है। आयुर्वेद में इसे रसायन द्रव्य माना गया है, जो शरीर की कोशिकाओं का पुनर्निर्माण करता है।

ज्वर (बुखार) नाशक के रूप में गिलोय
आयुर्वेद में गिलोय को ज्वरघ्नि औषधि कहा गया है। चाहे वह वायरल बुखार हो, डेंगू, मलेरिया या टाइफाइड—गिलोय का काढ़ा शरीर का ताप संतुलित करने और कमजोरी दूर करने में सहायक माना जाता है। डेंगू में प्लेटलेट काउंट बढ़ाने के लिए भी गिलोय का प्रयोग पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है।

पाचन तंत्र के लिए लाभकारी
गिलोय पाचन अग्नि को सुधारती है और कब्ज, गैस, एसिडिटी जैसी समस्याओं में राहत देती है। आयुर्वेद के अनुसार यह दीपन-पाचन गुणों से युक्त है, जिससे भोजन का सही पाचन होता है और शरीर में विषैले तत्व जमा नहीं होते। अतिसार और अम्लपित्त में भी इसका प्रयोग लाभकारी माना गया है।

मधुमेह (डायबिटीज) में गिलोय की भूमिका
आयुर्वेद में गिलोय को मेहहर औषधि माना गया है, जो रक्त में शर्करा के स्तर को संतुलित करने में सहायक है। इसके नियमित सेवन से इंसुलिन की कार्यक्षमता बेहतर होती है और मधुमेह से जुड़ी जटिलताओं का जोखिम कम हो सकता है। हालांकि, इसे चिकित्सकीय सलाह के साथ ही सेवन करना उचित माना जाता है।

यकृत (लीवर) स्वास्थ्य में सहायक
गिलोय लीवर को डिटॉक्स करने और उसकी कार्यक्षमता बढ़ाने में सहायक है। पीलिया, फैटी लिवर और हेपेटाइटिस जैसी समस्याओं में आयुर्वेदिक चिकित्सक गिलोय का उपयोग करते हैं। यह रक्त को शुद्ध कर शरीर से विषाक्त तत्वों को बाहर निकालने में मदद करती है।

त्वचा रोगों में गिलोय के लाभ
आयुर्वेद के अनुसार गिलोय रक्तशोधक है, इसलिए यह त्वचा रोगों जैसे मुंहासे, फोड़े-फुंसी, एलर्जी और खुजली में लाभकारी मानी जाती है। गिलोय का रस या काढ़ा शरीर के अंदर से त्वचा को स्वस्थ बनाता है और चमक बढ़ाने में सहायक होता है।

गठिया और जोड़ों के दर्द में उपयोगी
गिलोय में सूजनरोधी गुण पाए जाते हैं, जो गठिया और जोड़ों के दर्द में राहत देते हैं। आयुर्वेद में इसे वात दोष को शांत करने वाली औषधि माना गया है। गिलोय का नियमित सेवन जोड़ों की जकड़न और दर्द को कम करने में सहायक हो सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य और तनाव में गिलोय
आयुर्वेदिक दृष्टि से गिलोय मन को शांत करने और मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक है। यह तनाव, चिंता और थकान को कम करती है। गिलोय को मेद्य रसायन भी कहा जाता है, जो स्मरण शक्ति और एकाग्रता बढ़ाने में मददगार मानी जाती है।

महिलाओं के स्वास्थ्य में गिलोय
गिलोय महिलाओं में हार्मोन संतुलन बनाए रखने और मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं में सहायक मानी जाती है। यह कमजोरी दूर करने और प्रसवोत्तर स्वास्थ्य सुधारने में भी उपयोगी बताई गई है। आयुर्वेद में इसे स्त्री रोगों में सहायक औषधि के रूप में स्थान दिया गया है।

गिलोय के सेवन के आयुर्वेदिक तरीके
गिलोय का सेवन काढ़ा, रस, चूर्ण या टैबलेट के रूप में किया जा सकता है। सामान्यतः गिलोय का काढ़ा सुबह खाली पेट लेना लाभकारी माना जाता है। हालांकि मात्रा और अवधि व्यक्ति की प्रकृति और रोग के अनुसार आयुर्वेदाचार्य द्वारा निर्धारित की जानी चाहिए।

सावधानियाँ और सीमाएँ
यद्यपि गिलोय एक सुरक्षित आयुर्वेदिक औषधि मानी जाती है, फिर भी अति सेवन हानिकारक हो सकता है। गर्भवती महिलाओं, ऑटोइम्यून रोग से पीड़ित व्यक्तियों और अत्यधिक कमजोर पाचन वाले लोगों को इसका सेवन चिकित्सकीय सलाह से ही करना चाहिए।

आधुनिक विज्ञान और गिलोय
आधुनिक शोधों में गिलोय के एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी और इम्यूनोमॉड्यूलेटरी गुणों की पुष्टि हुई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आयुर्वेदिक ज्ञान आज भी वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतर रहा है। गिलोय पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा के बीच एक सेतु के रूप में उभर रही है।

गिलोय आयुर्वेद की अमूल्य धरोहर है, जिसे सही तरीके और संतुलित मात्रा में अपनाकर अनेक रोगों से बचाव और उपचार संभव है। यह केवल औषधि नहीं, बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य और दीर्घायु का प्रतीक है। बदलती जीवनशैली और बढ़ते रोगों के दौर में गिलोय जैसे आयुर्वेदिक पौधों का महत्व और भी बढ़ गया है। आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार यदि गिलोय को दिनचर्या में शामिल किया जाए, तो यह स्वस्थ जीवन की दिशा में एक मजबूत कदम साबित हो सकती है।

डिस्क्लेमर
इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। यह किसी भी प्रकार से चिकित्सकीय सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी किसी भी लक्षण, निर्णय या उपचार के लिए अपने व्यक्तिगत चिकित्सक, या किसी योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

Radha Singh
Radha Singh

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Get regular updates on your mail from Samvad 24 News