यूपी में डीएलएड का क्रेज खत्म! आखिर क्यों खाली रह गईं लाखों सीटें?
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संवाद 24 डेस्क। उत्तर प्रदेश में डीएलएड (डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन) जैसे महत्वपूर्ण शिक्षक प्रशिक्षण कोर्स में इस बार जो तस्वीर सामने आई है, वह न सिर्फ चिंताजनक है बल्कि शिक्षा व्यवस्था के भविष्य पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है। जहां कभी इस कोर्स में दाखिले के लिए लंबी कतारें लगती थीं, वहीं अब आधी से ज्यादा सीटें खाली रह जाना एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है। यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि युवाओं की बदलती प्राथमिकताओं, सरकारी नीतियों की दिशा और रोजगार की अनिश्चितता का आईना है।
आंकड़ों में सिमटती हकीकत: आधी सीटें ही भर पाईं
ताजा आंकड़ों के अनुसार, डीएलएड 2025 सत्र में कुल लगभग 2.39 लाख सीटों में से सिर्फ करीब 95 हजार सीटों पर ही प्रवेश हो सका, यानी महज 40 प्रतिशत सीटें ही भर पाईं। यह स्थिति पिछले वर्ष की तुलना में लगभग आधी है, जब करीब 1.91 लाख छात्रों ने प्रवेश लिया था। यह गिरावट केवल संख्या में कमी नहीं, बल्कि सिस्टम के प्रति घटते विश्वास का स्पष्ट संकेत है।
स्थानीय युवाओं का मोहभंग: आखिर क्यों घटा आकर्षण?
इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण है – रोजगार की अनिश्चितता। 2018 के बाद से परिषदीय स्कूलों में शिक्षक भर्ती न होना युवाओं के मन में गहरी निराशा पैदा कर चुका है।
युवाओं के सामने आज सबसे बड़ा सवाल है: “जब नौकरी की गारंटी नहीं, तो कोर्स में समय और पैसा क्यों लगाएं?”
आज का युवा अधिक व्यावहारिक हो गया है। वह केवल डिग्री नहीं, बल्कि उसके बाद मिलने वाले अवसरों को प्राथमिकता देता है। यही कारण है कि डीएलएड जैसे पारंपरिक कोर्स अब आकर्षण खो रहे हैं।
बाहरियों का बढ़ता रुझान: अवसर या प्रतिस्पर्धा का नया दौर?
जहां यूपी के युवा पीछे हट रहे हैं, वहीं अन्य राज्यों के अभ्यर्थी इस अवसर को तेजी से भुना रहे हैं। करीब 30 प्रतिशत सीटों पर बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड के छात्रों ने दाखिला लिया है।
यह एक दिलचस्प विरोधाभास है:
स्थानीय युवाओं का भरोसा कम हो रहा है
बाहरी छात्रों का भरोसा बढ़ रहा है
यह सवाल उठता है कि क्या बाहरी छात्र यूपी की शिक्षा प्रणाली में ज्यादा संभावनाएं देख रहे हैं या यह सिर्फ कम प्रतिस्पर्धा का फायदा है?
नीतिगत बदलाव का असर: खुले दरवाजों की नई चुनौती
पिछले वर्ष पहली बार डीएलएड में अन्य राज्यों के छात्रों के लिए प्रवेश खोला गया था। इस फैसले का असर अब साफ दिख रहा है—बाहरी छात्रों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।
यह नीति एक ओर जहां सीटों को भरने में मददगार साबित हो सकती थी, वहीं दूसरी ओर इसने स्थानीय युवाओं की भागीदारी को और कमजोर कर दिया है।
छात्रवृत्ति पोर्टल ठप: तकनीकी समस्या या प्रशासनिक विफलता?
इस पूरे संकट के बीच छात्रवृत्ति पोर्टल का ठप होना छात्रों की परेशानी को और बढ़ा रहा है। छात्र अपनी स्कॉलरशिप की स्थिति तक नहीं देख पा रहे हैं और उन्हें कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि तकनीकी कारणों से पोर्टल बंद है, लेकिन सवाल यह है कि:
क्या यह समस्या समय रहते हल नहीं हो सकती थी?
क्या डिजिटल सिस्टम पर अत्यधिक निर्भरता बिना मजबूत बैकअप के सही है?
शिक्षा बनाम रोजगार: असंतुलन की गहराती खाई
डीएलएड संकट एक व्यापक समस्या की ओर इशारा करता है शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी।
जब तक:
शिक्षक भर्तियां नियमित नहीं होंगी
रोजगार के स्पष्ट अवसर नहीं होंगे
तब तक ऐसे कोर्स केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।
युवाओं की बदलती सोच: परंपरागत कोर्स से दूरी
आज का युवा:
स्किल आधारित कोर्स
प्रोफेशनल ट्रेनिंग
प्राइवेट सेक्टर के अवसर
की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
डीएलएड जैसे कोर्स, जो कभी सरकारी नौकरी का सीधा रास्ता माने जाते थे, अब अनिश्चित भविष्य के प्रतीक बनते जा रहे हैं।
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
इस स्थिति ने सरकार के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं:
क्या शिक्षक भर्तियों में देरी ही इस गिरावट की मुख्य वजह है?
क्या डीएलएड कोर्स की संरचना में बदलाव की जरूरत है?
क्या युवाओं को इस कोर्स के प्रति दोबारा आकर्षित करने के लिए नई नीतियां बनाई जाएंगी? यदि इन सवालों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में यह संकट और गहरा सकता है।
समाधान क्या हो सकते हैं?
इस समस्या से निपटने के लिए कुछ संभावित कदम हो सकते हैं:
. नियमित शिक्षक भर्ती
भर्ती प्रक्रिया को समयबद्ध और पारदर्शी बनाना जरूरी है।
. कोर्स में सुधार
डीएलएड को अधिक व्यावहारिक और स्किल आधारित बनाया जाए।
. डिजिटल सिस्टम को मजबूत करना
छात्रवृत्ति जैसे पोर्टल्स को तकनीकी रूप से सक्षम और भरोसेमंद बनाना होगा।
. करियर काउंसलिंग
छात्रों को सही दिशा और जानकारी देना बेहद जरूरी है।
चेतावनी का संकेत या बदलाव का अवसर?
डीएलएड में खाली सीटें केवल एक शैक्षणिक आंकड़ा नहीं हैं, बल्कि यह एक चेतावनी है— युवाओं का भरोसा डगमगा रहा है। यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट शिक्षा व्यवस्था की नींव को कमजोर कर सकता है। लेकिन यदि इसे एक अवसर के रूप में देखा जाए, तो यह शिक्षा प्रणाली को अधिक आधुनिक, व्यावहारिक और रोजगार उन्मुख बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम भी साबित हो सकता है।
यह समय है जब सरकार, शिक्षा संस्थान और समाज—तीनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा केवल डिग्री न रह जाए, बल्कि युवाओं के भविष्य की मजबूत नींव बने।






